समुद्रवर्ती गतिविधियाँ - maritime activities

 समुद्रवर्ती गतिविधियाँ  - maritime activities


चीन एवं दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के साथ संबंध


सामुद्रिक व्यापार की चोल साम्राज्य की समृद्धि में महत्वपूर्ण भूमिका थी। वस्तुतः चोल राजाओं के शासनकाल में दक्षिण भारत और चीन के बीच समुद्रवर्ती व्यापार अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँचा। दसवीं सदी के अंत में चीन की समकालीन शुंग सरकार ने विदेशी व्यापार के प्रति गहरी रुचि दिखाई और उसने भारत-चीन व्यापार को राज्य का एकाधिकार बना दिया।


इस स्थिति से लाभ उठाने के लिए चोल राजाओं ने भी अपने दूत चीन भेजे। चीनी साहित्य से ज्ञात होता है कि चोल व्यापारियों का एक प्रतिनिधिमंडल 1015 ई. में चीन पहुँचा।

इस प्रतिनिधिमंडल को चीन पहुँचने में तीन वर्ष का समय लगा था। इसलिए अनुमान किया जाता है कि वह राजराज- प्रथम के शासनकाल के अंतिम वर्षों में दक्षिण भारत से चला होगा। व्यापारियों का एक दूसरा प्रतिनिधिमंडल राजेंद्र प्रथम के शासनकाल में भेजा गया, जो 1033 ई. में चीन पहुँचा। कुलोत्तुंग-प्रथम के शासनकाल में भी 1077 ई. में 72 व्यापारियों का एक दूतमंडल चीन पहुँचा, जहाँ इसे काँच के बर्तनों, कपूर, गैंडा के सींग, हाथी दाँत, लौंग आदि वस्तुओं के बदले में 8108 ताम्र मुद्राओं की लड़ी मिली।


श्रीविजय साम्राज्य के विरुद्ध राजेंद्र चोल को अपने नौसैनिक अभियान में जो सफलता मिली,

उससे दक्षिण भारत और चीन के बीच समुद्रवर्ती संपर्क का रास्ता पहले से और भी अधिक मजबूत हो गया। राजेंद्र प्रथम का दक्षिण पूर्व एशिया में अवस्थित श्रीविजय साम्राज्य के विरुद्ध नौसैनिक अभियान चोल इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। इस अभियान में चोल सेना ने राजधानी श्रीविजय सहित कई स्थानों पर अधिकार कर लिया। राजा संग्राम विजयोतुंगवर्मन बंदी बना लिया गया पर अंततः उसे चोलों का प्रभुत्व स्वीकार कर लेने की शर्त पर रिहा कर दिया गया और उसे उसका राज्य भी वापस कर दिया गया।


दक्षिण पूर्व एशिया में अवस्थित मलय प्रायद्वीप एवं इंडोनेशिया में 8वीं सदी से 13वीं सदी तक शैलेंद्र वंश का शासन था।

इनकी राजधानी श्रीविजय थी और इनके निवासी भारतीय मूल के थे। राजराज एवं राजेंद्र-प्रथम के शासन-काल के प्रारंभिक वर्षों में चोल राजाओं एवं इनके बीच मैत्रीपूर्ण संबंध थे। वस्तुतः राजराज ने शैलेंद्र शासक विजयोतुंगवर्मन को नागपट्टम में न सिर्फ एक बौद्ध विहार बनाने की अनुमति प्रदान की थी, बल्कि उसके रखरखाव के लिए एक गाँव भी अनुदान में दिया था। ऐसी स्थिति में एक स्वाभाविक प्रश्न यह उठता है कि राजेंद्र प्रथम ने श्रीविजय पर क्यों आक्रमण किया। कुछ इतिहासकारों का मत है कि राजेंद्र प्रथम समुद्रपार साम्राज्य स्थापित करना चाहता था। दूसरे शब्दों में, समुद्रपार साम्राज्य स्थापित करने की आकांक्षा ने उसे श्रीविजय पर आक्रमण करने हेतु प्रेरित किया।

किंतु यह मत सही नहीं है, क्योंकि यदि ऐसी बात होती तो विजित प्रदेशों में भारतीय उपनिवेश स्थापित किए जाते और अधिक से अधिक प्रदेशों को जीतने का प्रयास किया जाता। पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ।


