लाँग - Long
लाँग - Long
कुल - लवंग कुल (मिटेंसी Myrtaceae)। -
नाम - लै० सिजिगियम एरोमेटिकम (Syzygium aromaticum)। सं० लवंग, देवकुसुम (देवताओं को चढ़ाने वाले फूल-फूलों में श्रेष्ठ) श्रीप्रसून (सुन्दर पुष्प वाला), चन्दनपुष्पक (चन्दन के समान सुगन्धित पुष्प वारित (जल की अधिकता वाले द्वीपों में होने से), हि० लवंग, लौंग, म० गु० लवंग बं० लवंग, ता० किराम्बू. ते० कारावल्लु, अं० क्लोव (Clove) ।
स्वरूप इसका सदाहरित वृक्ष 30-40 फीट ऊँचा होता है। तने से चारों ओर - कोमल और कुछ झुकी हुई शाखायें निकल कर फैली रहती हैं पत्र हरे, 3-6 इंच लम्बे, अण्डाकार होते हैं।
पुष्प सुगन्धित, बैंगनी रंग के होते हैं। फल लवंगाकृति होता है जो मातृलवंग कहा जाता है। पुष्पकलियों को ही सुखाकर बाजारों में लौग के नाम से बेचते हैं।
उत्पत्तिस्थान यह मूलतः मलक्का द्वीप का पौधा है जंजीबार में इसकी विशेष उपज होती है। इसके अतरिक्त पिनांग, मारिशस एवं श्रीलंका द्वीपों में भी उगाया जाता है। भारत में अधिकांश तंजानिया और सिंगापुर से आता है। भारत में तमिलनाडु और केरल में लगाया गया है।
संग्रह 7-8 वर्ष की आयु में पेड़ों में कलियां लगने लगती हैं। 30-60 वर्ष - के वृक्षों से पूरी उपज मिलती है।
अविकसित कलिकायें पेड़ों पर चढ़ कर तोड़ी जाती है जब ये कलिकायें हरी से कुछ गुलाबी होने लगती हैं तभी तोड़ने का उपयुक्त समय होता है। अलग-अलग देशों में अलग-अलग समय में गुलाबी होने पर तोड़ी जाती हैं। केरल में जनवरी-फरवरी तथा नीलगिरी में जून में संग्रह किया जाता है। एक पेड़ से लगभग ढाई से साढ़े चार किलो लवंग प्राप्त होता है। तोड़ने के बाद कलियों को हाथ से रगड़कर वृन्त को अलग करते है और फिर चटाई या पक्के फर्श पर फैला कर धूप में 4-5 दिनों तक सुखा कर रख लेते हैं। सुखाने के बाद लगभग 60 प्रतिशत वनज कम हो जाता है।
मानक लवंग भूरे रंग का 10-20 मि०मी० लंबा, किंचित रूक्ष, आधारभाग किंचित बेलनाकार, शीर्षभाग पर गेंद के सदृश खिला हुआ अन्तः कोष जिसके ऊपर चतुर्दन्त बह्यकोष स्थित रहता है।
निचले भाग को दबाने पर कुछ तेल निकलता है। इसमें तीक्ष्ण सुगन्ध और कटुरस होता है। मानक के अनुसार इसमें उड़नशील तेल 15 प्रतिशत तथा क्षार 7 प्रतिशत होनी चाहिए।
रासायनिक संघटन सूखे लवंग में आर्द्रता 25.2 प्रोटीन 5.2, वसा 8.9 सूत्र - 9.5 अन्य कार्बोहाइड्रेट 46, खनिज द्रव्य 5.2 प्रतिशत होते हैं। इसके अतिरिक्त कॅलशियम 740, फास्फोरस 100, लौह 49 मि०ग्रा० तथा आयोडिन 50.7 ग्रा० होता है। विटामिनों में कैरोटिन 253 मा० ग्रा० थायमिन 0.08 मि० ग्रा० निकोटिनिक एसिड . 1.59 मि०ग्रा० रिबोप्लेविन 0.13 मि०ग्रा० प्रति 100 ग्रा० होते है। टैनिन (गैलोटैनिक एसिड) 13 प्रतिशत होता है।
लवंग से एक सुगन्धित तेल (Clove bud oil) 14.23 प्रतिशत निकलता है इसमें यूजिनाल (70-90 प्रतिशत), यूजिनाल एसिटेड (2-17 प्रतिशत), तथा कैरियोफाइलिन (Caryophyllene) मुख्य घटक होते है। एक जंगली प्रजाति भी होती है, जंगली लवंग से कम तेल निकलता है। जिसमें यूजिनाल भी नहीं होता है।
इसी प्रकार पुष्पवृन्तों से (Clove stem oil) 5.5-7 प्रतिशत से 6.5 प्रतिशत तथा कैरियोफाइलिन (Clove leaf oil) 4.5 प्रतिशत, लवंगफल (Mother of Clove) से 6.5 प्रतिशत तथा मूल से 6 प्रतिशत उड़नशील तेल प्राप्त होता है। औषधीय उपयोग में केवल कलिकाओं का ही तेल आता है। व्यापारिक स्तर पर लवंगतेल जंजीबार और पेम्बा तथा कुछ श्रीलंका, पेनांग और इण्डोनेशिया में इसका निर्माण होता है। भारत में लवंग तेल फ्रांस, ब्रिटेन, हालैण्ड तथा तंजानिया से आता है।
