महमूद गजनवी का भारत पर आक्रमण - Mahmud Ghaznavi's invasion of India

महमूद गजनवी का भारत पर आक्रमण - Mahmud Ghaznavi's invasion of India


आक्रमण के उद्देश्य महमूद गजनवी के विभिन्न आक्रमणों के उद्देश्य निम्नलिखित थे-


(1) इस्लाम धर्म का प्रचार


कुछ विद्वानों की धारणा है कि वह सैनिक शक्ति द्वारा इस्लाम धर्म का प्रचार भारत में करना चाहता था। उसने प्रतिवर्ष भारत पर आक्रमण करने की शपथ ली थी।


 (2) संपत्ति प्राप्त करना


कुछ विद्वान इससे सहमत नहीं हैं कि महमूद ने भारत में इस्लाम के प्रचार के लिए आक्रमण किए उनके अनुसार उसके भारतीय आक्रमण मंदिरों में एकत्रित संपत्ति हस्तगत करने के उद्देश्य से किए गए थे।

यह धारणा सत्य के बहुत समीप है। भारत के धन पर ही उसकी लालची आँखें थी। और इसी से प्रभावित होकर उसने भारत पर आक्रमण किए। उसे मध्य एशिया में अपने साम्राज्य के विस्तार को दृढ़ रखने के लिए बहुत धन की आवश्यकता थी, जिसकी पूर्ति वह भारत से प्राप्त किए धन के द्वारा करता था। इसी कारण उसने राज्यों की राजधानियों पर आक्रमण नहीं कर समृद्धिशाली नगरों तथा प्रसिद्ध व धन- धान्य से पूर्ण मंदिरों को ही अपने आक्रमणों का लक्ष्य बनाया। इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि वह भारत में अपने राज्य का विस्तार नहीं चाहता था। यदि उसका भारत में राज्य स्थापित करने का उद्देश्य होता तो वह राजाओं को परास्त कर उनके राज्यों को अपने राज्य में सम्मिलित करता। संभवतः वह मध्य एशिया की राजनीति में इतना अधिक व्यस्त रहा कि भारत में राज्य का विचार उसके मस्तिष्क में उत्पन्न ही नहीं हुआ


महमूद गजनवी का भारत पर आक्रमण


वह शीतकाल के आरंभ में भारत पर आक्रमण करता था और ग्रीष्म काल के आरंभ होते ही गजनी वापस चला जाता था। लगभग, प्रत्येक आक्रमण में उसके समय विभाग का क्रम इसी प्रकार रहा। अपने साम्राज्य की उचित व्यवस्था करने के उपरांत उसने भारत पर आक्रमण किए। उसने भारत पर सत्रह आक्रमण किए जिनका वर्णन निम्न है- 


पंजाब पर आक्रमण


महमूद गजनवी ने सर्वप्रथम पंजाब के राजा जयपाल पर आक्रमण किया जो उसके पिता सुबुक्तगीन का कट्टर शत्रु था। महमूद ने उसके राज्य के सीमांत दुर्गम प्रदेशों पर आक्रमण कर उनको लूटा तथा उनके कई प्रदेशों पर अधिकार किया।

जब राजा जयपाल को यह समाचार विदित हुआ तो उसने आक्रमण करने के अभिप्राय से एक विशाल सेना का संगठन किया। इसी बीच महमूद अपनी सेना लेकर भारत की ओर बढ़ा। जयपाल युद्ध के लिए तैयार था। दोनों सेनाओं में पेशावर के निकट भीषण युद्ध हुआ। इस युद्ध में महमूद ने अपनी अश्वारोही सेना का सफलतापूर्ण संचालन किया जिसके कारण महमूद विजयी हुआ। यद्यपि राजा जयपाल ने बड़ी वीरता तथा उत्साह के साथ मुसलमानों की सेना का सामना किया, किंतु जयपाल अपने संबंधियों सहित बंदी बना लिया गया। बंदी अवस्था में वह महमूद के सामने उपस्थित किया गया। उसे मुक्त कर दिया गया। उसने उसके बदले बहुत सा धन तथा हाथी देने का वचन दिया।

