महमूद गजनवी - Mahmud Ghaznavi

महमूद गजनवी - Mahmud Ghaznavi


महमूद गजनवी का प्रारंभिक जीवन


तुर्क मध्य एशिया के निवासी थे। जनसंख्या बढ़ने पर उन्होंने अन्य देशों की ओर प्रस्थान किया। कुछ ही समय में मध्य एशिया के विभिन्न राज्यों ने इनके गुणों के कारण इनको सेना में भर्ती करना आरंभ किया। ये लोग हष्ट-पुष्ट तथा सुंदर थे। इनकी प्रवृत्ति सामरिक थी। धीरे-धीरे इन्होंने अपनी शक्ति का विस्तार किया और नए राज्यों की स्थापना की। गजनी में अल्पतगीन नामक तुर्क सरदार ने 961 ई. में स्वतंत्र राज्य की स्थापना की। उसकी मृत्यु के उपरांत अल्पतगीन के दोतीन वंशजों ने गजनी पर शासन किया। किंतु इतिहास में उनका कोई स्थान नहीं है।

अल्पतगीन के दामाद सुबुक्तगीन ने 977 ई. में इस वंश के अंतिम शासक का अंत कर गजनी पर प्रभुत्व स्थापित किया और नए राजवंश की स्थापना की। सुबुक्तगीन ने 20 वर्षों तक शासन किया और 997 ई. में उसकी मृत्यु हो गई। बीस वर्ष के शासनकाल में उसने एक विशाल एवं सुदृढ़ राज्य की स्थापना की।


सुबुक्तगीन की मृत्यु के उपरांत उसका ज्येष्ठ पुत्र महमूद गजनी के सिंहासन पर आसीन हुआ। उसने अपने पिता द्वारा स्थापित राज्य को और भी अधिक विशाल बनाने की चेष्टा की। उसने अपने पिता के स्वप्नों को साकार कर उसकी समस्त आशाओं को पूर्ण किया। महमूद ने एशिया के शक्तिशाली शासकों का दर्प चूर-चूर कर सुदूर प्रदेशों तक विजय दुंदभी बजाई।


महमूद गजनवी, योग्य पिता का योग्य पुत्र था। महमूद का जन्म 1 नवंबर, 971 ई. में हुआ। वह बड़ा वीर, महत्वाकांक्षी, साहसी तथा धार्मिक व्यक्ति था। उसमें धार्मिक उत्साह एवं कट्टरता कूट-कूट कर भरी थी। वह प्रत्येक समय धन तथा शक्ति हस्तगत करने की इच्छा रखता था। उसमें एक कुशल सैनिक तथा योग्य सेनापति के गुण विद्यमान थे। उसने प्रारंभ से ही यह संकल्प कर लिया था कि वह अपना अधिकांश समय तथा साम्राज्य के समस्त साधन इस्लाम धर्म के प्रचार में व्यतीत करेगा और मूर्ति पूजकों का भक्षण करेगा। उसने सुबुक्तगीन की बड़ी सेवा की। सुबुक्तगीन उसके कार्यों से बहुत प्रसन्न हुआ और उसने उसको खुरासान का प्रांतीय सूबेदार नियुक्त किया।

जिस समय सुबुक्तगीन की मृत्यु हुई वह खुरासान में था। अमीरों ने सुबुक्तगीन के छोटे पुत्र इस्माइल को सुल्तान घोषित किया। महमूद खुरासान से अपनी विशाल सेना लेकर गजनी की ओर चल पड़ा। दोनों भाइयों की सेनाओं में भीषण संग्राम हुआ। इस्माइल बंदी बना लिया गया और गजनी पर महमूद का अधिकार हो गया। 998 ई. में महमूद का राज्यारोहण बड़े ठाठ-बाट तथा शान-ओ-शौकत के साथ संपन्न हुआ। उस समय गजनी में अफगानिस्तान और खुरासान तक सम्मिलित थे। बगदाद के खलीफा ने भी महमूद को यमीन- उदौला तथा अमीन-उल-मिल्लत की पदवी प्रदान की थी।


महमूद गजनवी की विजय यात्रा


अपने कनिष्ठ भ्राता इस्माइल को परास्त कर महमूद गजनी का स्वामी बना।

वह बड़ा प्रतिभाशाली व्यक्ति था। उसने सिंहासन पर आसीन होते ही एक विशाल साम्राज्य की योजना बनाई जिसे पूरी करने में वह सफल हुआ। उसने अपने पूर्वजों के राज्य में बहुत वृद्धि की । राज्यरोहण के अगले वर्ष ही समनी वंश के उत्तराधिकार के प्रश्न पर झगड़ा आरंभ हुआ। उसने इस संघर्ष से लाभ उठाया। उसने खुरासान पर अधिकार कर लिया। इस प्रकार महमूद को अपने आरंभिक काल में ही यश की प्राप्ति हुई।


