कलचुरि वंश - Kalachuri dynasty
कलचुरि वंश - Kalachuri dynasty
वंशावली
(1) कोकल्ल प्रथम (850-885 ई.),
(3) युवराज प्रथम (915-945 ई.),
(5) शंकरगण तृतीय (970-980 ई.),
(7) कोकल्ल द्वितीय (990-1015 ई.),
(9) लक्ष्मीकर्ण (1041-1072 ई.),
(11) गयाकर्ण (1123-1151 ई.),
(13) जयसिंह (1167-1180 ई.), प्रमुख शासक: गांगेयदेव तथा लक्ष्मीकण। गांगेयदेव
(2) शंकरगण द्वितीय (890-910 ई.),
(6) युवराज द्वितीय (980-990 ई.).
(4) लक्ष्मणराज द्वितीय ( 945-970 ई.),
(8) गांगेयदेव (1015-1040 ई.),
(12) नरसिंह (1151-1167 ई.).
(10) यश: कर्ण (1073-1123 ई.),
(14) विजयसिंह (1180-1212 ई.)।
कोकल्ल द्वितीय के पश्चात् उसका शक्तिशाली पुत्र गांगेयदेव सिंहासनारूढ़ हुआ। यह अत्यधिक महत्वाकांक्षी एवं प्रतापी शासक था। वह अपने वंश के सर्वाधिक शक्तिशाली एवं योग्य शासकों में से एक था। अपनी विजयों से उसने अपने वंश के गौरव में आशातीत वृद्धि की। अपने शासन काल के प्रारंभ में उसने संभवतः चंदेल शासक विद्याधर की आधीनता स्वीकारी थी परंतु शीघ्र ही वह स्वतंत्र हो गया। सर्वप्रथम गांगेयदेव ने मालवा के परमार नरेश भोज एवं दक्षिण के चोल शासक राजेन्द्र चोल से मैत्री कर कुंतल के चालुक्य वंशी शासक जयसिंह पर आक्रमण किया। तत्पश्चात् उसने दक्षिण कोसल के शासक सोमवंशी महाशिवगुप्त पर आक्रमण किया। इन दोनों आक्रमणों के पश्चात् उसने तुम्माण के कलचुरि शासक कमलराज की सहायता से उड़ीसा के शासक शुभंकर द्वितीय पर आक्रमण पर उसे पराजित किया। इन तीनों विजयों के उपलक्ष्य में गांगेयदेव ने त्रिकलिंगाधिपति की उपाधि धारण की। गांगेयदेव ने चंदेलों अभियान के उपलक्ष्य में गांगेयदेव ने महाराजाधिराज, परमेश्वर एवं विक्रमादित्य जैसे विरुद धारण किये।
की सत्ता को अस्वीकार कर उत्तर भारत में काँगड़ा तक अपने राज्य का विस्तार किया। प्रतिहारों के पतन के पश्चात् गांगेयदेव ने प्रयाग और वाराणसी को भी अपने अधिकार में कर लिया। इस क्षेत्र पर अधिकार के पश्चात् उसने मगध पर विजय प्राप्त की और पालवंशीय जयपाल को परास्त किया। इन क्षेत्रों पर विजय
लक्ष्मीकर्ण
गांगेयदेव के पश्चात् कलचुरि राजसिंहासन का उत्तराधिकारी उसका यशस्वी पुत्र कर्ण 1041 ई. में सिंहासनारूढ़ हुआ। वास्तव में कर्ण एक महान विजेता, कुशल शासक एवं कूटनीतिज्ञ सम्राट भी था। यह कलचुरि वंश का सबसे प्रतापी सम्राट हुआ। उसके शासन काल के अनेक अभिलेख प्राप्त हुए हैं। अमरकण्टक (शहडोल) में उसके द्वारा बनवाये गये मंदिर आज भी विद्यमान हैं।
रासमाला नामक ग्रंथ में 136 राजाओं द्वारा कर्ण की सेवा करने का उल्लेख मिलता है। वाराणसी अभिलेख में उल्लिखित है कि पृथ्वी पर कर्ण की तुलना महाभारत के कर्ण के समान है। उसने अपने समकालीन राजाओं को पराजित किया एवं पैतृक साम्राज्य में आशातीत वृद्धि की।
रीवा से प्राप्त कलचुरि, सं. 800 के शिलालेख में कर्ण के शासनकाल के प्रारंभिक सात वर्षों के
विजय अभियानों का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। उसने पूर्वी बंगाल के राजा गोविंद चंद्र व उसके
उत्तराधिकारी को पराजित किया। प्रबोध चंद्रोदय नाटक में उल्लिखित है कि कर्ण ने बुंदेलखंड के चंदेल
राजा को पराजित कर जेजाकभुक्ति प्रदेश को अपने राज्य में मिला लिया।
उपरोक्त वर्णित सभी विजयों के फलस्वरूप कर्ण ने अपने समकालीन भारतीय शासकों के मध्य अपना अत्यंत ही गौरवपूर्ण स्थान स्थापित किया था। समकालीन शासकों को पराजित करके सामरिक दृष्टि से वह उच्चतम शिखर पर पहुँच गया।
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