वस्तुतः भारतीय व्यापारिक हितों की किसी भी प्रकार के हस्तक्षेप से रक्षा करने की नीति ही राजेंद्र चोल- प्रथम के आक्रमण का कारण बनी। दसवीं सदी के अंत तक दक्षिण भारत एवं चीन के बीच समुद्रवर्ती व्यापार अत्यंत विकसित हो चुका था। यह व्यापार उन समुद्री मार्गों से होता था, जो श्रीविजय साम्राज्य के अधीन थे।

संभवतः संगामविजयोतुंगवर्मन ने इस व्यापार में कोई बाधा खड़ी कर दी। उसने शायद यह सोचा हो कि यदि भारत-चीन व्यापार का श्रीविजय में अंत हो जाए तो इससे श्रीविजय के स्थानीय व्यापारी वस्तुओं को उनके गंतव्य तक पहुँचाकर लाभ अर्जित कर सकते हैं। इससे राजेंद्र प्रथम अप्रसन्न हो गया और इस तरह श्रीविजय साम्राज्य के साथ युद्ध की स्थिति बन गई। संभव है, इस व्यापार में राजेंद्र प्रथम की भी पूँजी लगी हुई हो।


रॉकहिल का मत है कि चीन में दो प्रकार की वस्तुओं का आयात होता था (1) सूती वस्त्र, मसाले और औषधियाँ एवं (2) बहुमूल्य रत्न, हाथी दाँत, गैंडे की सींग,

आबनूस, अंबर, मूंगा आदि। इसके साथ ही साज-शृंगार की वस्तुओं और इत्र का भी आयात किया जाता था। इनका मूल्य अधिक होता था, किंतु फिर भी चीन में ऐसे द्रव्यों की माँग बराबर बढ़ती गई। इसलिए चीन की सरकार ने इनके विक्रय का एकाधिकार अपने हाथ में ले लिया था। इस व्यापार से चीन को भी लाभ होता था। किंतु बाद में इन वस्तुओं का आयात इतना बढ़ गया कि बड़े पैमाने पर चीन के सिक्के बाहर जाने लगे। यह बात 12वीं सदी में प्रकाश में आई। इसलिए चीन की सरकार ने कानून बनाकर क्विलोन तथा कोरोमंडल तट से आने वाली वस्तुओं पर प्रतिबंध लगा दिया।


चीन द्वारा भारतीय आयात पर प्रतिबंध लगाए जाने के बाद भी चीन और दक्षिण भारत के बीच में व्यापार पूर्व की तरह ही चलता रहा।

चाउ जु कुआ के विवरणों से संकेत मिलता है कि 13वीं सदी में चीन में सूती वस्त्र, दालचीनी, सुपारियाँ, मोती, मूँगे, हाथी दाँत आदि आयात होते रहे। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि फारमोसा के निकट चुआन चाऊ बंदरगाह में अवस्थित एक चीनी मंदिर में हिंदू देवताओं की कुछ मूर्तियाँ मिली हैं। इनकी बनावट दक्षिण भारतीय मूर्तियों की तरह है। तेरहवीं सदी की इन मूर्तियों से यही संकेत मिलता है कि चुआन चाऊ में अभी भी दक्षिण भारतीय व्यापारियों की एक बस्ती थी।


चोल राजाओं के शासनकाल में पश्चिम में फारस की खाड़ी के पूर्वी तट पर अवस्थित सिराफ वाणिज्य एवं व्यापार का एक प्रमुख केंद्र था। यहाँ भारत, चीन,

जापान और दक्षिण पूर्व एशिया के व्यापारी पश्चिमी देशों के व्यापारियों से वस्तुओं का आदान-प्रदान करते थे। सिराफ के बारे में दसवीं सदी का लेखक इस्तखरी कहता है कि वहाँ मसालों और औषधियों के साथ-साथ सुगंधित भारतीय इत्र, हाथी दाँत, चंदन की लकड़ी, कागज, आबनूस, बाँस, अंबर कपूर और बहुमूल्य रत्नों का आयात होता था। ग्यारहवीं सदी के मध्य में सिराफ का महत्व कम हो गया और इसका स्थान कीश द्वीप ने लिया। स्पेन का एक यहूदी यात्री, बेंजामिन बताता है कि पश्चिम में भारतीय व्यापारियों की यात्रा का अंतिम बिंदु कीश द्वीप था। वह कहता है कि भारत के व्यापारी यहाँ बड़ी मात्रा में मसाले लाते थे।


