भक्ति आंदोलन का स्वरूप - Nature of Bhakti Movement

भक्ति आंदोलन का स्वरूप - Nature of Bhakti Movement


भारतीयों का आदिकाल से जीवन का प्रमुख उद्देश्य मोक्ष प्राप्त करना रहा है। इस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए प्रमुख रूप से तीन साधन बताए गए हैं- कर्म-मार्ग, ज्ञान-मार्ग और भक्ति-मार्ग। वैदिक काल में कर्म-मार्ग पर विशेष बल दिया जाता था। विभिन्न प्रकार के यज्ञ तथा कर्मकांडों द्वारा मोक्ष प्राप्ति की आशा की जाती थी, अतः पर्याप्त काल तक सर्वसाधारण जनता कर्मकांडों में लीन रही; परंतु धीरे-धीरे कर्मकांडों का रूप विकृत हो गया, पशुबलि होने के कारण जनसाधारण कर्मकांडों से घृणा करने लगा। उपनिषदों में कर्मकांड और यज्ञ आदि के विरुद्ध आवाज उठने लगी और तत्व चिंतन तथा ज्ञान को विशेष महत्व दिया जाने लगा।

गुप्त काल में एक नवीन विचारधारा का उदय हुआ जिसके अनुसार मोक्ष प्राप्त करने के लिए कर्म और ज्ञान की अपेक्षा भक्ति मार्ग सर्वोत्तम समझा गया। सर्वसाधारण के लिए ज्ञान-मार्ग का अनुसरण करना सरल कार्य नहीं है, अतः यह माना जाने लगा कि भगवान की उपासना और भक्ति के द्वारा मोक्ष-प्राप्ति करना उचित है; परंतु इसका मतलब यह नहीं कि भक्ति आंदोलन का उदय गुप्त काल में ही हुआ था। भक्ति-मत का उदय गुप्त काल से पहले हो चुका था, परंतु बीच में इसकी परंपरा कुछ क्षीण हो गई थी, जो गुप्त काल में जाकर पुनः फलने-फूलने लगी। एक विद्वान के शब्दों में, उन लोगों ने, जिनके पास अध्यात्म मार्ग के गहन चिंतन और मनन के द्वारा अपने विचारों को सुधारने के लिए न तो समय था और न ही अवसर उन्होंने उपासना के सिद्धांतों और प्रतिरूपों (मूर्तियों) को अपना लिया।"

आठवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में कुमारिल भट्ट ने कर्मकांड पर विशेष बल दिया, परंतु उन्हें विशेष सफलता नहीं प्राप्त हो सकी; तत्पश्चात् शंकराचार्य ने ज्ञान को मोक्ष का प्रमुख साधन बताया और सर्वसाधारणको ज्ञान प्राप्त करने पर विशेष बल दिया। शंकराचार्य का दर्शन यद्यपि प्रभावशाली था; परंतु वह जनसाधारण की समझ में सरलता से नहीं आता था, अतः वह नीरस ज्ञात होता था। पुनः उत्तरी भारत की जनता रामानंद के नेतृत्व में तथा दक्षिणी भारत की रामानुज के नेतृत्व में भक्ति मार्ग की ओर अग्रसर होने लगी। क्योंकि केवल यही एक मार्ग था, जिसको अपनाकर सरलता से मोक्ष प्राप्त किया जा सकता था।