महात्मा गांधी का फिजी पर प्रभाव - Mahatma Gandhi's influence on Fiji

महात्मा गांधी का फिजी पर प्रभाव - Mahatma Gandhi's influence on Fiji


सन् 1879 से ले कर सन् 1916 तक हजारों भारतीय गिरमिट की प्रथा के तहत फिजी द्वीप में गए। गिरमिट की अवधि को पूरी कर कितने ही भारतीय स्वदेश लौट आए, मगर इनमें से अधिकतर फिजी में ही रह कर स्वतंत्र रूप से खेती तथा व्यापार करने लगे। इनमें से अधिकांश अशिक्षित थे फिर भी उन्होंने अपनी लगन और मेहनत से फिजी के सामाजिक तथा आर्थिक विकास में पूरा-पूरा हाथ बँटाया। आर्थिक कठिनाइयों को झेलते हुए तथा भेदभावों का सामना करते हुए भी अपनी संतानों को शिक्षित करने में कोई कोर-कसर नहीं रखी। इन्हीं पूर्वजों की मेहनत और त्याग के फलस्वरूप फिजीद्वीप आज 'प्रशांत महासागर के स्वर्ग के नाम से प्रसिद्ध है (सनाढ्य तोताराम, फिजीद्वीप में मेरे 21 वर्ष,

लाल ब्रिज, वी. 2012)। तोताराम सनाढ्य इन्हीं गिरमिटिया में से एक थे, जिन्हें भारत के फिरोजाबाद से फुसलाकर फिजी ले जाया गया। इन्होंने फिजी में दयनीय स्थिति में रहने वाले भारतीयों की मदद के लिए एम. के. गांधी को पत्र लिखा। इसी पत्र से प्रेरित होकर गांधी जी नेडॉक्टर मणिलाल (1912-20) और सी. एफ. एंडूज़ (1916) को फिजी में काम रहे भारतीय गिरमिटिया मजदूरों एवं अन्य भारतीयों की मदद के लिए फिजी भेजा। डॉक्टर मणिलाल ने फिजी में रहकर भारतीय के विरुद्ध चल रहे अदालती मुकदमें में भारतीयों का पक्ष रखा। फिजी में बसे भारतीय गिरमिटिया मजबूरों और अन्य भारतीयों को संगठित करने के लिए द्विभाषीय अखबार 'इंडियन सेटेलर निकाला तथा 'इंडियन इम्पीरियल एसोसिएशन नामक संगठन बनाया। (लाल ब्रिज. वी. 2007: 370-382) इन्हीं संघर्षो और प्रेरणाओं के कारण महेंद्र चौधरी को फिजी का प्रधान मंत्री बनने का अवसर मिला जो भारतीय मूल के थे।