श्रीलंका में भारतीयों की समस्या - problem of indians in sri lanka
श्रीलंका में भारतीयों की समस्या - problem of indians in sri lanka
कालांतर में श्रीलंका में भारतीय तमिल श्रमिकों के कारण भारतीयों की संख्या बढ़ गई। ब्रिटिश काल में इन भारतीय प्रवासियों को वही अधिकार प्राप्त थे जो श्रीलंका के निवासियों को थे, लेकिन 1948 ई. में जब श्रीलंका स्वतंत्र हुआ तो वहाँ की सरकार ने यह अनुभव किया कि इतनी बड़ी संख्या में भारतीयों के श्रीलंका में रहने के कारण वहाँ के मूल निवासियों को पर्याप्त अवसर सुलभ नहीं हो पाएँगे। अतः उन्होंने अधिकांश भारतीयों को भारत वापस भेजने का निश्चय किया। श्रीलंका की संसद ने तुरंत कई अधिनियम बनाए जिसके आधार पर भारतीय मूल के लोगों को मताधिकार से वंचित कर दिया गया और उन्हें यह कहा गया कि श्रीलंका की नागरिकता प्राप्त करने के लिए वे इस बात का सबूत दें कि उनका जन्म श्रीलंका में हुआ है अथवा 1939 ई. से वे श्रीलंका में निवास कर रहे हैं।
स्वतंत्रता के बाद श्रीलंका ने अपने नागरिक अधिनियम संख्या 18 (1948)' तथा 'भारतीय पाकिस्तानी निवासी (नागरिक) अधिनियम संख्या 3 (1949) तथा संशोधित अधिनियम संख्या 37 (1950)' तथा 'अधिनियम संख्या
45 (1952)' द्वारा इन्हें मताधिकार से वंचित कर दिया। इसके अतिरिक्त, नागरिकता हेतु भी उन्हें प्रमाणित करना होगा कि उनके माता-पिता या वे स्वयं श्रीलंका में जन्मे हैं तथा 1939 से लगातर श्रीलंका में रह रहे हैं (यादव, 2013 202) | इस स्थिति से इन तमिल भारतीयों के लिए कई समस्याएँ खड़ी हो गई। श्रीलंका की सरकार का ध्येय यह था कि वह ऐसी व्यवस्था करे ताकि कम-से-कम भारतीयों को वहाँ की नागरिकता प्राप्त हो और सभी अनागरिकों को श्रीलंका से हटाया जा सके।
तमिल लोग जिनका प्रमुख निवास स्थान दक्षिण भारत का तमिलनाडु राज्य है, इस संघर्ष से परेशान होकर भारत में शरणार्थियों के रूप में आने लगे। स्वदेशी तमिल नस्ल के लोगों के ऊपर आए संकट और तमिल शरणार्थियों की बढ़ती संख्या के बाद 1987 में भारत सरकार ने श्रीलंका की तमिल समस्या को सुलझाने की कोशिश की। इसके बाद भारत और श्रीलंका की सरकार ने एक समझौते पर हस्ताक्षर किए। इसमें तमिल उग्रवादियों को शामिल नहीं किया गया। 1975 में वेलुपिल्लई प्रभाकरण द्वारा कई तमिल युवा जो श्रीलंका सरकार की नीतियों से क्षुब्ध थे और जो सरकार के तमिलों के प्रति नीति से उदासीन थे,
प्रभाकरन ने ऐसे युवाओं का विश्वास जीत लिया और लिट्टे नामक (LTTE) नामक संस्था का गठन किया। 1980 के दशक के आरंभ में श्रीलंका की तमिल जनता के एक हिस्से ने अपने स्वतंत्र राज्य की स्थापना के लिए लिट्टे के नेतृत्व में सशस्त्र संघर्ष आरंभ कर दिया। यह तमिल जनता मूलतः भारतीय थी तथा श्रीलंका के पड़ोसी भारतीय प्रदेश तमिलनाडु की जनता की सहानुभूति व समर्थन इस संघर्ष को स्वाभाविक रूप से प्राप्त था। भारत के लिए न तो यह संभव था कि वह मूकदर्शक बनकर तमिल लोगों पर हो रहे दमन व उत्पीड़न को देखता रहे और न ही उसके हित में यह था कि गृहयुद्ध की विभीषिका श्रीलंका की एकता को छिन्न-भिन्न कर दे ( वर्मा, 2010: 418-419)।
तमिल हितों के साथ-साथ श्रीलंका की एकता की रक्षा के दोहरे उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए ही तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार ने श्रीलंका के प्रश्न पर प्रभावी हस्तक्षेप किया तथा 29 जुलाई, 1987 ई. को भारत-श्रीलंका समझौता किया गया। इस समझौते के तहत भारत की सेना शांति को बनाए रखने के उद्देश्य से श्रीलंका पहुँची। राजीव जयवर्द्धने समझौता असफल सिद्ध हुआ। इससे श्रीलंका में शांति की स्थापना तो नहीं हुई पर भारतीय सेना को दो वर्ष के अनावश्यक युद्ध में फँस जाना पड़ा। भारत-श्रीलंका के संबंधों में मधुरता के स्थान पर और अधिक कड़वाहट आ गई। 1990 ई. में भारत की सेना को श्रीलंका से वापस बुला लिया गया। इसकी कीमत राजीव गांधी को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। लिट्टे के द्वारा उनकी हत्या करा दी गई।