11 वीं सदी ई. में भारत की स्थिति राजनैतिक स्थिति


हर्ष की मृत्यु के उपरांत भारत में कोई भी ऐसा सम्राट नहीं हुआ, जिसमें इतनी शक्ति हो कि वह भारत को राजनीतिक सूत्र में संगठित कर,

बिखरी हुई शक्तियों को एकत्रित करने में सफल होता। अतः भारत छोटे-छोटे राज्यों में विभाजित हो गया। भारत के कुछ प्रदेशों जैसे सिंध तथा मुल्तान पर अरब वाले अपना राज्य स्थापित कर चुके थे। शेष भारत पर हिंदू राजा, राज्य कर रहे थे। ये राजवंश भारत के शत्रु के विरुद्ध भी एक झंडे के नीचे एकत्र नहीं हो सके, जिससे मुसलमानों को भारत में प्रविष्ट होने में असुविधा का सामना नहीं करना पड़ा। उन्होंने एक-एक कर भारतीय राजाओं को परास्त किया। उस समय भारत में निम्नलिखित राज्य विद्यमान थे-


(1) पंजाब का हिंदू शाही राज्य- भारत के उत्तर पश्चिम में प्रथम हिंदू राज्य था। उसका विस्तार चिनाब नदी से हिंदुकुश पर्वत तक था।

इस राज्य के राजाओं को मुसलमानों से कई भीषण संग्राम करने पड़े। इनके ही कारण अरबवासी उत्तरी भारत में प्रवेश नहीं कर सके थे। महमूद के आक्रमण के समय इस वंश का राजा जयपाल था, जो बड़ा वीर तथा कुशल सेनापति था। उसका सुबुक्तगीन से भी युद्ध हुआ था।


 (2) कश्मीर राज्य- दूसरा कश्मीर राज्य था। इस समय वहाँ एक स्त्री शासन कर रही थी, यहाँ के प्रदेशों में


अराजकता फैली हुई थी।


 (3) कन्नौज राज्य- कश्मीर के पूर्व में कन्नौज का राज्य था।

इस राज्य की बागडोर राज्यपाल के अधिकार में था, जो बड़ा अयोग्य शासक था जिसके कारण वहाँ की शासन व्यवस्था बड़ी डांवाडोल थी।


 (4) बंगाल का राज्य - बंगाल पर पाल वंश के राजा का अधिकार था। वह भी अधिक शक्तिशाली राज्य नहीं था। उसका कन्नौज से संघर्ष रहता था। दक्षिण के चोल वंश के प्रसिद्ध सम्राट राजेंद्र चोल ने उसे बुरी तरह परास्त कर उसकी शक्ति क्षीण कर डाली थी। इस प्रदेश पर छू होने के कारण महमूद ने आक्रमण नहीं किया।


(5) गुजरात के राज्य गुजरात पर चालुक्यों, बुंदेलखंड में चंदेलों और मालवा में परमारों का अधित्य था।

पहले इन राज्यों पर कन्नौज का अधिकार था, किंतु बाद में कन्नौज की शक्ति कम होते ही यहाँ नए राजवंशों का उदय हुआ, जिन्होंने अपने को कन्नौज राज्य से स्वतंत्र कर लिया।


(6) चोल राज्य- दक्षिण में चोलों का राज्य था। 


(7) चालुक्यों के राज्य-दक्षिण में चालुक्यों के विशाल राज्य थे, जिनमें पारस्परिक संघर्ष हो रहा था। इस प्रकार भारत विभिन्न राज्यों में विभक्त था।


अरब आक्रमण के उपरांत भारत पर किसी विदेशी जाति का आक्रमण नहीं हुआ था। इसके कारण भारतीयों ने भारत की उत्तरी पश्चिमी सीमा को सुरक्षित करने की ओर ध्यान नहीं दिया। उनको विदेशी आक्रमण का भय नहीं रहा। उन्होंने अपनी शक्ति का प्रयोग पारस्परिक संघर्षों में किया। इनमें राष्ट्रीय गौरव का अभाव था। उस समय भारत में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं था, जो उनका ध्यान इस ओर आकर्षित करता और उनको शिक्षा प्रदान करता कि भारत प्रत्येक व्यक्ति से अपने कर्तव्य का पालन करने की आशा करता है।



