महात्मा गांधी का दक्षिण अफ्रीका में प्रवेश - Mahatma Gandhi's entry into South Africa
महात्मा गांधी का दक्षिण अफ्रीका में प्रवेश - Mahatma Gandhi's entry into South Africa
1893 ई. में मोहनदास करमचंद गांधी एक वकील के रूप में एक वर्ष की करार और 105 पौंड की फीस पर हिंदुस्तान से दक्षिण अफ्रीका के डरबन पहुँचे। डरबन में गुजरात के व्यापारी दादा अब्दुल्ला और प्रिटोरिया में गुजरात के ही मेमन व्यापारी तैयब हाजी खान अहमद की व्यापारिक फर्में थीं। दोनों व्यापारियों के बीच व्यापारिक मुकदमों से संबंधित नियुक्त अंग्रेज वकीलों, बैरिस्टरों को गुजराती करार को अंग्रेजी में निर्वचन के उद्देश्य से दादा अब्दुल्ला ने एम. के. गांधी को डरबन भेजा। मुकदमें के सिलसिले में रेल मार्ग से डरबन से प्रिटोरिया जाते समय कड़ाके की ठंड में आधी रात को मैरिसबर्ग स्टेशन पर गोरे रेलवे पुलिस के द्वारा नस्ल और रंगभेद की मानसिकता के कारण प्रथम श्रेणी की टिकट के बावजूद गांधी को अपमानित करके और धक्के मारकर उनके समान को बाहर फेंक दिया गया। रातभर प्रतीक्षालय रूम में कांपते हुए एम. के. गांधी सोचते रहे कि "इस अपमान के कारण यहाँ से भाग जाना कायरता होगी।
हाथ में लिया हुआ अपना काम मुझे पूरा करना ही चाहिए। व्यक्तिगत अपमान सहकर और मार खानी पड़े तो मार खाकर भी मुझे प्रिटोरिया पहुँचना ही चाहिए" (गांधी, दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह का इतिहास : 47) इस घटना से उनका जीवन ही परिवर्तित हो गया। गांधी ने उस दिन से दक्षिण अफ्रीका की गोरी सरकार के दमन एवं भेदभाव का विरोध प्रारंभ कर दिया। प्रवासी भारतीयों को संगठित कर उन्होंने सत्याग्रह आंदोलन छेड़ दिया।
1894 ई. 'नेटाल मर्क्युटी' अखबार में एक समाचार छपा, जिसमें नेटाल सरकार हिंदुस्तानियों को मताधिकार से वंचित करने वाली एक कानून पास करने वाली थी।
कानून का विरोध करने के लिए दादा अब्दुल्ला सहित सभी हिंदुस्तानियों ने गांधी को नेटाल में रुकने के लिए आग्रह किया। गांधी जी ने दक्षिण अफ्रीका के नेटाल के सर्वोच्च न्यायालय में वकालत के लिए पंजीकृत करवाया। यह प्रवासन उनके आध्यात्मिक, सामाजिक, राजनैतिक विकास के लिए महत्वपूर्ण था। नेटाल में भारतीयों को संगठित करने, अपने अधिकार के प्रति सचेत रखने के लिए नेटाल के सभी भारतीय वर्गों के सहमति और सहयोग से 1894 में नेटाल इंडियन कांग्रेस की स्थापना की, जिसके मंत्री एम. के. गांधी को बनाया गया। 1896 ई. के मध्य गांधी ने भारत लौटकर दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के मानवाधिकार आंदोलन के लिए भारतीय नेताओं से समर्थन माँगा।
इसी उद्देश्य से गांधी फिरोज शाह मेहता, बदरूद्दीन तैयबजी, महादेव गोविंद रणाडे लोकमान्य तिलक, प्रो. भंडारकर, गोपाल कृष्ण गोखले जैसे भारत के बड़े नेताओं से मिले और दक्षिण अफ्रीका में भारतीय लोगों की परिस्थिति से परिचय कराया। उसी वर्ष सपरिवार गांधी पुन दक्षिण अफ्रीका पहुँचे।
दक्षिण अफ्रीका में नेटाल इंडियन कांग्रेस, 1894 के संस्थापक सदस्य एवं मंत्री एम के. गाँधी
दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों को मानवाधिकारों से वंचित करने वाले ब्रिटिश सरकार के कानून, नीतियों के विरुद्ध गांधी ने आवाज उठाई और भारतीयों को संगठित कर निरंतर संघर्ष किया।
ब्रिटिश सरकार द्वारा बनाए जाने वाले कानूनों जैसे- अनिवार्य पंजीकरण तथा हस्तमुद्रण, अंतःप्रांतीय अप्रवासन पर प्रतिबंध, बंधक मज़दूरों पर लगाए गए कर तथा ईसाई विवाहों के अतिरिक्त अन्य सभी विवाहों को अमान्य ठहराने वाले कानूनों आदि के विरुद्ध सत्याग्रह किया। 1899 ई. में बोअर युद्ध जो अंग्रेज़ और अफ्रीका में रहने वाले डच मूल के लोग जिन्हें बोअर कहा जाता था, के समय गांधी ने 'इंडिन ऐम्बुलेंस कोर का गठन किया, जिसने युद्ध में उल्लेखनीय सेवा कार्य किया और उसके बदले उन्हें बोअर युद्ध पदक' प्रदान किया गया। बोअर युद्ध की समाप्ति के बाद 1901 ई. के अंत में गांधी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे।
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