परमार वंश - Parmar dynasty
परमार वंश - Parmar dynasty
वंशावली
(1) उपेन्द्रराज (790-817 ई.),
(2) वैरिसिंह प्रथम (814-842 ई.),
(5) वैरिसिंह द्वितीय (921-945 ई.),
(3) सीअक प्रथम (844-893 ई.).
(7) वाक्पति द्वितीय (मुंजराज) (973-996 ई.),
(9) भोज परमार (1010-1055 ई.),
(4) वाक्पति प्रथम (894-920 ई.),
(6) सीअक द्वितीय ( 945-972 ई.).
(8) सिंधुराज (996-1010 ई.),
(10) जयसिंह प्रथम (1055-1070 ई.),
(12) लक्ष्मदेव (1086 1094 ई.),
(14) यशोवर्मा (1134-1142 ई.),
(16) विंध्यवर्मन्
(11) उदयादित्य (1070 1086 ई.)
(13) नरवर्मा (10941 -1133),
(15) जयवर्मन्
(17) सुभटवर्मन् ।
प्रमुख शासक: वाक्पति द्वितीय (मुंजराज) तथा भोज। मुंज
श्री हर्ष के पश्चात् उसका पुत्र वाक्पति मुंज सिंहासन पर बैठा। परमारों की शक्ति का उत्कर्ष इसके शासनकाल में हुआ।
वह बड़ा वीर, साहसी, प्रतापी और साम्राज्यवादी नरेश था। उसने त्रिपुरी नरेश युवराज द्वितीय को परास्त किया तथा गुजरात, कर्णाटक, चोल और केरल के राजाओं को युद्ध में पराजित किया और कल्याणी के चालुक्य राजा तैलप द्वितीय को छः बार हराया। सातवीं बार जब उसने गोदावरी नदी को पार करके तैलप पर आक्रमण किया तब तैलप ने उसे पराजित कर दिया और बंदी बना लिया तथा बाद में उसका वध कर दिया। मुंज महान योद्धा और विजेता होने के अतिरिक्त योग्य शासक, विद्वान और विद्यानुरागी भी था। वह स्वयं उच्च कोटि का कवि तथा विद्वानों का आश्रयदाता भी था। उसकी राजसभा में परिमल गुप्त, धनिक,
धनंजय, हलायुध भट्ट, अमितगति आदि प्रसिद्ध विद्वान, कवि और लेखक रहते थे। मुंज स्वयं एक निर्माता भी था। उसने भवनों, सरोवरों और मंदिरों का निर्माण किया। भोज
परमार वंश का सबसे प्रतापी और सर्व प्रसिद्ध नरेश भोज था। वह बड़ा महत्वाकांक्षी और साम्राज्यवादी था। अपने काका वाक्पति मुंज की नृशंस हत्या का बदला लेने के लिये उसने कल्याणी के चालुक्य नरेश विक्रमादित्य चतुर्थ पर आक्रमण कर उसे बुरी तरह परास्त कर दिया।
इसके बाद उसने कलचुरि राजा गांगेयदेव को हराया उत्तर में प्रतिहारों को परास्त किया, कन्नौज राज्य के एक अंग और बिहार के पश्चिमी भाग पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया और लाट (गुजरात) के सोलंकी नरेशों पर उसने निरंतर सफल आक्रमण किये। भोज के सेनापति कुलचंद्र ने सोलंकी राज्य की राजधानी पाटन को भी लूटा। सौराष्ट्र व गुजरात में तुर्कों के आक्रमणों का उसने सामना किया और उन्हें खदेड़ दिया। उसके निरंतर आक्रमणों और विस्तारवादी नीति से अनेक राजा उससे अप्रसन्न हो गए। फलतः विद्याधर चंदेल ने उसे परास्त किया, गुजरात के सोलंकी नरेश और त्रिपुरी के कलचुरि नरेश के सैनिक संगठन का भोज को सामना करना पड़ा। उस पर दोनों ओर से आक्रमण हुए। वह पराजित हुआ और युद्ध क्षेत्र में वीर गति को प्राप्त हुआ।
राजा भोज एक महान् विजेता और योग्य शासक ही नहीं था, अपितु वह स्वयं उच्चकोटि का विद्वान, कवि और लेखक था। वह विद्यानुरागी था तथा विद्वानों और कवियों का उदार आश्रयदाता भी था। भोज की उपाधि कविराज थी। वह अपने पांडित्य विद्यानुराग साहित्य और कला के प्रश्रय योग्य शासन व्यवस्था, आदर्श न्याय और दानशीलता के लिये लोक-प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि, वह कवियों को एक-एक श्लोक की रचना के लिये एक-एक लाख मुद्राएँ दान में देता था। इतिहास और साहित्य का वह सर्वाधिक प्रबुद्ध शासक था। उसने साहित्य, व्याकरण, गणित, चिकित्साशास्त्र, वास्तुकला, धर्म, दर्शन, प्रशासन विषय आदि पर अनेक ग्रंथों की रचना की जिनमें सरस्वती कण्ठाभरण, शब्दानुशासन, समरांगण सूत्राधर, युक्ति कल्पद्रुम आयुर्वेद सर्वस्व, भोज प्रबंध आदि अधिक प्रसिद्ध हैं। उसकी राज्यसभा अनेक विद्वानों, कवियों और लेखकों से सुशोभित थी। भोज एक महान निर्माता भी था। उसने धार को भवनों और सरोवरों से सुसज्जित किया। उसने एक महान् कृत्रिम झील बनवाई जो आजकल भोपाल ताल के नाम से प्रख्यात है। उसने अपनी राजधानी धारा (धारा) में सरस्वती मंदिर और संस्कृत के महाविद्यालय का निर्माण किया। ये बाद में भोजशाला के नाम प्रसिद्ध हो गये।
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