प्रमुख स्वायत्त महिला आंदोलन एवं उनका प्रभाव - Major autonomous women's movements and their impact

प्रमुख स्वायत्त महिला आंदोलन एवं उनका प्रभाव - Major autonomous women's movements and their impact


स्वायत्त महिला आंदोलन की शुरुआत 70 के दशक के मध्य से ही हम देख सकते हैं। स्वायत्त महिला आंदोलन के उद्भव और विकास हेतु 70 के दशक के उत्तरार्ध के साथ हमें दो दशकों को समझना होगा। 70 का दशक स्वायत्त महिला आंदोलन की पृष्ठभूमि बनाने में महत्वपूर्ण है। जोशीमठ में 74-75 में हुए पर्यावरण की सुरक्षा हेतु पहाड़ की महिलाओं के एकजुट प्रयास के फलस्वरूप हुए चिपको आंदोलन को स्वायत्त महिला आंदोलन के पहले प्रयास के रूप में देख सकते हैं, जिसके कारण पहाड़ों के वन, व्यापारियों के हाथों से बच सके। इस आंदोलन ने भी स्पष्ट किया कि महिलाओं के मुद्दे सिर्फ महिला केंद्रित ही नहीं है, बल्कि उस हर बात से उनका संबंध है

जो महिलाओं के जीवन को प्रभावित करती है। इस आंदोलन ने पर्यावरण सुरक्षा के साथसाथ पुरुषों की शराब पीने की लत को भी आंदोलन का मुद्दा बनाया और उस इलाके में शराब बंद कराई। 80 के दशक में जहाँ स्वायत्त महिला आंदोलन ने अपनी गति पकड़ी, वहीं 90 के दशक में इन आंदोलनों का सामना नई और बहुत अलग स्थितियों से हुआ 80 के दशक में स्वायत्त महिला आंदोलन का उद्भव महिलाओं के विरुद्ध होने वाली हिंसा के माध्यम से हुआ। इनमें अधिकांश शिक्षित शहरी कामकाजी या पढने वाली महिलाएँ शामिल थीं। महिलाओं को एक सूत्र में बाँधने वाले मुद्दे हिंसा को उन्होंने केंद्र में रखा जिसमें बलात्कार, दहेज हत्या,

सती प्रथा और कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के अतिरिक्त पर्यावरण की सुरक्षा, समान नागरिक संहिता जैसे तमाम मुद्दों को केंद्र में लाकर आंदोलनों की शुरुआत की गई जबकि 90 के दशक में महिलाओं के विरुद्ध हिंसा, पारिवारिक दायरे से निकलकर समाज और राजनीति तक पहुँच गयी थी। निजी क्षेत्र में घरेलू हिंसा के साथ ही सांप्रदायिक हिंसा धर्मांधता का महिलाओं पर प्रभाव, जातिगत हिंसा, भूमंडलीकरण का विरोध, यौन अधिकारों की सुरक्षा, संपत्ति में बराबरी का अधिकार इत्यादि महत्वपूर्ण मुद्दे रहे। इन आंदोलनों में महिलाओं के एक बड़े वर्ग ने साथ दिया। कुछ आंदोलनों का संक्षिप्त परिचयनीचे दिया जा रहा है।