भारतीय सूफी मत पर समकालीन मुस्लिम देशों के रहस्यवादी विचारों का प्रभाव - The influence of the mystical ideas of contemporary Muslim countries on Indian Sufism
भारतीय सूफी मत पर समकालीन मुस्लिम देशों के रहस्यवादी विचारों का प्रभाव - The influence of the mystical ideas of contemporary Muslim countries on Indian Sufism
भारत में सूफी आंदोलन के विकास और प्रसार में भारतीय परिवेश का प्रभाव काम कर रहा था, पर इसके साथ-साथ इस्लामी दुनिया में सूफी मत में हो रहे परिवर्तन से भी यह अछूता नहीं था। विभिन्न सिलसिलों का प्रतिनिधित्व करने वाले सूफियों की कई पीढ़ियों को अलगजाली जैसे सूफी सिद्धांतों की मान्यताएँ प्रभावित करती रहीं। फैदुद्दीन अतार (मृत्यु 1220 ई.) और जलालुद्दीन रूमी (मृत्यु 1273 ई.) जैसे फारसी सूफियों के विचारों और काव्य प्रतीकों से सल्तनत काल के भारतीय सूफी प्रभावित थे। यह भी माना जाता है कि इस काल के सूफियों पर स्पेन में जन्मे सूफी इब्न अरबी (मृत्यु 1240 ई.) का भी प्रभाव था।
उसने वहदत अल वजूद (लौकिक और अलौकिक संसार की एकता) का सिद्धांत सामने रखा, जिसका उलेमा ने विरोध किया। पर हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि चिश्तियों समेत अधिकांश सूफी वहदत अल-वजूद जैसे सिद्धांत को खास महत्व नहीं देते थे। उनके अनुसार सूफी मत किसी सिद्धांत का नाम नहीं था, बल्कि सूफी मार्ग को सफलतापूर्वक पार करने का एक व्यावहारिक प्रयास था।
अलाउद्दीन (1261-1361 ई.) एक ईरानी था, उसने इब्न अरबी के सिद्धांत का विरोध किया था। उसने भी भारतीय सूफियों को प्रभावित किया। गेसूदराज सिमानानी के कट्टरपंथी विचारों से प्रभावित था और इसने इब्न अरबी और जलालुद्दीन रूमी के विचारों का खंडन किया।
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