इसके बाद महमूद ने राजा जयपाल की राजधानी वाहिंद पर आक्रमण किया और वहाँ से लूट-मार कर अतुल धन प्राप्त किया। अंत में दोनों में संधि हो गई। राजा जयपाल को बहुत अधिक धन देना पड़ा। राजा जयपाल अपनी पराजय के कारण बहुत दुःखी हुआ। वह इस अपमान को अधिक समय तक सहन नहीं कर सका और अपना राज्य अपने पुत्र आनंदपाल को सौंपकर स्वयं चिता में जलकर भस्म हो गया। तत्पश्चात् उसका पुत्र आनंदपाल 1002 ई. में सिंहासन पर आसीन हुआ।


सीमांत नगरों पर आक्रमण


1001 ई. में महमूद ने सीमांत नगरों तथा दुर्गों पर आक्रमण कर सीमांत के समस्त प्रदेशों को अपने राज्य में मिला लिया। वहाँ उसने अपने शासकों की नियुक्ति की । 


भेरा पर आक्रमण


1001 ई. में महमूद ने तीसरा आक्रमण सिंधु नदी पार कर झेलम नदी के तट पर स्थित भेरा नामक स्थान पर किया। वहाँ के राजा ने गजनी की सेना का बड़ी वीरता से सामना किया, किंतु विजय महमूद की ही रही । भेरा का राज्य उसने अपने राज्य में सम्मिलित किया। वहाँ के राजा ने आत्महत्या कर ली थी। 


मुल्तान पर आक्रमण


1005 ई. में महमूद ने मुल्तान पर चौथा आक्रमण किया। इस समय मुल्तान पर अब्दुल फतह दाऊद शासन कर रहा था। वह इस्लाम धर्म का पालन पूर्णरूप से नहीं करता था,

जिसके कारण महमूद ने उसके राज्य पर आक्रमण किया। मार्ग की कठिनाईयों का अनुमान करके महमूद ने पंजाब के राजा आनंदपाल से अपनी सेना को उसके राज्य से ले जाने की प्रार्थना की। किंतु उसने महमूद की प्रार्थना की ओर ध्यान नहीं दिया। वह महमूद का सामना करने के लिए विशाल सेना लेकर पेशावर की ओर चल पड़ा। अतः महमूद को पहले राजा आनंदपाल से युद्ध करना पड़ा। राजा आनंदपाल युद्ध में परास्त हुआ। उसने विवश होकर कश्मीर में शरण ली। इस विजय के बाद महमूद ने मुल्तान की ओर प्रस्थान किया। मुल्तान के शासक फतह दाऊद ने महमूद की सेना का बड़ी वीरता से सामना किया, किंतु परास्त हुआ। उसने महमूद को वार्षिक कर देने का वचन दिया तथा एक बड़ी धनराशि उसको भेट स्वरूप प्रदान की। महमूद राजा आनंदपाल के पुत्र सेवकपाल को भारतीय राज्य सौंप, गजनी चला गया। 


सेवकपाल पर आक्रमण


महमूद ने पाँचवा आक्रमण राजा आनंदपाल के पुत्र सेवकपाल पर किया। उसने महमूद के चले जाने के उपरांत अपने आपको स्वतंत्र शासक घोषित कर दिया था। सेवकपाल युद्ध में महमूद का सामना नहीं कर सका। वह परास्त हुआ और बंदी बना लिया गया। महमूद ने उससे दंड स्वरूप तथा युद्ध-क्षति के रूप में बहुत सा धन वसूल किया।


आनंदपाल पर आक्रमण


1008 ई. में महमूद ने राजा आनंदपाल पर आक्रमण किया। उसने मुल्तान के शासक फतह महमूद के शासन से मुक्त होने में सहायता प्रदान की थी तथा उत्तरी भारत में राजाओं का दाऊद को मुसलमानों की सत्ता का अंत करने के अभिप्राय से संघ निर्मित किया था।

महमूद राजा आनंदपाल के इस कार्य को सहन न कर सका। उसने उसकी राजधानी लाहौर पर आक्रमण किया। राजा आनंदपाल ने इस समय अन्य भारतीय नरेशों की सहायता प्राप्त की। उसकी दिल्ली, उज्जैन, ग्वालियर, कालिंजर, कन्नौज आदि के राजाओं ने सहायता की। दोनों सेनाओं में बड़ा भीषण संग्राम हुआ, जिसके कारण महमूद को युद्ध बंद करने का विचार करना पड़ा। परंतु उसी समय राजा आनंदपाल का हाथी बिगड़ गया और क्षेत्र से भागने लगा। इसका भारतीय सेना पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा। महमूद ने इस शुभ स्थिति से लाभ उठाया और अपनी सेना को तीव्रगति से आक्रमण करने का आदेश दिया। हिंदू सेना युद्ध-स्थल से भागने लगी। महमूद ने उसे बुरी तरह परास्त किया। इस युद्ध में बहुत से हिंदू सैनिक हताहत हुए और मुसलमानों को बहुत धन प्राप्त हुआ।

