न्यूजीलैंडर भारतीयों की राजनैतिक भागीदारी एवं गतिशीलता - Political participation and mobility of New Zealand Indians

न्यूजीलैंडर भारतीयों की राजनैतिक भागीदारी एवं गतिशीलता - Political participation and mobility of New Zealand Indians


भारतीय न्यूजीलैंड में बहुसांस्कृतिक समाज में रहते हुए राजनीतिक गतिविधियों में संलग्न हैं। न्यूजीलैंड के लगभग सभी भारतीय लेबर पार्टी के समर्थक हैं। सुखी टर्नर, 1973 में न्यूजीलैंड आने वाली भारतीय थीं, जो 1992 में दुनेदीन की पहली भारतीय मूल की मेयर बनी। 2004 में सुखी टर्नर प्रवासी भारतीय सम्मान पाने वाली न्यूजीलैंड की पहली भारतीय मूल की महिला बनी। 2004 में डॉ. अशरफ चौधरी न्यूजीलैंड संसद के पहले सांसद बने।


माओरी और पाकेहा न्यूजीलैंड के मूलनिवासी हैं। न्यूजीलैंड के माओरी एशियन और पेसिफिक आइसलैंडर की जनसंख्या यूरोपीय समुदाय की तुलना में तेजी से बढ़ रही है।


2001 में भारतीय लोग दूसरे बड़े नृजातीय समूह थे। न्यूजीलैंड के भारतवंशियों में धर्मनिरपेक्षता तथा धार्मिकता के मुद्दे पर तनाव देखने को मिल जाता है। न्यूजीलैंड का विल ऑफ राइट' (1990), धर्म के पालन और प्रसार, धार्मिक कृत्य की आजादी देता है, परंतु 2005 में सिख समुदाय द्वारा सार्वजनिक जगहों पर कृपाण रखने की जिद ने विवाद पैदा किया। न्यूजीलैंड के सभी भारतवंशी कई नृजातीय तथा धार्मिक समूहों से मिलकर बने हैं और सबके अपने हित एक साथ रहने से टकराते हैं। सभी भारतीयों के बीच एकता बनाए रखने के लिए 'द न्यूजीलैंड इंडियन सेंट्रल एसोसिएशन बनाया गया जो भारतीयों के सभी समूहों की स्वतंत्र पहचान के साथ एकता के लिए काम कर रहा है।

इसकी एकता से संबंधित प्रयासों में प्रथम कार्य भारतीय त्योहारों को मनाना है। इसी कोशिश के फलस्वरूप 'द एशियन न्यूजीलैंड फाउनडेशन' दीवाली पर्व का प्रमुख स्पांसर बना। साथ ही भारत में मनाए जाने वाले राष्ट्रीय पर्वो यथा : गांधी जयंती स्वतंत्रता दिवस आदि भी मनाया जाना प्रारंभ हुआ। न्यूजीलैंड में आने वाली इंडो- फिजीयन समुदाय की नई पीढ़ी अपने को भारतीय पहचान से जोड़ती है। इनकी पुरानी पीढ़ी न्यूजीलैंड में भी अपने घर की भाषा के रूप में 'फीजी हिंदी' ही बोलती है।


1984 से न्यूजीलैंड में भारतवंशीय अपने बच्चों को भारतीय संस्कृति और भारतीय भाषा का ज्ञान देने के लिए ऑकलैंड के गांधी ग्रंथ गुजराती विद्यालय द्वारा 'संडे स्कूल को स्थापित किया है। न्यूजीलैंड के गोरे यूरोपीय लोगों का संगठन द व्हाईट न्यूजीलैंड लीग के द्वारा भारतीय समुदाय के प्रति नस्लीय भेदभाव की गतिविधियों का इग्लैंड की रानी क्वीन विक्टोरिया द्वितीय द्वारा भी विरोध किया गया। लीग की नस्लवादी गतिविधियों के विरोध में ही इंदर सिंह रंधावा के नेतृत्व में 1926 ई. में 'न्यूजीलैंड इंडियन सेंट्रल एसोसिएशन का गठन किया गया।