भारतवंशियों को मानवाधिकार से वंचित करने वाले कानून - Laws depriving Indian people of human rights
भारतवंशियों को मानवाधिकार से वंचित करने वाले कानून - Laws depriving Indian people of human rights
जुलू विद्रोह का दमन करने के पश्चात् ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा भारतीयों पर अत्याचार करना प्रारंभ कर दिया गया। जनरल स्मट्स एवं अन्य दूसरे अधिकारियों का विचार था कि पाश्चात्य सभ्यता एवं भारतीय सभ्यता का मिश्रण एवं साथ-साथ विकास संभव नहीं है तथा पाश्चात्य सभ्यता के लिए भारतीय सभ्यता नुकसानदेह है। ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर रंग-भेद नीति संबंधी कानून की कठोरता बढ़ती गई। जब कठोरतम कानून 'एशियाटिक रजिस्ट्रेशन एक्ट पारित हुआ तब मोहनदास करमचंद गांधी ने घोषणा कर दी कि हम इसका सामना करेंगे और इसके समक्ष झुकने से इनकार करेंगे।"
ब्रिटिश साम्राज्यवादी उपनिवेश में ट्रांसवाल सरकार द्वारा 22 अगस्त 1906 ई. को एक कठोरतम
शासनादेश जारी किया गया, जिसके प्रमुख नियम निम्नलिखित थे-
1. ट्रांसवाल में रहने का अधिकार रखने वाले प्रत्येक भारतवंशी, स्त्री-पुरूष तथा 8 वर्ष की उम्र से अधिक के बच्चों को ठिकाना, उम्र, जाति का उल्लेख करते हुए अपना नाम एशियाटिक दफ्तर में लिखाकर परवाना प्राप्त करना होगा।
2. पुराने परवाने को एशियाटिक दफ्तर में अधिकारियों को वापस करना होगा।
3. नाम दर्ज करने वाले अधिकारी (रजिस्ट्रार) को अर्जी दाखिल करने वाले अर्जदार के शरीर पर
कोई खास निशान हो तो उसे लिख लेना चाहिए।
4. अंगूठा तथा दूसरी अंगुलियों की छाप देनी होगी।
5. एक निश्चित अवधि के भीतर अपना नाम एशियाटिक दफ्तर रजिस्ट्रार के पास दर्ज करने की अर्जी नहीं देने पर ट्रांसवाल में निवास करने के अधिकार से वंचित होना होगा।
6. अर्जी न दाखिल करना कानून के अनुसार अपराध माना जाएगा।
7. अपराध के लिए जुर्माना किया जा सकता है तथा जेल की सजा हो सकती है और कोर्ट उचित
समझे तो अपराधी को देश निकाला की सजा भी दे सकती है।
8. बच्चों की अर्जी माता-पिता को देना होगा। बच्चों को अधिकारियों के समक्ष प्रस्तुत करना,
अंगुलियों की छाप एवं निशानियों को देने की जिम्मेदारी माता-पिता की होगी।
9. माता-पिता को यह जिम्मेदारी नहीं निभाने पर सजा हो सकती है।
10. पुलिस अधिकारी द्वारा परवाना माँगे जाने पर उसे प्रस्तुत करना अनिवार्य होगा। परवाना न प्रस्तुत
करने पर अपराधी माना जाएगा और जुर्माना, कैद, देश निकाला आदि की सजा हो सकती है। उपर्युक्त नियम के इस पर टिप्पणी करते हुए महात्मा गांधी ने कहा कि “मैंने ऐसा विधान (नियम) कभी नहीं देखा जो किसी भी देश के स्वतंत्र व्यक्तियों के विरुद्ध निर्मित किया गया है। बोअर युद्ध में भारतीयों का सहयोग एवं सज्जनता के बदले यह कानून बनाया गया था, महात्मा गांधी ने इस कानून को "खूनी कानून' कहा।
यह कानून दक्षिण अफ्रीका में परिचय कराने के लिए 'खूनी कानून' के रूप में प्रचलित हो गया था। 'दि ट्रांसवाल ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन की सदस्यता काफी बड़ी थी, किंतु महात्मा गांधी उन्हें संघर्ष में प्रत्यक्ष रूप से सम्मिलित नहीं करना चाहते थे। इस समय ट्रांसवाल में महात्मा गांधी ने पैसिव रेजिस्टेन्स एसोसिएशन नामक एक नई संस्था बनाई। वे जानते थे कि यह संघर्ष दीर्घकालिक होगा। इसलिए उन्होंने कहा- मैं साहसपूर्वक एवं निश्चयपूर्वक यह घोषणा कर सकता हूँ कि जब तक अपनी प्रतिज्ञा के प्रति अडिग मुट्ठी भर सच्चे लोग होंगे इस संघर्ष का केवल एक अंत हो सकता है और वह होगी विजया
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