भक्ति आंदोलन के प्रमुख संत - Prominent Saints of the Bhakti Movement
भक्ति आंदोलन के प्रमुख संत - Prominent Saints of the Bhakti Movement
रामानंद
रामानंद का जन्म 14वीं शताब्दी में प्रयाग में एक कान्यकुब्ज ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम पुण्यसदन था। रामानंद अत्यंत कुशाग्र बुद्धि के थे। अपने बाल्यकाल में ही उन्होंने अनेक ग्रंथों को रट लिया था। प्रयाग और बनारस में उन्होंने शिक्षा प्राप्त की थी तथा विजयनगर, रामेश्वर, कांची, श्रीरंगम, जनार्दन, मथुरा, वृंदावन, चित्रकूट आदि स्थानों की यात्रा की। अल्प आयु में ही वे रामानुज संप्रदाय में दीक्षित हो गए थे तथा अपनी प्रबल मेधा के बल पर वे धर्म प्रचारक के पद पर आसीन हो गए। '' अगस्त- संहिता' के अनुसार काशी में 1410 ई. में उनकी मृत्यु हो गई।
उत्तरी भारत में इस आंदोलन में प्राण फूंकने का श्रेय रामानंद को मिलता है। एक विद्वान के शब्दों में, दक्षिण में अलवार संतों में भक्ति का बहुत कुछ विकास हो चुका था और वहीं से भक्ति की लहर उत्तर भारत में पहुँची।
इस भक्ति की लहर को उत्तर में लाने वाले रामानंद का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है कि इनके शिष्य सगुण और निर्गुण दोनों प्रकार के उपासक थे। वस्तुतः उत्तर भारत में भक्ति के महान आंदोलन को चलाने का श्रेय रामानंद को है।"
रामानुज
रामानुज का जन्म आधुनिक आंध्र के त्रिपुरी नामक स्थान पर, लगभग 12वीं शताब्दी के प्रथम चरण में हुआ था। ये दक्षिण के एक महान वैष्णव प्रचारक थे। प्रारंभ में शंकराचार्य के प्रभाव में रहे लेकिन कुछ काल पश्चात् ही शंकराचार्य के अद्वैतवाद तथा मायावाद का उन्होंने खंडन किया तथा भक्ति और प्रेम-भावना पर विशेष बल दिया।
उनका विचार था कि बिना मन की एकाग्रता तथा भक्ति के मोक्ष प्राप्ति संभव नहीं है। रामानुज के अनुसार एक शूद्र तथा अंत्यज भी भक्ति और प्रेम के माध्यम द्वारा मुक्ति प्राप्त कर सकता है। उन्होंने शूद्रों को एक निश्चित दिवस पर मंदिर प्रवेश की आज्ञा दे दी। यह सत्य है कि रामानुज वर्ण व्यवस्था के विरोधी नहीं थे और उन्होंने शूद्रों को अपना शिष्य नहीं बनाया; परंतु उनके हृदय में उदारता थी जिसकी प्रेरणा से उन्होंने शूद्रों और अंत्यज्ञों के लिए आत्म-समर्पण ( प्रपत्ति) का विधान निश्चित किया।
माध्वाचार्य
माध्वाचार्य का जन्म 12वीं शताब्दी के लगभग हुआ था। वे शंकराचार्य के दर्शन के विरोधी थे। उन पर भागवत दर्शन का विशेष प्रभाव था।
देश के विभिन्न भागों में घूम-घूम कर उन्होंने शास्त्रार्थ किया। अनेक विद्वान इनके अकाट्य तर्कों के आगे परास्त हो गए। 'गीताभाष्य' में इनकी प्रतिभा के विशेष दर्शन होते हैं। माध्वाचार्य के अनुसार, सुख-दुखों की स्थिति कर्मानुसार होने से भगवान को न भूलो तथा दुःख- काल में भी उसकी निंदा न करो। वेद शास्त्रसम्मत कर्म-मार्ग पर अटल रहो। कोई भी धर्म करते समय बड़े दीन भाव से भगवान का स्मरण करो। भगवान ही सबसे बड़े, सबके गुरु तथा जगत के माता-पिता हैं। इसलिए अपने सारे कर्म उन्हीं को अर्पण करने चाहिए।"
