धर्म सुधार आन्दोलन की प्रमुख घटनायें - Major events of religious reform movement

धर्म सुधार आन्दोलन की प्रमुख घटनायें - Major events of religious reform movement


कृषक आन्दोलन


दक्षिणी जर्मनी में जमींदारों द्वारा कृषकों पर अत्याचार किये जाते थे। अतः कृषकों ने लूथर के धर्म- सुधार आन्दोलन से प्रोत्साहित होकर 1524 ई. में जमीदारों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। जमींदारों ने उस विद्रोह का दमन करना प्रारम्भ किया। मार्टिन लूथर शान्तिपूर्ण साधनों का समर्थक होने के कारण कृषकों के विद्रोह का विरोधी बन गया। लूथर के इस अप्रत्याशित व्यवहार ने कृषक उसके विरोधी बन गये। परिणामस्वरूप विद्रोह तो शान्त हो गया, परन्तु दक्षिणी जर्मनी की अधिकांश जनता कैथोलिक मत की समर्थक और लूथर की विरोधी बन गई। इस प्रकार जर्मनी धार्मिक आन्दोलन की दृष्टि से दो क्षेत्रों में विभक्त हो गया। उत्तरी क्षेत्र को इस विभाजन से गहरा आघात पहुँचा।


प्रोटेस्टेंट मत की स्थापना


1526 ई. में स्पीयर नामक स्थान पर जर्मनी के राजकुमारों और शासकों की एक सभा धार्मिक संघर्ष के सम्बन्ध में आयोजित की गई किन्तु किसी भी निर्णय पर नहीं पहुँचा जा सका। अतः यह निश्चित किया गया कि जब तक साधारण सभा इस सम्बन्ध में अपना निर्णय न दे उस समय तक जर्मनी के विभिन्न राज्य धर्म के सम्बन्ध में अपनी इच्छानुसार व्यवहार कर सकते हैं। 1529 ई. में दूसरी बार सभा बुलाई गई जिसमें कैथोलिकों और लूथर के अनुयाइयों में तीव्र वाद-विवाद हुआ। कैथोलिकों ने लूथर के विरोध में वर्म्स की सभा के निर्णय के अनुसार प्रस्ताव पास करना चाहा जिसका लूथरवादियों ने घोर विरोध किया।

घोर विरोध के कारण ही लूथरवादी उस समय से प्रोटेस्टेंट तथा उनका धर्म प्रोटेस्टेंट कहलाने लगा। विलियम स्टब के शब्दों में "स्पीयर की सभा के विरुद्ध लूथर के समर्थकों ने भारी विरोध किया। इसी विरोध के कारण लूथर के समर्थक प्रोटेस्टेंट कहलाने लगे।"


श्मालकाल्डेन संघ का निर्माण


पवित्र रोमन सम्राट चार्ल्स पंचम प्रोटेस्टेंटों का घोर विरोधी था। अतः उसके विरोध से अपनी रक्षा करने के लिये उत्तरी जर्मनी के लूथरवादी राज्यों ने परस्पर मिलकर 1531 ई. में श्मालकाल्डेन संघ का निर्माण किया। इस संघ के सदस्यों में सेक्सनी ब्राण्डेन्बर्ग और हेस प्रमुख थे।


मार्टिन लूथर का स्वर्गवास


1546 ई. में चार्ल्स पंचम ने श्मालकाल्डेन संघ का दमन करने के लिये एक सेना का संगठन किया और संघ पर आक्रमण करने की योजना तैयार की। उसी समय अचानक लूथर का स्वर्गवास हो गया। उसकी मृत्यु के उपरान्त लूथर के धार्मिक सिद्धान्तों के सम्बन्ध में लूथरवादियों में कुछ मतभेद उत्पन्न हो गया। प्रोटेस्टेंटों की इस फूट का लाभ उठाते हुए चार्ल्स पंचम ने संघ पर आक्रमण कर दिया जिसमें चार्ल्स की विजय हुई उसकी शक्ति बढ़ गई। 


ट्रेंट की परिषद


पोप ने चार्ल्स पंचम की बढ़ती हुई शक्ति को सीमित करने के लिये ट्रेंट में चर्च की एक आम सभा बुलाई। इस सभा में कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट दोनों धर्मानुयाइयों को भाग लेना था।

पोप इस सभा में स्वयं उपस्थित नहीं हो सका और उसने अपने एक आदेश के द्वारा इस सभा को स्थागित कर दिया। किन्तु चार्ल्स ने पोप के आदेश को नजरांदाज कर आम सभा का आयोजन किया और दोनों धर्मों के अनुयाइयों को धार्मिक समझौते के लिये अवसर प्रदान किया तथा उसने प्रोटेस्टेंटों को कुछ सुविधायें भी प्रदान कीं। सम्राट चार्ल्स पंचम ने यह कार्य एक आदेश के तहत किये थे। अतः उसके इस कार्य को अन्तरिम समझौता कहते हैं। किन्तु यह आन्तरिक समझौता सफल नहीं हो सका और इससे कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट दोनों ही वर्ग असन्तुष्ट रहे और सम्राट के विरोधी बन गये।


चार्ल्स का जर्मनी से निकाला जाना


चार्ल्स ने अपने समर्थक मॉरिस को सेक्सनी का शासक नियुक्त किया था।

प्रोटेस्टेंटों और कैथोलिकों दोनों ही का विरोध होने से मोरिस ने भी चार्ल्स का समर्थन त्याग कर प्रोटेस्टेंटों का साथ देना आरम्भ किया। उसने फ्रांस के सहयोग से चार्ल्स पंचम पर आक्रमण करके उसे जर्मनी छोड़कर स्पेन भाग जाने के लिये विवश कर दिया। इस प्रकार जर्मनी में चार्ल्स का प्रभाव का अन्त हो गया।


आग्सबर्ग की सन्धि


1555 ई. में चार्ल्स के जर्मनी से भाग जाने के उपरान्त उसके भाई फर्डीनेण्ड ने एक अल्पकालीन सन्धि प्रोटेस्टेंटों के साथ सम्पन्न की।

यह सन्धि "पेसू का कन्वेन्शन" के नाम से प्रसिद्ध है। इसके उपरान्त 1555 ई. में एक स्थायी सन्धि प्रोटेस्टेंटों के साथ करके जर्मनी में फैली हुई दीर्घकालीन धार्मिक अशान्ति का अन्त करके शान्ति की स्थापना की गई। सन्धि का परिणाम


यह सन्धि जर्मनी से धार्मिक संघर्षों का सदैव के लिये अन्त करने के अभिप्राय से की गई थी। इसके द्वारा यद्यपि आगामी 50 वर्षों तक धार्मिक संघर्ष शान्त रहे, परन्तु स्थायी शान्ति की स्थापना नहीं की जा सकी। कैथोलिकों की यह इच्छा थी कि धर्म परिवर्तन करने वाले व्यक्तियों की सम्पत्ति उन्हें न देकर चर्च को दे दी जाए। इसके विपरीत प्रोटेस्टेंटों ने इस बात पर बल दिया कि जो व्यक्ति धर्म परिवर्तन करे उसकी सम्पत्ति भी उसी के साथ रहे। इस मतभेद के कारण ही तीस वर्षीय युद्ध की अग्नि में देश को झुलसना पड़ा। शैविल ने इसके विषय में लिखा है- "सन्धि की इस धारा ने कैथोलिकों और प्रोटेस्टेंटों में मतभेद की उत्पत्ति की जिसके कारण आगे चलकर तीस वर्षीय युद्ध हुआ।”