भारत छोड़ो आंदलनों और महिलाएँ - Quit India Movements and Women

भारत छोड़ो आंदलनों और महिलाएँ - Quit India Movements and Women


1942 के भारत छोड़ो आंदलनों में स्त्रियों ने काफी बड़ी संख्या में भाग लिया. इस बार महिलाओं को आदलनों में शामिल होने की मिन्नतें नहीं करनी पड़ीं बल्कि स्वयं आंदलनों के लिए महिलाओं का आह्वान किया गया. अरुणा आसफ़ अली इस आंदलनों की सबसे महत्वपूर्ण नेता थीं. उन्हीं ने बम्बई के टैंक मैदान में 9 अगस्त 1942 को तिरंगा फहरा कर इसका ऐलान किया. 'करो या मरो' की उद्घोषणा के साथ भारत छोड़ो आंदलनों की शुरुआत इसी मैदान से हुई थी. घोषणा के बाद कांग्रेस के सभी प्रमुख नेता गिरफ्तार कर लिए गए, किंतु स्वयं अरुणा आसफ़ अली भूमिगत हो गई. तीन-चार साल भूमिगत रहते हुए भी वे लोगों को विदेशी शासन से मुक्त होने के संघर्ष की प्रेरणा देती रहीं.

इस समय सुचेता कृपलानी ने महिला संगठनों को एकसूत्रता में पिरोने का काम शुरू किया सुचेता कृपलानी विशुद्ध गाँधीवादी थीं. उन्होंने अहिंसा का मार्ग अपनाया, जबकि अरुणा आसफ़ अली का रास्ता हिंसाचार का निषेध नहीं करता था.


भारत छोड़ो आंदलनों में हजारों महिलाओं ने भाग लिया. भारत छोड़ो आंदलनों से जुड़ी अनेक महिलाएँ आगे चलकर आंदलनों की क्रान्तिकारी धारा से जुड़ीं और सक्रिय रहीं. क्रांतिकारी आंदलनों की धारा के कार्यक्रम उन्होंने अपनाए जैसे कि भूमिगत होना, समानान्तर सरकार बनाना, गैरकानूनी गतिविधियों में शामिल होना, आदि. किसान आंदलनों से जुड़ी अनेक महिलाएँ इस आंदलनों में थीं. भारत छोड़ो आंदलनों ने प्रकारान्तर से आज़ादी की क्रान्तिकारी आंदलनों की धारा को प्रशस्त किया.