इस विजय में महमूद तथा उनके सैनिकों का उत्साह बढ़ गया। उसने काँगड़ा प्रदेश की राजधानी नगरकोट पर आक्रमण किया। उसको समाचार मिला था कि नगरकोट में स्थित ज्वाला जी के मंदिर में अतुल धन एकत्रित है। उसने इस धन को प्राप्त करने के अभिप्राय से आक्रमण किया। मुसलमान सेना ने काँगड़ा के दुर्ग को चारों ओर से घेर लिया। जब हिंदुओं ने अपनी रक्षा का कोई उपाय नहीं देखा तो उन्होंने दुर्ग के फाटक खोल आत्मसमर्पण कर दिया। मुसलमानों ने दुर्ग में प्रवेश कर उस पर अधिकार किया। वहाँ से भी महमूद को अतुल धन प्राप्त हुआ जिसको उसने विदेशी राजदूतों, सरदारों एवं प्रजा के समक्ष प्रदर्शित किया। 


तलावाड़ी का युद्ध


1010 ई. में महमूद ने भारत पर सातवाँ आक्रमण किया। इस बार वह दिल्ली पर आक्रमण करना चाहता था, किंतु मार्ग में ही उसको तलावाड़ी के निकट हिंदू सेना से युद्ध करना पड़ा। इस युद्ध में भी वह विजयी हुआ। वहाँ से वह बहुत सा धन लेकर स्वदेश वापस चला गया। मुल्तान पर आक्रमण।1011 ई. में महमूद ने आठवाँ आक्रमण मुल्तान पर किया। वहाँ के शासक अब्दुल फतह दाऊद ने अपने आपको स्वतंत्र शासक घोषित कर दिया था। महमूद विजयी हुआ और सुल्तान पर उसका अधिकार हो गया।


 थानेश्वर पर आक्रमण


1012 ई. में महमूद ने नौवाँ आक्रमण थानेश्वर पर किया। थानेश्वर के राजा के पास बहुत से हाथी थे। उसको उन पर बड़ा विश्वास था।

वास्तव में महमूद ने हाथियों को प्राप्त करने के लिए ही वह आक्रमण किया था। हिंदू सेना ने महमूद की सेना का वीरता से सामना किया, किंतु अंत में वहाँ के राजा को भागना पड़ा। महमूद विजयी हुआ और उसे बहुत से हाथी तथा अतुल धन प्राप्त हुआ। मुसलमान सैनिकों ने मंदिरों को खूब लूटा | 


लाहौर पर आक्रमण


महमूद ने दसवाँ आक्रमण लाहौर पर किया। इस समय वहाँ राजा त्रिलोचनपाल शासन कर रहा था। त्रिलोचनपाल के पुत्र भीमपाल ने बड़ी वीरता से मुसलमानी सेना का सामना किया, किंतु महमूद विजयी हुआ।

उसने समस्त पंजाब को अपने राज्य में मिला लिया। कश्मीर पर आक्रमण


1015 ई. में कश्मीर विजय के लिए लालायित होकर महमूद ने ग्यारहवाँ आक्रमण किया। उसके आक्रमण का उद्देश्य भीमपाल को बंदी करना था, जिसने कश्मीर में शरण ली थी। मौसम की खराबी के कारण इस आक्रमण में महमूद को सफलता प्राप्त नहीं हुई, उसे गजनी लौटना पड़ा। 


मध्य भारत पर आक्रमण


बारहवाँ आक्रमण बरन (बुलंदशहर) पर किया। महमूद विजयी हुआ। उसने अतुल धन प्राप्त किया। इसके बाद उसने महावत पर आक्रमण किया।

वहाँ से भी उसको बहुत सा धन प्राप्त हुआ और कुछ हाथी भी मिले। इसके बाद उसने मथुरा पर आक्रमण किया। वह हिंदुओं का पवित्र तीर्थ स्थान था। यहाँ महमूद का विशेष सामना नहीं हुआ। उसने नगर में प्रवेश कर मंदिर तथा नगर को खूब लूटा। उसके अधिकार में अतुल धन आया। उसके उपरांत उसने कन्नौज पर आक्रमण किया, जहाँ प्रतिहार वंश का राजा राज्यपाल शासन कर रहा था। इस समय कन्नौज उत्तरी भारत का केंद्र था। वहाँ हजारों संगमरमर के भवन धर्मात्मा के धर्म के समान दृढ बने हुए हैं तथा असंख्य मंदिर हैं। यहाँ से भी महमूद को बहुत सा धा तथा हाथी प्राप्त हुए। इसके बाद अन्य नगरों को लूटता हुआ वह स्वदेश चला गया।