बल्लभाचार्य
दक्षिण के प्रमुख संतों में बल्लभाचार्य का नाम आता है। आपका जन्म सन् 1479 के लगभग हुआ था।
ये बुद्धि के बड़े कुशाग्र थे। 13 वर्ष की आयु में वेद, पुराण तथा विभिन्न शास्त्रों का अध्ययन कर लिया था। ये शंकराचार्य के मायावाद के विरुद्ध थे। उनके अनुसार जीव उतना ही सत्य है जितना ब्रह्म । इन्होंने तत्कालीन समाज को श्रीकृष्ण भक्ति का उपदेश दिया। बल्लभाचार्य का मत था कि इस संसार में शांति प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को भगवान की भक्ति में अवश्य लीन रहना चाहिए। भगवान कृष्ण ही ब्रह्म हैं, उनकी सेवा करना ही जीवन का प्रमुख उद्देश्य होना चाहिए। सांसारिक मोहममता को छोड़कर अपना सर्वस्व भगवान कृष्ण के चरणों में अर्पित कर देना चाहिए। वल्लभाचार्य के जीवन के अधिकांश दिन ब्रज में ही व्यतीत हुए।
रैदास
ये कबीर के समकालीन थे। रामानंद के प्रमुख शिष्यों में इनका भी नाम आता है निर्गुण भक्ति में इनकी अटूट श्रद्धा थी।
इन्होंने ईश्वर के चरणों में पूर्ण आत्मसमर्पण का उपदेश दिया। मानव समानता इनका प्रमुख सिद्धांत था। यह जाति के चमार थे। इनके अनुसार, संसार के समस्त प्राणी ईश्वर की दृष्टि में समान हैं, अतः मानवकृत भेदभाव कोई महत्व नहीं रखते। उनकी ओजपूर्ण वाणी तथा भक्ति भावना से लोग अत्यधिक प्रभावित हुए और ब्राह्मण तक श्रद्धा से उनके आगे सिर झुकाने लगे। रैदास वास्तव में प्रेम और वैराग्य की मूर्ति थे। उनके नाम पर रैदासी संप्रदाय का सूत्रपात हुआ।
नानक
नानक का जन्म 1469 ई. में तालवण्डी नामक गाँव में हुआ था। तालवण्डी का वर्तमान नाम 'ननकाना है। यह लाहौर से 35 मील दक्षिण-पश्चिम में स्थित है।
नानक ने प्रारंभिक शिक्षा पाठशाला में पाई थी, परंतु वे बचपन से ही चिंतनशील थे। प्रारंभ से ही वे शिक्षा के प्रति उदासीन थे तथा पाँच वर्ष की आयु से ही वे जीवन के उद्देश्य के बारे में प्रश्न करने लगे। जब वे बारह वर्ष के थे तभी उनके पिता ने उनका विवाह एक खत्री कन्या से कर दिया। कुछ काल तक वे अपने श्वसुर के साथ काम करते रहे परंतु उनका वहाँ मन नहीं लगा और वे भजन कीर्तन में लीन रहने लगे। जब उनकी आयु केवल 29 वर्ष की थी तब उन्हें एक रहस्यानुभूति हुई और वे नौकरी छोड़कर सर्वसाधारण को उपदेश देने लगे। उनके समस्त कार्यक्रम की प्रमुख घोषणा थी न कोई हिंदू है और न कोई मुसलमान कबीर के विपरीत नानक एक सुशिक्षित संत थे। पंजाबी के अतिरिक्त उन्होंने हिंदी और फारसी का भी ज्ञान प्राप्त किया था। संपूर्ण भारत काभ्रण करने के पश्चात् वे मध्य एशिया के कुछ देशों तथा अरब भी गए।
चैतन्य महाप्रभु