अभिलेखों से विदित होता है कि चोल राजाओं की सेना में घुड़सवारों का महत्वपूर्ण स्थान था। अभिलेखों में घोड़ों के सौदागरों के भी उल्लेख बार-बार आए हैं। इतिहासकारों का मत है कि दक्षिण भारत में अधिकांश घोड़े अरब से लाए जाते थे। मार्को पोलो ने चैदहवीं सदी में बड़े पैमाने पर ऐसे व्यापार का उल्लेख किया है। निश्चय ही यह व्यापार चोल काल में प्रारंभ हुआ होगा।


चोल राजाओं के प्रयास से दक्षिण भारत में कई बंदरगाह स्थापित किए गए जहाँ से पूर्व एवं पश्चिम के देशों के साथ सामुद्रिक व्यापार होते थे। इनमें पूर्वी तट पर अवस्थित महाबलिपुरम,

कावेरीपट्टनम, शालियर और कोर्के तथा मालाबार तट पर अवस्थित क्विलोन प्रमुख थे। इनके अतिरिक्त पूरब में अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह तथा पश्चिम में मालदीव और लक्षद्वीप लंबी समुद्री यात्रा पर जाने वाले जहाजों के लिए अच्छे पड़ाव थे।


चोल राज्य में वाणिज्य व्यापार का संचालन व्यापारियों द्वारा अथवा संघों या निगमों के द्वारा किया जाता था। इनके लिए सामान्य शब्द 'नगरम् ' था। लेकिन कुछ बहुत बड़े संघ, जो सामुद्रिक व्यापार का संचालन करते थे, विशिष्ट नामों से जाने जाते थे,

जैसे- मणिग्रामम, वलंजीयर और नानादेशि-प्रथम सुमात्रा से प्राप्त एक अभिलेख में नानादेशियों का उल्लेख है, जो इस बात का प्रमाण है कि सामुद्रिक व्यापार में इन निगमों की महत्वपूर्ण भूमिका थी। उल्लेखनीय है कि तेरहवीं सदी में नानादेशियों ने बर्मा में विष्णु का एक मंदिर बनवाया था।


बड़े व्यापारिक संघ आर्थिक जीवन के अत्यंत शक्तिशाली तत्व थे। इन संघों का गठन व्यापारियों द्वारा अपने व्यापार की सुरक्षा के लिए किया गया था। ये संघ उत्पादन-स्थल पर वस्तुओं को खरीदते थे और एक विस्तृत नेटवर्क के माध्यम से इन्हें विभिन्न स्थानों पर वितरित करते थे।

उनकी पहुँच इस महादेश और समुद्र पार के हर स्थान पर थी, उनकी अपनी वेतनभोगी सेनाएँ होती थी, जो यात्राओं में उनके जानमाल की रक्षा करती थीं। सामुद्रिक व्यापार के लिए उन्हें राज्य या सरकार की मदद की आवश्यकता नहीं थी। फिर भी, जब भी आवश्यकता हुई, राज्य ने उन्हें सहयोग दिया।


आर्थिक दृष्टि से अत्यंत समृद्ध होने के बावजूद इन व्यापारिक संघों ने राजनैतिक शक्ति प्राप्त करने का कभी प्रयास नहीं किया। इसका कारण इन व्यापारिक संघों में बड़ी संख्या में ब्राह्मणों की भागीदारी थी, जो राजा की शक्ति को चुनौती दिए जाने के विरोधी थे, क्योंकि सामुद्रिक व्यापार में लगाई जाने वाली पूँजी उन्हें राजा द्वारा अनुदान में प्राप्त भूमि से ही प्राप्त होती थी। इसके अतिरिक्त चोल राजाओं ने स्वयं इन व्यापार-संघों के व्यापार में पूँजी लगाई थी। इसलिए वे स्वयं इनके हितों की रक्षा में तत्पर रहते थे।