कालिंजर पर आक्रमण


राजपूत राजा राज्यपाल के शत्रु हो गए थे, क्योंकि उन्होंने उसको कालिंजर के राजा के नेतृत्व में सिंहासन से उतार दिया। महमूद ने उसको दंड देने के अभिप्राय से 1019 ई. में तेरहवाँ आक्रमण कालिंजर पर किया। यहाँ का राजा गण्ड बड़ा वीर साहसी था, किंतु वह महमूद की सेना से भयभीत होकर रात्रि के समय दुर्ग छोड़कर भाग गया। अतः महमूद ने नगर को खूब लूटा और अतुल धन प्राप्त किया। पंजाब पर आक्रमण


पंजाब के शासन में शिथिलता उत्पन्न हो गई थी। सुव्यवस्था की स्थापना के अभिप्राय से उसने इस बार पंजाब पर आक्रमण किया। सीमांत प्रदेश के निवासियों का दमन करता हुआ वह आगे बढ़ा। उसने पंजाब में सुव्यवस्थित शासन की स्थापना की।


 ग्वालियर तथा कालिंजर पर आक्रमण


1022 ई. में उसने ग्वालियर तथा कालिंजर पर पंद्रहवाँ आक्रमण किया। वहाँ वह विजयी हुआ। वहाँ के राजाओं ने उसको बहुत सा धन तथा हाथी भेंट किए। 


सोमनाथ पर आक्रमण


महमूद के अंतिम आक्रमणों में सोमनाथ का आक्रमण सबसे महत्वपूर्ण तथा प्रसिद्ध आक्रमण था। यह उसका सोलहवाँ आक्रमण था, जो 1025 ई. में सौराष्ट्र के प्रसिद्ध मंदिर पर किया गया था। यह मंदिर सौराष्ट्र के समुद्र तट पर स्थित था, जिसमें एक विशाल शिव लिंग स्थापित था। महमूद इस मंदिर के एकत्रित धन के विषय में बहुत कुछ सुन चुका था।

अतः वह एक विशाल सेना लेकर सोमनाथ मंदिर के द्वार तक पहुँच गया। उसकी रक्षा के लिए अनेक राजपूत राजा तथा सैनिक एकत्रित थे। उन्होंने मुसलमानों की सेना का खूब डटकर वीरतापूर्वक सामना किया, किंतु विजय महमूद की हुई। उसने सोमनाथ की मूर्ति के टुकड़े-टुकड़े कर दिए और उस स्थान पर एक मस्जिद बनवाई। ये टुकड़े उसने गजनी, मक्का और मदीने भिजवा दिए, जहाँ वे गलियों में तथा मस्जिद की सीढ़ियों में डलवा दिए गए, जिससे मुसलमानों के पैरों के नीचे रौंदे जा सकें। जिस समय महमूद सोमनाथ की मूर्ति गदा से तोड़ रहा था तो ब्राह्मणों ने उससे मूर्ति न तोड़ने की प्रार्थना की तथा उसके बदले में उसे अतुल धन देने की प्रार्थना की, किंतु महमूद ने उनकी प्रार्थना की ओर ध्यान नहीं दिया। उसने कहा- "मैं मूर्ति बेचने वाले के नाम से नहीं, वरन तोड़ने वाले के नाम से विख्यात होना चाहता हूँ।" 


खोखरों पर आक्रमण


महमूद का सत्रहवाँ आक्रमण खोखरों के विरुद्ध हुआ। उन्होंने महमूद को गजनी वापिस जाते समय बहुत तंग किया था। इनकी धृष्टता का दंड देने के लिए महमूद ने उन पर आक्रमण किया और उनका बुरी तरह दमन किया।


 महमूद गजनवी की मृत्यु


30 अप्रैल, 1030 ई. के दिन उस महान विजेता की मृत्यु हुई। जिस समय उसकी मृत्यु हुई उस समय गजनी साम्राज्य बड़ा विशाल था। उसका राजकोष असंख्य धन राशि से पूर्ण था।