सामाजिक स्थिति


समस्त देश में अराजकता एवं अव्यवस्था फैलने के कारण भारतीयों का सामाजिक स्तर बहुत गिर गया था।

समस्त समाज विभिन्न श्रेणियों में विभक्त था। उनमें ऊँच-नीच की भावना बहुत अधिक विद्यमान थी। उनमें से कुछ अपने आपको बहुत ऊँचा समझने लगे तथा अन्य जातियों के व्यक्तियों को घृणा की दृष्टि से देखने लगे। जाति बंधन बड़े जटिल हो गए थे और उसका आधार 'कर्म' न होकर 'जन्म' हो चुका था। समाज में स्त्रियों का सम्मान कम हो गया था। वे भोग-विलास की सामग्री समझी जाने लगी थीं। भारत का विदेशों से संबंध विच्छेद हो गया था जिसके कारण विदेशों में होने वाली प्रतिक्रियाओं से भारतीय अनभिज्ञ रह गए। इस कारण इस काल में भारतीयों ने किसी भी क्षेत्र में उन्नति नहीं की। धार्मिक स्थिति


भारत की धार्मिक स्थिति दिन-प्रतिदिन पतन की ओर अग्रसर हो रही थी। इस क्षेत्र में भारतीयों की दशा शोचनीय थी।

इस स्थिति से उबारने का अथक परिश्रम स्वामी शंकराचार्य ने किया, किंतु अल्प आयु में मृत्यु हो जाने के कारण वे अपने कार्य में सफल नहीं हो सके। वे हिंदूधर्म को शुद्ध करने में सफल नहीं हुए। उनकी सेवाएँ हिंदू धर्म के लिए महान थी। इस समय के लोगों में आध्यात्मिक उन्नति की ओर विशेष चाव नहीं था। इस समय खुले मार्ग का बोलवाला था, जिसकी प्रमुख शिक्षा खाओ, पियो और भोजन करो थी। इससे शिक्षण संस्थाएँ भी प्रभावित हुई, जिसका परिणाम शिक्षित वर्ग तथा विद्यार्थियों पर विशेष रूप से पड़ा और उनका जीवन कलुषित हो गया।

इसका परिणाम यह हुआ कि मानव की प्रवृत्ति तथा आसक्ति, भोग-विलास की ओर बढ़ने लगी। मठों तथा विहारों में भी इसने घर कर लिया। जब धर्म के ठेकेदारों का ही जीवन अपवित्र तथा कलुषित हो गया तो साधारण जनता का तो क्या कहना था। इस समय भारत में देवदासी प्रथा आरंभ हो गई थी। प्रत्येक मंदिर में कुछ युवक तथा सुंदर अविवाहित कन्याएँ निवास करती थीं। इनका मुख्य कार्य मंदिर के आराध्य देवता की उपासना सेवा आदि करना था, किंतु बाद में इनको भोग-विलास का साधन समझा जाने लगा। अतः मठ, विहार, शिक्षण संस्थाएँ आदि सबका जीवन कलुषित हो गया और जनता को उचित धार्मिक शिक्षा प्राप्त होनी असंभव हो गई। आर्थिक स्थिति


भारत की आर्थिक स्थिति उन्नत थी। भारत धन-धान्य से पूर्ण था। भारत की अधिकांश जनता का मुख्य उद्यम कृषि था। भारत की उपजाऊ मिट्टी तथा खनिज पदार्थों की बहुलता के कारण भारतीयों को अपनी आजीविका के उपार्जन में कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ता था। राजाओं तथा उच्च कुल के व्यक्तियों का संपत्ति पर एकाधिकार था। उनकी आय बहुत अधिक थी। राजाओं तथा जनता का जीवन कलुषित था वे अपना अधिकांश धन भोग-विलास में व्यय करते थे। दान आदि के रूप में अत्यधिक धन मंदिर व अन्य सामाजिक व धार्मिक संस्थाओं को दिया जाता था।

इसके कारण मंदिरों की आय बहुत अधिक थी। किंतु आम आदमी को इतना अवश्य मिल जाता था कि उनकी दैनिक आवश्यकताएँ पूर्ण हो जाती थी और इनकी पूर्ति के लिए विशेष कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ता था। व्यापार भी उन्नत अवस्था में था। बाह्य व्यापार भी उन्नत था। इस उन्नत आर्थिक दशा के कारण ही भारत विश्व में 'सोने की चिड़िया के नाम से विख्यात था। भारत के धन को हस्तगत करने के लालच से ही महमूद गजनवी भारत पर आक्रमण करने के लिए आकृष्ट हुआ। वह भारत से अतुल संपत्ति लूटना चाहता था।