चैतन्य महाप्रभु का जन्म सन् 1485 में बंगाल में हुआ था। भक्ति आंदोलन के महान प्रवर्तकों में चैतन्य का नाम सबसे ऊपर आता है। इनके पिता का नाम जगन्नाथ और माता का नाम शचीदेवी था। चैतन्य गौर वर्ण के थे, अतः इन्हें गौरांग कहकर भी लोग पुकारते थे। संन्यास ग्रहण करने पर ये चैतन्य कहलाए। इन्होंने नवद्वीप के विख्यात पंडित गंगादास की पाठशाला में व्याकरण तथा न्याय शास्त्र का अध्ययन किया। शिक्षा के क्षेत्र में उन्होंने अपूर्व प्रतिभा का परिचय दिया। 9 वर्ष की आयु में इनका उपनयन संस्कार हुआ। 14 वर्ष की आयु में चैतन्य ने कलाप-व्याकरण की टीका लिखी। नवद्वीप में न्याय- शास्त्र की एक पाठशाला भी खोली। इस पाठशाला की प्रसिद्धि शीघ्र ही चारों ओर फैल गई। दूर-दूर से छात्र ज्ञानार्जन के लिए आने लगे।
संत कबीर
भक्तिकालीन संतों में कबीर का नाम सबसे ऊपर आता है। कबीर एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से पैदा हुए थे। ब्राह्मणी ने लज्जा के कारण बनारस के तालाब के पास इन्हें डाल दिया। एक मुसलमान जुलाहे ने उठाकर अपने पास रख लिया था और बड़े लाड़-प्यार से इनका लालन-पालन किया। अधिकांश विद्वानों के अनुसार इनका जन्म सन् 1440 के लगभग हुआ था। बड़े होने पर वे रामानंद के • शिष्य हो गए। इस विषय में उन्होंने स्पष्ट लिखा है कि “काशी हम प्रगट भये, रामानन्द चेताये।" कुछ विद्वान शेख तकी को इनका गुरु मानते हैं, परंतु इस कथन के ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिलते। प्रायः विद्वान रामानंद को ही कबीर का गुरु मानते हैं। इस पर भी यह स्वीकार करना पड़ेगा कि अपने जीवन के आरंभिक दिवसों में वे बनारस के संत गोसाई अष्टानंद की शिक्षाओं से अत्यधिक प्रभावित थे।
वास्तव में किवदंतियों और परंपरागत वृत्तांतों के अतिरिक्त कबीर के जीवन पर कोई भी ऐतिहासिक प्रमाण नहीं प्राप्त होता। उनके विषय में सर्वप्रथम उल्लेख गुरु नानक की "जन्म-साखी" में आया है। कबीर के विषय में विस्तृत वृत्तांत | 7वीं शताब्दी में, मुगल इतिहासकार मुहसिन फानी ने दिया है। उसने अपने ग्रंथ में कुछ प्राचीन परंपराओं का भी उल्लेख किया है, उसका यह उद्धरण उल्लेखनीय है : यह कहा जाता है कि ब्राह्मण विद्वानों का एक दल गंगा तट पर बैठा हुआ उस पवित्र नदी के जल की स्तुति कर रहा था, जो पापों को धो देता है। बातचीत के बीच में, उनमें से एक को प्यास लगी। कबीर अपनी जगह से उठा और अपने पास के एक लकड़ी के प्याले में जल भर कर उस ब्राह्मण के पास ले गया।
