मार्टिन लूथर - Martin Luther
मार्टिन लूथर - Martin Luther
मार्टिन लूथर का जन्म 1483 ई. में आइसलेबेन में हुआ था। उसने एरफर्ट विश्वविद्यालय से कानून और धर्म की शिक्षा में उपाधि प्राप्त की। उसने बर्टेम्बर्ग विश्वविद्यालय में भी धर्मशास्त्र के अध्यापक के पद पर कार्य किया था। इस पद पर कार्य करते समय उसके हृदय में कैथोलिक धर्म एवं शास्त्रों के सम्बन्ध में अनेक प्रकार की शंकाएँ उत्पन्न हुई थीं। इन्हीं शंकाओं के समाधान तथा पोप और रोम के चर्च के दर्शनों की इच्छा से उसने 1505 ई. में रोम की यात्रा की। वहाँ उसने पादरियों के भ्रष्ट जीवन तथा पोप के दरबार में फैले हुए भ्रष्टाचार को देखा। इन दृश्यों ने उसकी धार्मिक आस्था को गहरी ठेस पहुँचाई।
उसने उसी समय भ्रष्टाचार और कैथोलिक धर्म में व्याप्त बुराइयों को दूर करने के लिये एक धार्मिक आन्दोलन प्रारम्भ करने का निश्चय किया। इसके उपरान्त 1517 ई. में बर्टेम्बर्ग में एक व्यक्ति टैटजिल क्षमापत्रों को बेचता हुआ आया। उसका कथन था कि "पोप के आदेश से इन क्षमापत्रों की बिक्री रोम में सेंट पीटर के गिरजाघर के पुनर्निर्माण के लिये धन संग्रह के लिये की जा रही थी। इन क्षमापत्रों को जो व्यक्ति खरीदेगा उसके सभी पाप कर्मों के लिये ईश्वर उसे क्षमा प्रदान करेगा और मृत्यु के बाद वह सीधा स्वर्ग जायेगा। “इस प्रकार जिसका जितना बड़ा अपराध अथवा पाप होता था उससे उतना ही अधिक धन क्षमापत्र के मूल्य के रूप में प्राप्त किया जाता था।
पोप के इस कार्य से अपराधियों को अपराध करने और उनकी क्षमा के लिये पोप को धन देने की प्रवृत्ति को प्रोत्साहन मिलता था। इस तरह अपराध वृत्ति को पोप द्वारा प्रोत्साहन प्रदान करना लूथर को अत्यन्त अनुचित प्रतीत हुआ। उसने ही सबसे पहले इन क्षमापत्रों की बिक्री और पोप की इस प्रवृत्ति का विरोध करते हुये अक्टूबर 1517 ई. में बर्टेम्बर्ग के गिरजाघर के द्वार पर 95 अकाट्य तर्कों की एक सूची लटका दी। इनके द्वारा उसने पोप के क्षमापत्रों की बिक्री एवं इसी प्रकार के अन्य कार्यों का विरोध किया था। लूथर के इन तर्कों ने जर्मन जनता को बहुत प्रभावित किया। हेज ने लूथर के विरोध का महत्व दर्शाते हुए लिखा है कि "1517 ई. में क्षमापत्रों के विरोध में लूथर द्वारा प्रस्तुत किये गये 95 अकाट्य तर्कों ने जर्मनी में पोप और उसके कैथोलिक धर्म के विरुद्ध देश व्यापी विरोध उत्पन्न किया और प्रोटेस्टेंट चर्च की स्थापना को सुगम बनाया।
पोप द्वारा लूथर का विरोध
मार्टिन लूथर के विरोध में रुष्ट होकर पोप लियो दशम् ने 1520 ई. में लूथर को धर्म का शत्रु घोषित किया। लूथर ने पोप के क्रोध की चिन्ता न करते हुये पोप के उस घोषणा पत्र को बर्टेम्बर्ग की सड़क पर जन- समूह के सम्मुख जला दिया और जनता को पोप के विरुद्ध आन्दोलन करने के लिये उत्साहित करते हुए कहा है कि ” अब सुधार के लिये धार्मिक क्रान्ति के अतिरिक्त अन्य कोई मार्ग शेष नहीं रहा है।" जर्मन जनता ने लूथर के आन्दोलन का स्वागत किया और लूथर के समर्थकों की संख्या द्रुतगति से बढ़ने लगीं।
वर्म्स की परिषद
पोप ने जर्मनी के शासकों को लूथर को दण्ड देने के लिये आदेश दिया तथा कुछ कट्टर कैथोलिकों ने भी लूथर का विरोध किया।
पवित्र रोमन सम्राट चार्ल्स पंचम ने वर्म्स नगर में लूथर को अपने दरबार में उपस्थित होने का आदेश दिया। लूथर के साथियों ने उसे दरबार में न जाने का परामर्श दिया, परन्तु लूथर ने अपने प्राणों की परवाह न करते हुए चार्ल्स के दरबार में उपस्थित होने का निश्चय किया। दरबार में चार्ल्स ने लूथर को अपना आन्दोलन और पोप का विरोध स्थगित करने के लिये कहा। लूथर ने उस आदेश को न मानते हुए कहा कि "मैं यहाँ उपस्थित हूँ। इसके अतिरिक्त मैं और कुछ नहीं कर सकता, भगवान मेरी रक्षा करें। " सम्राट चार्ल्स पंचम ने यह सुन कर लूथर को नास्तिक घोषित करके उसे राज्य की सुरक्षा से वंचित कर दिया।
