कंगनी तथा मैस्त्री व्यवस्था के तहत प्रवासन - Migration under the Kangni and Maestri system

कंगनी तथा मैस्त्री व्यवस्था के तहत प्रवासन - Migration under the Kangni and Maestri system


दक्षिण भारत में श्रमिक भर्ती हेतु कंगनी एवं मैस्त्री प्रणाली का प्रयोग किया जाता था। कंगनी और मैस्त्री, तमिल भाषा के शब्द हैं। कंगनी का अर्थ है- मुखिया, फोरमेन, ओवरसीयर जबकि मैत्री का अर्थ पर्यवेक्षक (सुपरवाईजर), प्रबंध देखने वाला। प्रारंभ में कंगनी व्यवस्था के तहत मजबूों की नियुक्ति मलाया, सीलोन (श्रीलंका) के लिए जबकि मैस्त्री के द्वारा बर्मा में श्रमिक भर्ती हुई। दोनों व्यवस्था की अपनी विशिष्टता के बावजूद भी इन दोनों में पर्याप्त समानता दिखाई देती है। दोनों व्यवस्थाओं में 'माध्यम व्यक्ति नेटवर्क' (Middle men Network) की उपस्थिति पाई जाती है तथा औपनिवेशिक कॉलोनियों के बागानों में कार्य करने के लिए श्रमिक भर्ती हेतु ऋण संबंधों (Debt Relationship) को प्रयोग में लाया जाता है।

कंगनी व्यवस्था में मजदूरों को अग्रिम ऋण उसके परिवार में भरण-पोषण के लिए दे दिया जाता था। इस ऋण की मध्यस्थता फोरमेन करता था। 1840 से 1942 ई. के मध्य कंगनी और मैस्त्री प्रणाली के अंतर्गत 17 लाख से ज्यादा व्यक्ति मलाया तथा सिंगापुर में कार्य करने के लिए भर्ती किए गए। इसी प्रकार बर्मा के लिए 16 लाख तथा सिलोन के लिए 10 लाख श्रमिक प्रवासित हुए।


कंगनी व्यवस्था के तहत नियुक्ति :- इस व्यवस्था के तहत प्रारंभ में सिलोन (श्रीलंका) के काफी, चाय बागानों में कार्य करने के लिए 1850 ई. में मजदूरों की नियुक्ति प्रारंभ हुई तथा मलाया हेतु इसे 1890 ई. से प्रयोग में लाया गया।

इस प्रणाली में किसी भारतीय प्रवासी को सर्वप्रथम कंगनी के रूप में नियुक्त किया जाता है तथा इस कंगनी के पर्यवेक्षण (supervision) में 25 से 30 मजदूरों का समूह होता था। अधिकांश बागानों में कंगनी प्रमुख ही प्रबंधकों तथा श्रमिकों के बीच की मुख्य कड़ी बनाता था। इसी के अधीन लघु कंगनी होते थे। ये दल का नेतृत्व करते थे तथा प्रमुख के प्रति उत्तरदायी रहते थे। अधीनस्थ कंगनी को सीन्ना कंगनी (मलाया) तथा सिलारा कंगनी (सिलोन) के नाम से जाना जाता था, जिनका आशय 'लघु/ उप था। अधीनस्थ कंगनी बागानों में श्रमिक उत्पादकता के साथ-साथ सामान्यतया भारत से और श्रमिकों की भर्ती भी करते थे। सामान्य मजदूरों (विश्वसनीय तथा भरोसेमंद) में से भी कुछ को भर्ती के लिए भारत भेजा जाता था, ताकि वह वापस लौटने पर कंगनी की श्रेणी में शामिल हो सके।


इसके तहत मजदूर किसी गाँव, किसी रिश्तेदारी या जातीय समूह से जुड़े होते थे। मजदू नियुक्ति करने वाले ठेकेदार को मजदूर नियुक्ति के एवज में कमीशन मिलता था। कंगनी को अपने गृह जिले से मजबूों की भर्ती के लिए लाइसेंस प्राप्त होता था। कंगनी को प्रत्येक मजदूर की नियुक्ति पर 2 प्रतिशत कमीशन मिलता था, जिसे मुखिया मनीर कहते थे। मजदूरों की नियुक्ति के बाद मजदूरों के कार्य का 3-4 प्रतिशत प्रत्येक मजदूर के मुखिया को भी मिलता था जो मजबू उस कंगनी के समूह में थे। इसे पेंस मनी कहते थे।


कंगनी प्रणाली के विविध स्वरूप यह सुनिश्चित करते थे कि भारत के दूस्थ क्षेत्रों तक इसकी पहुँच बनी रहे।

सैद्धांतिक रूप से अनुबंध श्रमिक प्रणाली की तरह ही कंगनी व्यवस्था में भी लाइसेंस प्रदान किया जाता था।


मजदूरों के शोषण तथा कम मजदूरी की शिकायत के कारण 1938 ई. से मलाया और 1940 ई. में सिलोन के लिए मजदूर भरती की इस व्यवस्था को औपनिवेशिक भारत सरकार के द्वारा बंद कर दिया गया।


मैत्री के अंतर्गत 10 से 20 मजदूरों की टोली होती थी, जिसकी व्यवस्था गैंग मैस्त्री करता था इसके तहत निश्चित अग्रिम मजदूरी के साथ-साथ निश्चित समय के लिए मजदूरी करना होता था। कंगनी से अलग, इसमें मजबू, एक नौकर की तरह कार्य करते थे।

इसमें मैस्त्री को मजदूरों को हटाने तथा उनकी अग्रिम जो दी गई उसे वापस लेने एवं मजबूरों को उसके पुर्नवापसी का भी हक होता था। इसके तहत मजकों को बर्मा और मलेशिया ले जाया गया जहाँ वे कॉफी और रबर की खेती में लगाए गए। रबर की खेती के लिए स्थायी मजदूरों की आवश्यकता थी, इसीलिए इस व्यवस्था के तहत मजदूरों को ले जाया गया। बर्मा में इन मजदूरों को चावल की खेती में लगाया गया, क्योंकि पश्चिम में बर्मा की चावल की माँग अधिक थी।


मैत्री का उन्मूलन 1937 ई. में किया गया, क्योंकि बाद के दिनों में मजदूरों की संख्या में अवैध तरीके से कटौती की गई, मजदूरों की मुफ्त सेवा को आवश्यक बनाया गया था तथा रात और दिन के लिए समान वेतन दिया जाता था।