भारतीयों का समुद्रपारीय प्रवासन - Overseas Migration of Indians

भारतीयों का समुद्रपारीय प्रवासन - Overseas Migration of Indians


आधुनिक काल में भारतीयों का समुद्रपारीय देशों के लिए प्रवासन मूलतः उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद की देन थे। वर्ष 1833-34 में दास प्रथा समाप्त हो जाने के बाद उष्ण कटिबंधीय देशों में खेतों पर काम करने के लिए सस्ते मजदूरों का मिलना कठिन हो गया था। डच और ब्रिटिश उपनिवेशों में कुशल श्रमिकों के अभाव में कृषि केंद्रों (प्लांटेशनों) की संख्या घटने लगी। पराधीन भारत में अनुबंधित शर्तबंदी श्रमिक औपबंधिक श्रम प्रणाली (इंडेंचर लेबर सिस्टम) प्रवासन से संबंधित कानून वर्ष 1834 ई. में राजसम्मत (सरकारी स्तर पर मान्य हो गया। कानून के आधार पर भारतीय श्रमिकों, किसानों को विश्व के कोने-कोने में भेजा गया। वर्ष 1838 ई. से लेकर वर्ष 1916 ई. तक लाखों भारतीय पुरुषों,

महिलाओं को शर्तबंदी मज़बू बनाकर मॉरीशस, फ़िजी, सूरीनाम, दक्षिण अफ्रीका, त्रिनिदाद, जमैका, ब्रिटिश गुयाना, डच गुयाना, फ्रेंच गयाना इत्यादि उपनिवेशों में भेजा गया। इन उपनिवेशों में गन्ना, कॉफ़ी, कपास, कोको, चावल के कुशल कृषि श्रमिकों की आवश्यकता थी। अपनी इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए ब्रिटिश साम्राज्यवादी गरीब भारतीय कृषि श्रमिकों को अच्छी जीविका और बेहतर रोजगार के अवसर का लोभ देकर अपने उपनिवेशों में 'गिरमिटिया (अनुबंधित श्रमिक) बनाकर भेजने लगे। गुलामी उन्मूलन के संबंध में इसी प्रकार के अधिनियम को फ्रांसीसी साम्राज्यने 1848 ई. और डच साम्राज्य ने 1863 ई. से अपने उपनिवेशों में लागू किया।

इंडेंचर लेबर सिस्टम पर काम करने वाली इतिहासकार मरीना कार्टर के अनुसार अनुबंधित प्रवासी वह व्यक्ति है, जिसने बागानों तक आवागमन पर हुए व्यय को स्वयं वहन नहीं किया है। एक बार अनुबंधित कर लिए जाने पर व्यक्ति के अनुबंध की अवधि में उसकी मजदूरी दर, कार्य के घंटे कार्य की प्रकृति, भोजन, आवास और चिकित्सा आदि के संबंध में निर्धारित नियमों के अनुसार व्यवस्था की जाती थी। इस व्यवस्था के अनुसार मालिकों और कामगारों के बीच का संबंध अधिनियमों के तहत संचालित होता था।


अनुबंधित श्रम व्यवस्था के अंतर्गत भारत से बड़े पैमाने पर समुद्रपारीय प्रवासन हुआ।

इन्हीं प्रवासी भारतीयों की आगामी पीढ़ियों और उनके वंशजों द्वारा आधुनिक भारतीय डायस्पोरा का निर्माण हुआ। निम्नलिखित सारणी से अनुबंधित भारतीय श्रमिक प्रवासन और उससे निर्मित डायस्पोरा की स्थिति अधिक स्पष्ट होती है :-


अनुबंधित भारतीय और भारतीय जनसंख्या: 1980 और नवीनतम अनुमान स्रोत : कॉलिन क्लार्क आदि, साउथ एशियन ओवरसीज़ माइग्रेशन एंड एथनिसिटी (कैम्ब्रिज : कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस, 1990, पेज 9 ) | नवीनतम अनुमान के लिए CIA, द वर्ल्ड फ़ैक्टबुक 2007 (वाशिंगटन : सेंट्रल इंटेलीजेंस एजेंसी); http://en.wikipedia.org/wiki/Overseas_Indian_population;


http://www.littleindia.com/news/132/ ARTICLE / 1346/2006-0-12.html; तथा बृज वी. लाल, पीटर रीव्स एंड राजेश राय (संपा). (2006). द एनसाइक्लोपीडिया ऑफ द इंडियन डायस्पोरा सिंगापुर एडीशन्स डीडीवर मिलेट इन एसोसिएशन विद नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ सिंगापुर


भारतीय श्रमिकों के निर्यात के लिए डच एजेंटों ने कलकत्ता में अपना मुख्य केंद्र खोला। श्रमिकों की भर्ती के लिए अंग्रेजों ने गोरखपुर इलाहाबाद, वाराणसी, बस्ती, फैजाबाद और मथुरा में उपकेंद्र खोले। विश्व की अलग-अलग कॉलोनियों के लिए अलग-अलग भर्ती केंद्र थे। दूर-दूर से मजबूरों को खोजकर लाने के लिए 'सब एजेंट बनाए गए।

