अन्य सूफी सिलसिला - Other Sufi Order

अन्य सूफी सिलसिला - Other Sufi Order


चिश्ती और सुहरावर्दी सिलसिलों के अलावा इस काल में भारत में फिरदौसी, कादिरी, शतारी, कालंदरी आदि सिलसिले भी स्थापित हुए। फिरदौसी सिलसिला की एक शाखा था। इसकी स्थापना 14वीं शताब्दी में बिहार में राजगीर में हुई थी। भारत में इस सिलसिला के सर्वप्रमुख सूफी शेख शरफुद्दीन याहा मनेरी (मृत्यु 1380 ई.) थे।


मध्यवर्ती इस्लामी देशों में कादिरी सर्वप्रमुख सूफी संप्रदाय था। इसकी स्थापना अब्दुल कादिर जिलानी (मृत्यु 1166 ई.) ने बगदाद में की थी।

14वीं शताब्दी में यह संप्रदाय भारत आया और पंजाब सिंध तथा दक्कन को अपना केंद्र स्थल बनाया। कादिरी का दृष्टिकोण कट्टरपंथी था और इनका सिद्धांत कट्टरपंथी उलेमा से मेल खाता था। कादिरी सूफियों के कई प्रांतीय राज्यों के शासक वर्ग से संबंध थे और उन्होंने राज्य की सहायता स्वीकार की। यह संप्रदाय शहर में केंद्रित था और इसका उदेश्य गैर इस्लामी प्रभावों से ग्रस्त भारतीय मुसलमानों की धार्मिक जिंदगी में सुधार लाना था।


15वीं शताब्दी में भारत में शेख अब्दुल्ला शतारी ने शतारी सिलसिला की स्थापना की। यह भी एक कट्टरपंथी संप्रदाय था शतारी बंगाल,

जौनपुर और दक्कन में केंद्रित थे। कादिरी के समान शतारी सूफियों के संबंध भी शासक वर्ग के साथ थे और उन्होंने भी राज्य संरक्षण स्वीकार किया। कलंदिर संप्रदाय में कई प्रकार के घुमंतू फकीर शामिल थे जो सामान्य सामाजिक व्यवहारों का पालन नही करते थे। वे निंदनीय माने जाते थे और वे इस्लामी कानून को नहीं मानते थे। उनका कोई आध्यात्मिक गुरु या संगठन नहीं होता था। कई कलंदर चिश्ती खानकाहों में अक्सर जाया करते थे और इनमें कई चिश्ती संप्रदाय में शामिल भी हो गए। कलंदरो का संपर्क नाथपंथी योगियों के साथ भी था और उन्होंने उनकी कई मान्यतायों और प्रथाओं को अपना लिया। मसलन नाथपंथियों के समान वे भी अपना कान छिदवाने लगे।


15वीं - 16वीं शताब्दी के दौरान कश्मीर में सूफी मत का ऋषि संप्रदाय स्थापित हुआ। इस संप्रदाय के उदय से पूर्व धर्म प्रचारक मीर सैय्यद हमादानी (1314-1385 ई.) इस्लाम के प्रचार-प्रसार के लिए हमदान से अपने शिष्यों के साथ कश्मीर आए। हमदानी, उनके पुत्रों और शिष्यों के धार्मिक प्रचार का कश्मीर की जनता पर बहुत थोड़ा ही प्रभाव पड़ा। दूसरी तरफ शेख नुरूद्दीन वली (मृत्यु 1430 ई.) द्वारा स्थापित ऋषि संप्रदाय मूलतः स्वदेशी था। यह कश्मीर के ग्रामीण परिवेश में फला-फुला और इसने 15वीं-16वीं शताब्दी के दौरान लोगों के धार्मिक जीवन को प्रभावित किया। ऋषि संप्रदाय की लोकप्रियता का यही कारण था। इसके अतिरिक्त इसने कश्मीर की लोकप्रिय शैव भक्ति परंपरा से भी प्रेरणा ग्रहण की। यह संप्रदाय क्षेत्र के सामाजिक सांस्कृतिक अंग-ढंग में आकंठ डूबा हुआ था।