मार्टिन लूथर का उत्कर्ष
सुरक्षा से वंचित होकर लूथर के जीवन के लिये भीषण संकट उत्पन्न हो गया।
अतः उसे अपने समर्थक सेक्सनी के शासक के यहाँ शरण लेनी पड़ी। सेक्सनी के शासन फ्रेडिक ने उसे बर्टेम्बर्ग के दुर्ग में स्थान दिया। दुर्ग में रहते हुए लूथर ने बाइबिल का जर्मन भाषा में अनुवाद किया जो जर्मनी में बड़ी लोकप्रिय हुई । सम्राट चार्ल्स पंचम यद्यपि लूथर से बुरी तरह रुष्ट था और उसे दण्डित करना चाहता था, परन्तु अपनी वैदेशिक समस्याओं में वह इतना उलझा हुआ था, कि वह लूथर के विरुद्ध कोई प्रभावपूर्ण कार्यवाही करने में असमर्थ रहा। नूरेम्बर्ग नामक स्थान पर 1552 ई. में एक सभा लूथर का विरोध करने के लिये बुलाई गई, किन्तु उस सभा में लूथर विरोधियों की अपेक्षा समर्थकों की संख्या कहीं अधिक थी। अतः लूथर के कार्यों के विरोध में प्रस्ताव पास नहीं हो सका, इसके अतिरिक्त उस सभा की यह बड़ी विशेषता रही कि उसमें लूथर के आन्दोलन के समर्थन में प्रस्ताव पास किया गया।
उस प्रस्ताव के पास हो जाने के कारण लूथर का आन्दोलन राष्ट्रीय आन्दोलन बन गया। थेचर ने इस सम्बन्ध में लिखा है कि- ""नूरेम्बर्ग के प्रस्ताव ने पोप के विरुद्ध जर्मनों की शिकायतों का प्रदर्शन किया तथा लूथरवाद को राष्ट्रीय रूप प्रदान किया।
मार्टिन लूथर के सिद्धान्त
मार्टिन लूथर ने कैथोलिक धर्म की बुराइयों को दूर करने तथा धर्म सुधार के अभिप्राय से एक नवीन विचारधारा का प्रचार किया। यही विचारधारा कलान्तर में "प्रोटेस्टेंट" कहलाई। मार्टिन लूथर के अनुसार पोप को मानव जाति के पाप क्षमा करने का अधिकार नहीं है। बाइबल के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को अपने कर्मों के आधार पर मोक्ष पाने का अधिकार है।
अपने सिद्धान्तों की लूथर ने निम्न प्रकार की व्याख्या की थी -
(1) बाह्य आडम्बर का त्याग
मार्टिन लूथर ने बाह्य आडम्बर, उपवास प्रायश्चित और तीर्थ-यात्रा आदि को धार्मिक व्यक्ति के लिये अनावश्यक बतलाया।
(2) परमेश्वर में आस्था
पापों के प्रायश्चित के लिये लूथर ने ईश्वर में आस्था का होना आवश्यक बताया। उसका कथन था कि ईश्वर में दृढ़ विश्वास ही मनुष्य को पापों से मुक्ति दिलाने का सर्वोत्तम साधन है। पोप के क्षमा- पत्रों द्वारा पापों की मुक्ति न होकर केवल पोप के कोष में वृद्धि होती थी।
(3) पुरोहितों का विरोध
लूथर का कथन था कि प्रत्येक ईसाई जिसका बपतिस्मा हो चुका है, स्वयं एक पुरोहित है। पुरोहितों के विवाह करने के अधिकार का वह समर्थक था।
(4) राष्ट्रीय चर्च का समर्थक
लूथर धर्माधिकारियों के विशेष अधिकारों का विरोधी था। वह पोप की सत्ता को अस्वीकार करते हुए बाइबिल में आस्था रखता था। धर्मदान को व्यक्ति का प्रमुख कत्र्तव्य मानता था तथा राष्ट्रीय चर्च की स्थापना का समर्थक था।
5) संस्कारों की अधिकता का विरोध
वह जन्म, प्रायश्चित एवं पवित्र भोज के संस्कारों को ही स्वीकार करते हुए अन्य सभी संस्कारों को अनावश्यक समझता था।
(6) ईश्वर की कृपा में दृढ़ विश्वास
लूथर का ईश्वर की कृपा और दया में अटूट विश्वास था। अतः वह संसार त्याग कर साधु बनना, ईश्वर की प्राप्ति के लिये अनिवार्य नहीं मानता था। उसका कहना था कि प्रत्येक मनुष्य अपने दैनिक कार्यों को करते हुए तथा दया और परोपकार की भावना का पालन करते हुए, स्वयं को ईश्वर का कृपा पात्र बना सकता है और मोक्ष की प्राप्ति कर सकता है।
(7) सेवा एवं शांति में विश्वास
लूथर दीन-दुखियों की सेवा तथा शान्तिपूर्ण साधनों को ईश्वर की प्राप्ति का प्रमुख साधन मानता था। फिशर के शब्दों में वह स्वयं धार्मिक क्रान्ति का जन्मदाता था, परन्तु स्वयं क्रान्तिकारी नहीं था।"
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