पाल वंश - pal dynasty
पाल वंश - pal dynasty
वंशावली
(1) गोपाल (वंश-संस्थापक) (लगभग 750-770 ई.),
(3) देवपाल (लगभग 810-850 ई.),
(5) नारायणपाल (लगभग 854-915 ई.).
(7) गोपाल द्वितीय (लगभग 940-960 ई.), 988).
(9) महीपाल प्रथम (लगभग 988-1038 ई.),
(11) विग्रहपाल तृतीय (लगभग 1055-1070 ई.),
(2) धर्मपाल ( लगभग 770-810 ई.),
(4) विग्रहपाल प्रथम (ल. 850-854
(6) राज्यपाल (लगभग 915-940 ई.),
(8) विग्रहपाल द्वितीय ( लगभग 960-
( 10 ) नयपाल ( लगभग 1038-1055
(12) महीपाल द्वितीय (ल. 1070-1075
(13) रामपाल (लगभग 1075-1120 ई.), ई.),
(15) गोपाल तृतीय (लगभग 1125-1144 ई.),
(16) मदनपाल
(17) गोविंदपाल प्रमुख शासकः धर्मपाल, देवपाल और महीपाला धर्मपाल
गोपाल का उत्तराधिकारी उसका पुत्र धर्मपाल था। वह बड़ा पराक्रमी, विजयी और धार्मिक था। धर्मपाल ने उत्तरी भारत की प्रभुता के लिये प्रतिहारों और राष्ट्रकूटों से निरंतर संघर्ष किया। उसने कन्नौज के नरेश को हराकर चक्रायुध को कन्नौज का नरेश घोषित किया,
किन्तु प्रतिहार नरेश नागभट्ट द्वितीय ने बाद में चक्रायुध को हरा दिया। इस पर धर्मपाल ने नागभट्ट पर आक्रमण किया पर मुंगेर के पास उसे परास्त होना पड़ा। वह राष्ट्रकूट नरेश धुरव से भी परास्त हुआ था। पराजित होने पर भी धर्मपाल तत्कालीन राजनीति पर कुछ समय के लिए छा गया था। वह धर्मपरायण नरेश और विद्या तथा कला का आश्रयदाता था। उसने बिहार में भागलपुर के समीप गंगा तट पर विक्रमशीला नामक एक महान बौद्ध विहार निर्मित किया जो थोड़े समय पश्चात् ही विक्रमशीला विश्वविद्यालय हो गया। देवपाल
धर्मपाल के बाद उसका पुत्र देवपाल राजसिंहासन पर बैठा। वह पाल वंश का सर्वाधिक प्रतापी, साहसी,
वीर और प्रसिद्ध शासक था। उसने कलिंग (उड़ीसा) और आसाम को जीतकर अपने अधिकार में कर लिया। उसने हूणों और गुजरात के राजाओं को भी परास्त किया तथा प्रतिहार नरेश मिहिरभोज की पूर्व में बढ़ती शक्ति को रोका। उसने एक विस्तृत प्रदेश पर राज्य किया और उसका राजनीतिक संबंध ब्रह्मा, सुमात्रा, जावा आदि देशों से था। वह बौद्ध मतावलम्बी था। उसने मुगिरि (मुंगेर) और नालंदा महाविहार को अत्यधिक दान दिया और अनेक बौद्ध चैत्य, विहार और संघाराम निर्मित किये। उसके शासनकाल में नालंदा और विक्रमशीला के महान् बौद्ध विहार विश्वविद्यालय के रूप में प्रसिद्ध और प्रगतिशील थे। महीपाल
देवपाल के बाद नारायणपाल के शासनकाल में उसकी पराजयों से पाल शक्ति को गहरा आघात लगा, परंतु नारायणपाल के पश्चात् महिपाल के शासनकाल में पाल-सत्ता का पुनरूत्थान हुआ। यद्यपि वह काँची के चोल राजा राजेन्द्र द्वारा और चेदि नरेश गांगेयदेव द्वारा पराजित अवश्य हुआ था, फिर भी उसने बंगाल और बिहार के खोये हुये प्रदेश पुनः अपने अधिकार में कर लिये। वह बौद्ध था और उसने सारनाथ में कई चैत्य निर्मित किये तथा वहाँ मूलगंध कुटी, धर्मराजिका स्तूप और धर्मचक्र का जीर्णोद्धार करवाया एवं बोध गया में दो मंदिर बनवाये।
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