इन सब एजेंट के अंतर्गत अरकाटी (दलाल) काम करते थे। अरकाटी सीधे-सादे ग्रामीण लोगों को समझा-बुझाकर, छल-बल, धोखाधड़ी, डरा-धमका और फुसलाकर भर्ती करने लगे। इन दलालों को एक आदमी के लिए पाँच रूपए और एक महिला के लिए इससे भी अधिक कमीशन मिलता था। ऐसे श्रमिकों को विश्व की कई कॉलोनियों में भेजा गया। पाँच वर्ष के शर्तनामे के साथ अनंत त्रासदियों के लिए श्रमिकों को 'जल जहाज़ों पर भर दिया जाता था। गंतव्य तक पहुँचने पर जल जहाज़ों द्वारा लाई गई श्रमिकों की खेप को छोटे-छोटे बैरकों (जिन्हें 'डिपो' कहते थे) में रखा जाता था।

यहाँ से ही इन श्रमिकों के काम का बँटवारा होता था। महीनों की त्रासदीपूर्ण यात्रा के बीच अपने परिवार और रिश्तेदारों से टू इन श्रमिकों ने जहाज़ में ही बने नए रिश्ते और संबंधों में पारिवारिक सुख का अनुभव करना शुरू कर दिया। ये आपस में एक-दूसरे को 'जहाज़ी भाई' के नाम से संबोधित करते थे। जहाज़ियों के बीच यात्रा के दौरान जाति और धर्म जैसी विभाजक रेखा भी धूमिल पड़ गई थी। स्वदेश में जहाँ ये मानव समुदाय हिंदूमुसलमान, ब्राह्मण-शूद्र जैसी संकीर्ण व्यवस्था में विभक्त था, वहीं जहाज़ में वे इन सब से परे सिर्फ हिंदुस्तानी भाई थे। इस स्थिति में तीन से पाँच वर्ष के लिए विशेष दरों पर काम करने का अनुबंध एक अनिवार्य शर्त थी। इस अनुबंध की समाप्ति पर ये अनुबंधित श्रमिक वापस अपने देश लौटने को स्वतंत्र थे। दस वर्ष बाद उन्हें वापसी यात्रा के लिए विशेष भत्ता भी देय था। प्रवासन की यह प्रकिया वर्ष 1834 से वर्ष 1920 तक चली।


ये प्रवासी श्रमिक भारत के विभिन्न हिस्सों (बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश, कलकत्ता, दक्षिण भारत इत्यादि) से ले जाए जाते थे। उत्तर भारत के गोरखपुर, बस्ती, जौनपुर, दरभंगा, शाहाबाद, गया, सारन, भोजपुर, इलाहाबाद, बलिया, सुल्तानपुर रीवां, फैजाबाद इत्यादि प्रमुख क्षेत्र थे, जहाँ से बड़ी संख्या में श्रमिकों का प्रवासन विभिन्न उपनिवेशों के लिए होता था। दक्षिण भारत के प्रमुख भर्ती केंद्रों में तमिल भाषी क्षेत्र (त्रिचनापल्ली, मदुरै, सेलम और तंजौर इत्यादि) मुख्य थे। इसके साथ ही तेलुगु भाषी क्षेत्र (विज़ाग और वंजरन) भी उल्लेखनीय थे। बॉम्बे प्रेसीडेंसी में अहमदनगर दक्षिण भारत का मुख्य भर्ती केंद्र था। उत्तर भारत के 'गिरमिटिया व्यवस्था की तरह ही दक्षिण भारत में श्रमिकों के विस्थापन की इस प्रक्रिया को 'कंगनी व्यवस्था के रूप में जाना जाता था।

कंगनी व्यवस्था' के तहत ये श्रमिक मुख्यतः मलेशिया, श्रीलंका, सिंगापुर, बर्मा इत्यादि देशों में भेजे गए। अंग्रेज़ी का कंगनी शब्द मुख्यतः तमिल शब्द 'कनक्नी' का अपभ्रंश रूप है, जिसका वास्तविक अर्थ प्रबंधक या नियंत्रक होता है। इस व्यवस्था के तहत भर्ती करने वाले अधिकारी श्रमिकों को यात्रा और दैनिक खर्च के लिए कुछ अग्रिम राशि प्रदान करते थे। यह व्यवस्था मैस्त्री व्यवस्था के लगभग समान थी। मैस्त्री व्यवस्था में अनुबंध किसी निश्चित अवधि तक निर्धारित नहीं होता था। साथ ही इन श्रमिकों की भर्ती में दलालों की भूमिका नगण्य होती थी। श्रमिक कानूनी तौर पर स्वतंत्र होते थे। अनुबंध समाप्ति पर औपनिवेशिक सत्ताधारियों द्वारा इन श्रमिकों के स्थायी निवास के लिए इनको कृषि योग्य भूमि प्रदान करने का प्रावधान था।