महिला आंदोलन का संस्थानीकरण व उसका प्रभाव - Institutionalization of women's movement and its impact

महिला आंदोलन का संस्थानीकरण व उसका प्रभाव - Institutionalization of women's movement and its impact


महिला आंदोलन के ऊपर उसके संस्थानीकरण होने के भी कई आरोप लगे। 80 के दशक के बाद कहा गया कि स्त्री अध्ययन विषय के विश्वविद्यालयों में आने, गैर सरकारी संगठनों के उद्भव, आंदोलनकारियों द्वारा प्रकाशन संस्थाएँ आदि बना लेने से सड़क पर होने वाले आंदोलन कम हो गए हैं। अब सारी क्रांति की बातें ए.सी. कमरों तक सीमित हो गई हैं, लेकिन धीरे-धीरे स्थितियाँ स्पष्ट हुई कि महिला आंदोलन समाप्त नहीं हुआ है, बल्कि वह कई स्थितियों के साथ खुद में आवश्यक बदलाव लाकर सक्रिय है।

महिला आंदोलन के कुछ हिस्सों का संस्थानीकरण उसकी कमजोरी नहीं बल्कि उसकी ताकत बनकर उभरा है। जिस तरह से आज महिला आंदोलन का अकादमिक भुजा स्त्री अध्ययन को बंद करने के प्रयास किए गए हैं, वह बताते हैं कि संस्थानों में भी स्त्री अध्ययन विषय स्वयं में एक आंदोलन ही रहा है, जिसमे अकादमिक जगत की पितृसत्ता को बेनकाब किया है। इस पूरे दौर का यदि इन आंदोलनों के संदर्भ में हम विश्लेषण करते हैं तो पाते हैं कि देश भर में अलग-अलग स्तर पर छोटे-बड़े रूप में महिला आंदोलन लगातार चल रहे हैं। शायद ही कोई जगह ऐसी हो, जहाँ किसी-न-किसी रूप में महिला आंदोलन सक्रिय न हों। मुझे लगता है कि जब हम यह कहते हैं कि महिला आंदोलन का संस्थानीकरण हो गया है,

सड़कों पर महिलाओं की भागीदारी नहीं दिख रही है, तो कहीं-न-कहीं हम आंदोलन में एक मध्यम वर्गीय महिला का चेहरा तलाश रहे होते हैं और जब हम उसे नहीं देखते, तो पूरे आंदोलन को ही खारिज करने की मानसिकता में आ जाते हैं, जबकि इसी दौर में दलित, आदिवासी, श्रमिक महिलाओं इत्यादि के आंदोलन किसी पार्टी के भीतर या स्वायत्त रूप से भी काफी सक्रिय रहे हैं। अतः संस्थानीकरण पर बात करते हुए हम एक खास वर्ग की महिलाओं पर ही बात केंद्रित करते हैं। मध्य वर्गीय महिलाओं ने भी अलग-अलग स्तरों पर अपनी सहभागिता दर्ज की है। खासतौर पर केंद्र में बनने वाले नीतिगत नियमों में जेंडर दृष्टिकोण को जोड़े जाने पर उनका बहुत बड़ा योगदान है। आज तमाम योजनाओं में महिलाओं के दृष्टिकोण को शामिल करने का प्रयास किया जाता है। आंदोलन की यह एक बड़ी जीत है।


वर्तमान परिदृश्य


वर्तमान में महिला आंदोलन विभिन्न प्रगतिशील संगठनों के साथ मंच साझा करने का प्रयास कर रहा है, ताकि संरचना से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर काम किया जा सके। आर्थिक नीतियाँ, बढ़ती सांप्रदायिकता, असहिष्णुता, जातिगत हिंसा में वृद्धि, राज्य की हिंसा, खाप पंचायतें महिला आरक्षण, आदि विभिन्न मुद्दों पर यह आंदोलन नई रणनीतियों के साथ प्रयास कर रहा है। इस समय अकादमिक जगत में स्त्री अध्ययन विषय को बचाए रखने का बड़ा संकट भी महिला आंदोलन के सामने है क्योंकि राज्य की नीतियों के कारण स्त्री अध्ययन विषय बंद होने के कगार पर आ गया है। महिला आंदोलन इस मुद्दे पर लगातार सक्रिय है। एक तबका जहाँ स्त्री अध्ययन के रूप में संस्थानीकरण की जरूरत पर बल दे रहा है, वहीं दूसरा तबका ऐसा भी है, जो मानता है कि स्त्री अध्ययन एक विषय के रूप में रहे या न रहे। महिला आंदोलन हमेशा संपन्न अस्तित्व बना कर और बचा कर रखेगा।