अन्तरजातीय विवाह - interracial marriage

अन्तरजातीय विवाह - interracial marriage


आज की भाँति उस युग में भी विवाह एक पुनीत संस्कार समझा जाता था और सवर्ण विवाहों की ही सर्वत्र प्रतिष्ठा थी। अनुलोम तथा प्रतिलोम विवाह भी होते थे, किन्तु उनका समाज में आदर न था। तत्कालीन शिलालेखों में इस संबंध की पर्याप्त सामग्री उपलब्ध है जिससे ज्ञात होता है कि सवर्ण विवाह काही सर्वत्र समादर था। शिलालेखों में दिये हुए नरेशों तथा उनके मंत्रियों के वंशपरिचय से अनेक सवर्ण विवाहों का निर्देश मिलता है।

प्रबोध चन्द्रोदय में एक अनुलोम विवाह का निर्देश है। प्रबोध चन्द्रोदय में अहंकार नामक पात्र का कथन है. “हे मूर्ख सुनो। मेरी माँ उत्तम कुल की न थी किन्तु मैंने अग्निहोत्रन ब्राह्मण की कन्या से विवाह किया है। अस्तु, मैं अपने पिता से उच्च हूँ।" जिन परिस्थितियों में यह कथन हुआ है, उनके विश्लेषण से प्रतीत होता है कि यद्यपि इस प्रकार के विवाह उस युग में प्रचलित थे किन्तु उनका समादर न होता था। अल्बरूनी भी अनुलोम विवाह को घृणा की दृष्टि से देखता था। कल्हण ने भी राजतरंगिणी में इसकी बड़ी आलोचना की है।