1990 ई. के दशक के आरंभ से ही श्रीलंका के तमिल प्रश्न' पर भारत सरकार की सोच में परिवर्तन आने लगा था। एक नई सोच उत्पन्न होने लगी कि श्रीलंका का तमिल प्रश्न एक विदेशी मामला है तथा भारत को अपने को इससे अलग रखना चाहिए। इस सोच को आगे बढ़ाने का काम उस समय (1989-90) की सरकार के विदेशमंत्री इंद्रकुमार गुजराल के द्वारा किया गया था। अत इसे 'गुजराल सिद्धांत के नाम से भी जाना जाता है। जहाँ एक ओर श्रीलंका के प्रति भारतीय सोच और नीति में परिवर्तन आ रहा था, तो वहीं दूसरी ओर इस दशक में श्रीलंका की सरकार तथा लिट्टे के मध्य खूनी संघर्ष में तेजी आई। 1994 ई. में श्रीलंका के चुनाव में चंद्रिका कुमारतुंगे के दल को सफलता मिली। सत्ता में आते ही चंद्रिका ने तमिल प्रश्न के व्यावहारिक समाधान के लिए प्रयास आरंभ कर दिए ( वर्मा, 2010:
436-437) श्रीलंका में बहुसंख्यक सिंहलीसरकार और अल्पसंख्यक तमिलों के बीच 23 जुलाई, 1983 ई. से संघर्ष आरंभ हुआ। मई 2009 ई. में श्रीलंकाई सरकार ने लिट्टे को परास्त कर दिया। लगभग 25 वर्षों तक चले इस गृहयुद्ध में दोनों ओर से बड़ी संख्या में लोग मारे गए और यह युद्ध द्वीपीय राष्ट्र की अर्थव्यवस्था और पर्यावरण के लिए घातक सिद्ध हुआ। लिट्टे द्वारा अपनाई गई युद्ध नीतियों के चलते 32 देशों ने इसे आतंकवादी गुटों की श्रेणी में रखा जिनमें भारत, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, यूरोपीय संघ के बहुत से सदस्य राष्ट्र हैं। एक-चौथाई सदी तक चले इस जातीय संघर्ष में सरकारी आंकड़ों के अनुसार लगभग *80,000 लोग मारे गए।
तमिल ईलम / लिट्टे विश्व का एक प्रमुख आतंकवादी और उग्रवादी संगठन है, जो श्रीलंका के उत्तरी और उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में दो दशकों से अधिक समय से सक्रिय था। इस संगठन को एक समय दुनिया के सबसे ताकतवर गुरिल्ला लड़ाकों में गिना जाता था, जिसपर भारतीय प्रधानमंत्री राजीव गांधी (1991), श्रीलंकाई राष्ट्रपति प्रेमदासा रनसिंघे (1993) सहित कई लोगों को मारने का आरोप था। भारत सहित कई देशों में यह एक प्रतिबंधित संगठन है। लिट्टे के प्रमुख संस्थापकवेलुपिल्लई प्रभाकरण थे, जिसे 18 मई, 2009 ई. को श्रीलंका सेना ने मार गिराने का दावा किया।
सन् 2007 ई. में श्रीलंका सेना ने तमिल बाग़ियों के खिलाफ एक सशक्त अभियान शुरू किया। इसमें लिट्टे को छोड़कर आए कुछ बड़े नाम भी श्रीलंका सरकार से मिले हुए थे।
पहले उत्तर में और फिर थोड़ा पूरब में सेना को सफलता मिली। मार्च 2009 ई. में सेना धड़ल्ले से आगे बढ़ने लगी और लिट्टे के लड़ाके पीछे। पहले उत्तर की तरफ जाफना में सिंहली सेना का अधिकार हो गया। इससे और इससे पहले की सफलताओं से उत्साहित होकर पूरब की तरफ़ सेना का अभियान जोरदार होता गया। सबसे आखिरी गढ़ मुलईतिवु के जंगल और उससे सटे मुलईतिवु कादलदलों से घिरा छोटा-सा प्रायद्वीप था जो उत्तर-पूर्वी तट पर स्थित था। तीन ओर से पानी और एक तरफ़ से मिट्टी की बनाई दीवार के पार से सिंहली सेना द्वारा बुरी तरह घिर जाने से लिट्टे मूकसा हो गया था। 18 मई, 2009 ई. को प्रभाकरण के मारने के दावे के
साथ ही इसका अस्तित्व खत्म हो गया है। श्रीलंकाई सरकार, तमिल भाषा, संस्कृति और धर्म को मिटाने के अपने कार्यक्रम पर कथित तौर पर अभियान को चलाती रही है। उन्होनें श्रीलंका के अधिकारियों द्वारा तमिल गाँवों के नाम सिंहली भाषा में बदल डालने के मामले में उनकी मदद माँगी। 89 गाँवों का नाम बदल दिया गया और 367 हिंदू मंदिरों को ध्वस्त कर दिया गया। अकेले मुल्लैतिवु जिले में 148 छोटे और 13 मुख्य सेना शिविर बनाए गए हैं। अम्परिया जिले में 'पोत्थविल' गाँव का नाम 'पोथुविला' कर दिया गया और 'थिरुकोबी' का नाम बदलकर 'श्रीकोविला' और 'थारावैकुलम' को 'थाराक्कुलम के रूप में बदल दिया, जबकि 'वागरे' गाँव को 'वागरा' कर दिया। नीलावेली' बन गया 'निल्वेल्ला' और अलान्कुलम हो गया 'गेम्बुरुदेवा । जाफना जिले में 'बाहु कोत्तई बन गया 'बत्ताकोते' और 'पेठुरुथोवा' हो गया 'पुरुथ्थथ्ठुरै' और 'नगथीबा' का नाम बदल कर कर दिया 'नैनाथीवु' ।
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