गुण
गुण लघु. स्निग्ध
रस - तिक्त, कटु
विपाक कटु
वीर्य शीत -
कर्म दोषकर्म - तिक्त कटु होने से कफ का तथा शीत होने से पित्त का शमन करता है। संस्थानिक कर्म - बाहय तीक्ष्ण होने से यह रक्तोत्क्लेशक, उत्तेजक एवं कृमिघ्न - होता है।
आभ्यन्तर - पाचनसंस्थान यह कटु तिक्त होने से दीपन, पाचन, रूचिवर्धक है। यह - तीक्ष्णता के कारण लालाग्रंथियों को उत्तेजित करता है जिससे लार का स्राव अधिक होता है और मुखशोष दूर होता है सुगन्ध के कारण मुख की दुर्गन्ध का नाश करता है। स्निग्ध होने से वातानुलोमन एवं शूल को दूर करता है यह यकृत् को भी उत्तेजित करता है।
रक्तवहसंस्थान यह हृदय एवं रक्तसंवहन को उत्तेजित करता है तथा रक्तभार को बढ़ाता है। रक्तविकारों को भी तिक्त होने के कारण दूर करता है।
श्वसनसंस्थान यह बाजीकरण, स्त्रियों में दूध बढ़ाने वाला एवं स्तन्यशोधन है। - मूत्रवहसंस्थान यह वृक्कों को उत्तेजित करता है और मूत्रजनन है।
त्वचा यह त्वचा को उत्तेजित करता है तथा उसके विकारों को दूर करता है। - तापक्रम यह तिक्त होने से आमपाचन और ज्वरघ्न है। -
सात्मीकरण कटुतिक्त होने से यह कटुपौष्टिक के रूप में कार्य करता है और क्षय जो दूर करता है। उत्सर्ग शरीर से इसका उत्सर्ग श्वास, पित्त, स्तन्य, स्वेद एवं मूत्र के द्वारा होता है।
प्रयोग
दोषप्रयोग यह कफपित्तजन्य विकारों में प्रयुक्त होता है। संस्थानिक प्रयोग बाहय शिरःशूल तथा जुकाम में माथे पर इसका लेप करते हैं। - मुखरोगों तथा त्वचा के रोगों में लवंग चूसते हैं।
लवंग का लेप भी चर्मरोगों में करते है। लवंग के तेल से आमवात, कटिशूल आदि वातविकारों में मालिश करते हैं दांत खोखले होने पर या दन्तशूल में इसका तेल रूई में भिगो कर कोटर में दबा कर रखते हैं इससे कृमि मर जाते है और शूल शांत हो जाता है। ध्वजभंग रोग में इसका तेल शिश्न पर लगाते है। -
आभ्यन्तर-पाचनसंस्थान अरूचि, अग्निमांद्य, अजीर्ण, आध्मान, उदरशूल, अम्लपित्त, छर्दि एवं तृष्णा में इसका प्रयोग होता है। यकृतविकारों में भी यह प्रयुक्त होता है।
जीर्ण ग्रहणीरोग तथा अम्लपित्त के लिये यह अच्छी औषध है। अम्लपित्त में यह आमदोष का पाचन कर अग्नि को दीप्त कर पाचन प्रक्रिया को ठीक करता है, पित्त के विदाह को शांत करता है तथा द्रवत्व का भी शोषण करता है।
रक्तवहसंस्थान इसका प्रयोग हृदौर्बल्य तथा रक्तविकारों में किया जाता है। फिरंग, उपदंश में भी यह लाभकर होता है। इसका एक योग देवकुसुमादि रस' इन रोगों में दक्षिण भारत में बहुत प्रचलित है। -
श्वसनसंस्थान यह कास, श्वास एवं हिचकी में प्रयुक्त होता है क्षयरोग में यह - कास को शांत करता है,
कफ की दुर्गन्ध को दूर करता है और उदरविकारों को ठीक करता है।
प्रजननसंस्थान यह शुक्रस्तम्भन योगों में दिया जाता है स्तन्यवृद्धि तथा स्तन्यशोधन के लिये भी उपयोगी है। मूत्रवहसंस्थान मूत्रकृच्छ में प्रयुक्त होता है।
त्वचा यह चर्मविकारों में लाभकर है। -
तापक्रम ज्वरों में इसका प्रयोग होता है। लवंगोदक का प्रयोग ज्वरों के लिए प्रशस्त - माना गया है।
इससे आमदोष का पाचन होता है तथा तृष्णा, वमन आदि उपद्रव शांत होते हैं। सात्मीकरण सामान्य दौर्बल्य तथा क्षयरोग में यह प्रयुक्त होता है।
प्रयोज्य अंग पुष्पकलिका । -
मात्रा - 1-2 ग्रा०, तेल 1-3
विशिष्ट योग लवंगादि चूर्ण, लवंगचतु सम, लवंगादि वटी, लवंगोदक, - अविपत्तिकर चूर्ण |
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