श्रीलंका का प्रांतीय विभाजन , इतिहास - Provincial divisions of Sri Lanka, history
श्रीलंका का प्रांतीय विभाजन , इतिहास - Provincial divisions of Sri Lanka, history
प्रशासकीय रूप से श्रीलंका 9 प्रांतों में बँटा हुआ है। इन 9 प्रांतों में कुल 25 जिले हैं। इन जिलों के तहत मंडलीय सचिवालय आते हैं और इनके घटक इकाइयों को ग्राम सेवक कहते हैं।
श्रीलंका का इतिहास
भारतीय पौराणिक काव्यों में इस स्थान का वर्णन श्रीलंका के रूप में किया गया है। इतिहासकारों में इस बात की आम धारणा थी कि श्रीलंका के आदिम निवासी और दक्षिण भारत के आदि मानव एक ही थे, पर अभी ताजा खुदाई से पता चला है कि श्रीलंका के शुरुआती मानव का संबंध उत्तर भारत के लोगों से था। भाषिक विश्लेषणों से पता चलता है कि सिंहली भाषा, गुजराती भाषा और सिंधी भाषा से जुड़ी है।
प्राचीन काल से ही श्रीलंका पर शाही सिंहल वंश का शासन रहा है। समयसमय पर दक्षिण भारतीय राजवंशों का भी आक्रमण इस पर होता रहा है। तीसरी सदी ईसा पूर्व में मौर्य सम्राट अशोक के पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा के यहाँ आने पर बौद्ध धर्म का आगमन हुआ। ऐसा विश्वास किया जाता है। कि राजकुमार विजय और उसके 700 अनुयायी ई. पू. 543 में श्रीलंका में जहाज से उतरे थे। ये लोग 'सिंहल' कहलाते थे, क्योंकि पहले पहल 'सिंहल की उपाधि धारण करने वाले राजा सिंहबाहु से इनका निकट संबंध था। (सिंह को मारने के कारण यह राजा सिंहल कहलाया)। विजय श्रीलंका का पहला राजा था और उसने जिस राज्य की स्थापना की वह करीब 2358 वर्ष तक कायम रहा।
चोल वंश के सबसे शक्तिशालीराजा राजराजा ( 985-1014 ई.) तथा उसका पुत्र राजेंद्र प्रथम ( 1012-1044 ई.) थे। उसने श्रीलंका पर आक्रमण किया और उस द्वीप के उत्तरी हिस्से को अपने साम्राज्य का अंग बना लिया। ये क़दम उसने इसलिए उठाया, क्योंकि वह दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों से होने वाले व्यापार को अपनी मुट्ठी में रखना चाहता था। उन दिनों कोरोमंडल तट तथा मालाबार भारत तथा दक्षिण पूर्व एशिया के बीच होने वाले व्यापार के केंद्र थे।
सोलहवीं सदी में यूरोपीय शक्तियों ने श्रीलंका में अपना व्यापार स्थापित किया। यह देश चाय, रबड़, चीनी, कॉफ़ी, दालचीनी सहित अन्य मसालों का निर्यातक बन गया।
पहले पुर्तगाल ने कोलंबो के पास अपना दुर्ग बनाया। धीरे-धीरे पुर्तगालियों ने अपना प्रभुत्व आस-पास के इलाकों में बना लिया। श्रीलंका के निवासियों में उनके प्रति घृणा घर कर गई। उन्होंने डच लोगों से मदद की अपील की। 1630 ईस्वी में डचों ने पुर्तगालियों पर हमला बोला और उन्हें मार गिराया, लेकिन इसका असर श्रीलंकाईयों पर भी हुआ और उन पर डचों ने और ज्यादा कर थोप दिया। 1660 तक अंग्रेजों का ध्यान भी इस पर गया। नीदरलैंड पर फ्रांस के अधिकार होने के बाद अंग्रेजों को डर हुआ कि श्रीलंका के डच इलाकों पर फ्रांसिसी अधिकार हो जाएगा। तदुपरांत उन्होंने डच इलाकों पर अधिकार करना आरंभ कर दिया। 1800 ई. के आते-आते तटीय इलाकों पर अंग्रेजों का अधिकार हो गया। 1818 तक अंतिम राज्य कैंडी के राजा ने भी आत्मसमर्पण कर दिया और इस तरह संपूर्ण श्रीलंका पर अंग्रेजों का अधिकार हो गया। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद 4 फरवरी, 1948 ई. को देश को पूर्ण स्वतंत्रता मिली।
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