भक्ति आंदोलन का नवीन दृष्टिकोण - New Approach to Bhakti Movement
भक्ति आंदोलन का नवीन दृष्टिकोण - New Approach to Bhakti Movement
सिख समुदाय का निर्माण और विकास भक्ति आंदोलन का मोड़ है। कबीर, रैदास और नानक के शक्तिशाली आक्रमण के फलस्वरूप व्यवस्था में एक लचीलापन आया। यह मोड़ रामचरितमानस में समकालीन सामाजिक व्यवस्था के प्रति तीव्र रोष या विरोध के स्थान पर उस समाज के आदर्शपूर्ण ढंग से क्रियाशील होने का आदर्श है। गोस्वामी तुलसीदास में परिवर्तन की कामना नहीं है परंतु ये सुधार अवश्य चाहते हैं। रामराज्य के रूप में एक उटोपिया अवश्य प्रस्तुत करते हैं।
उत्तर की तरह दक्षिण में विदेशी आक्रमणों से उत्पन्न संकट और विदेशियों के आर्यकरण का प्रश्न तो न था,
परंतु पिछड़ी आदिम कबीलाई जातियों के सांस्कृतिकरण की समस्या कम गंभीर न थी। पुराना ब्राहाण धर्म अनन्य प्रकृति के कारण यहाँ कार्य करने में असमर्थ था। यह ऐसा कार्य था, जिसे ईश्वर की सर्व सुलभ भक्ति पर आधारित वैष्णव और शैव सक्षमता के साथ संपन्न कर सकते थे। शूद्र और निम्न जातियों को उनकी सुधरी हुई और मजबूत स्थिति तथा संख्या के अनुरूप कम से कम प्रशासनिक क्षेत्र में रियायतें व महत्व प्रदान करके उन्हें संतुष्ट करने का कार्य भी भक्ति ही कर सकती है।
कुल मिलाकर दक्षिण में भक्ति की एक ऐसी धारा प्रवाहित हो रही थी जिसमें स्त्रियों सहित शूद्रों व निम्न वर्गों का, जिनका अधिकांश वैष्णव धर्म के द्वारा सांस्कृतिकरण की प्रक्रिया से आदिम कबीलाई जातियों से आया होगा,
को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त था। पेरिय पुराण के अनुसार नए नारों में कुछ ब्राह्मण थे। कुछ वैल्लाल और कुछ तो आदिवासी जातियों के थे। इसी तरह अलवारों में दो शूद्र और एक निम्न पनर जातियों का था।
दूसरे उत्थानकाल में भी हम भक्ति के प्रवाह के रूप में ही पाते हैं। शैव व वैष्णव भक्त अधिकांशतया सामान्य जनता के लोग थे और उनकी अति भावमूलक भक्ति सरल धर्म की द्योतक थी, लेकिन बाद में उनकी भक्ति गीतों की सरलता भावोज्जवलता और उनकी सौंदर्य भावनाओं को पौराणिक अंधविश्वासों तथा सात्विक मताग्रहों के बीच दबा दिया गया।
आलवार भक्तों के उपरांत आने वाले वैष्णव आचार्य कट्टर धार्मिक कुलों के थे और परंपरागत शास्त्रों की सब मर्यादाओं की रक्षा करना अपना कर्तव्य समझते थे।
रामानुजाचार्य और रामानंद जैसे व्यक्तित्व भी जिनकी उदारता की बहुत चर्चा की जाती है एक सीमा तक ही उदार थे। इस संबंध में विभिन्न लेखकों ने जो विचार प्रकट किए हैं उनसे प्रकट होता है कि दोनों महापुरुषों की उदारता केवल औपासनिक क्षेत्र तक सीमित थी। सच-सच कहा जाए तो रामानुज और रामानंद में जितनी उदारता थी,
यह वैष्णव मत में प्राचीन काल से ही रही है। इसी संदर्भ में देखें तो दोनों आचार्यों ने जो कुछ किया वह भक्ति की उस गहरी परंपरा का अनुगमन ही था, जो मात्र कुछ औपासनिक रियातें देकर सामाजिक आचार व व्यवस्था में नितांत कट्टरता का आग्रह करती रही हैं। विचार और आचार, सिद्धांत और व्यवहार की द्वैषता हमारे धर्म एवं समाजतंत्र की पुरानी बीमारी है, जिसे साहित्यकारों और इतिहासकारों ने प्रायः रेखांकित किया है। उच्च वर्ग के इस वैचारिक और समझौतावादी रूध का एक परिणाम तो यह अवश्य दिखता है कि हिंसात्मक विद्रोह की स्थितियाँ बहुत कम उत्पन्न हुई। साथ ही दलित जनता को मामूली छूटों से ही संतोष करके युगों-युगों तक भारी मूल्य चुकाना पड़ता रहा। सचमुच इस दृष्टि से भारत की प्राचीन मनीषा अन्य अनेक देशों के बुद्धिजीवियों से अधिक चतुर और व्यवहार कुशल थी।
वार्तालाप में शामिल हों