कबीर के जुलाहा और निम्न वर्ण का आदमी होने के कारण उसने जल को स्वीकार नहीं किया गया। कबीर ने कहा, "तुमने घोषणा की थी कि गंगाजल आत्मा और शरीर दोनों को हर प्रकार के पापों से नष्ट कर देता है, किंतु जब यह प्याले को भी पवित्र करने योग्य नहीं है तो यह जल भी तुम्हारी प्रशंसा का पात्र नहीं है।" मुहसिन फानी आगे लिखते हैं, “एक दूसरे दिन कबीर एक मालिन को देख रहा था, जो एक मूर्ति पर चढ़ाने के लिए फूलों को जमा कर रही थी। उसने (कबीर ने उससे कहा, फूलों की पंखुड़ियों में वनस्पति की आत्मा होती है। जिस मूर्ति को तुम पुष्प चढ़ाने जा रही हो, उसमें न तो प्राण हैं और न ही अनुभवा वनस्पति इससे कहीं बढ़-चढ़कर है। यदि मूर्ति में चेतना होती तो वह मूर्तिकार को दंडित करती, जिसे तराशते समय उसे उसकी छाती पर पैर रखने पड़ते थे। जाओ, उसकी पूजा करो जो बुद्धिमान, कुशाग्रबुद्धि और परिपूर्ण है।"
मीराबाई
मीराबाई का नाम भक्तिकालीन संतों में विशेष श्रद्धा के साथ लिया जाता है। इनके पिता का नाम रतनसिंह राठौर था। वे बचपन से ही भगवान कृष्ण की भक्ति की ओर झुकी हुई थीं। बाल्यकाल से ही इन्होंने स्वयं पदरचना आरंभ कर दी थी। बड़े होने परमीरा का विवाह चित्तौड़ के सिसोदिया वंश के कुमार भोजराज के साथ हुआ। विवाह के पश्चात् भी मीरा की भक्ति में किसी प्रकार की कमी नहीं आई। मीराबाई की तरुण अवस्था में ही भोजराज का देहावसान हो गया। पति के मृत्यु के पश्चात् मीराबाई ने अपना संपूर्ण ध्यान भगवान कृष्ण की भक्ति में लगा दिया। भक्त के रूप में मीराबाई का नाम छू-दूर तक फैल गया। वे अपना अधिकांश समय भगवान की भक्ति पूजा तथा साधु-संगति में लगाने लगी। कभी वे विरह से व्याकुल होकर रोने लगती तो कभी भगवान के प्रेम में आकर नाचने लगतीं। अनेक दिन तक बिना खाए-पिए कृष्ण के आगे समाधि लगाए पड़ी रहतीं।
मीरा ने अपने जीवनकाल में अनेक मधुरतम गेय पद लिखे। ये पद भगवान कृष्ण की भक्ति के रस में डूबे हुए हैं। इन पर्दों के कारण ही मीराबाई का नाम अमर हो गया। पदों की भाषा ब्रज तथा राजस्थानी दोनों है। कुछ पद गुजराती भाषा में भी लिखे गए हैं। भगवान कृष्ण को संबोधित किए गए गीत अपनी मधुरता और सरलता के लिए प्रसिद्ध हैं।
तुलसीदास
कबीर के समान तुलसीदास भक्तिकालीन संतों में प्रमुख स्थान रखते हैं। इनकी जन्मतिथि के विषय में विद्वानों में मतभेद है। जॉर्ज ग्रियर्सन इनकी जन्मतिथि 1589 वि.सं. मानते हैं।
डॉ. माताप्रसाद गुप्त का भी यही मत है। विल्सन ने तुलसीदास की जन्म तिथि संवत् 1600 वि. सं. मानी है, जो निराधार है। डॉ. आशीर्वादीलाल ने यह तिथि 1532 ई. के लगभग मानी है।
परंपराओं के आधार पर यह कहा जाता है कि इनके पिता का नाम आत्माराम दुबे था तथा माता का नाम हुलसी था। इनका विवाह दीनबंधु पाठक की पुत्री रत्नावली के साथ हुआ था। तुलसी अपनी पत्नी से अत्यधिक प्रेम करते थे। एक दिन पत्नी द्वारा तिरस्कृत तथा व्यंगात्मक शब्दों का प्रयोग किए जाने पर गहरा आघात लगा और उनका वासनामय प्रेम वैराग्य और राम की भक्ति में बदल गया। 42 वर्ष की आयु में लगभग 1574 ई. में इन्होंने 'रामचरितमानस' का प्रारंभ किया तथा दो वर्ष और सात महीने में इसे समाप्त कर दिया।
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