राजपूतों की पराजय के कारण - Reasons for the defeat of the Rajputs

राजपूतों की पराजय के कारण - Reasons for the defeat of the Rajputs


प्राचीनकाल में भारतीय नरेशों और उनकी सेना ने विदेशी आक्रमणकारियों का सफलतापूर्वक दृढ़ता से सामना किया और उन्हें पराजित कर खदेड़ दिया। चंद्रगुप्तमौर्य ने सेल्यूकस को, पुष्यमित्र शुंग ने मिनेंडर को तथा गुप्त सम्राटों ने हूणों को परास्त कर खदेड़ दिया। मध्यकाल में इस्लाम के अनुयायियों के निरंतर शृंखलाबद्ध आक्रमण हुए। इन आक्रमणकारियों का राजपूतों ने युद्धों में सामना किया, पर वे इन विदेशियों को स्थायी रूप से रोक न सके। उनके सामने अनेक राजपूत नरेश नत मस्तक हुए। जिस प्राचीन भारत से विदेशी आक्रमणकारी पराजित होकर रणक्षेत्र से पीछे लौट गए, उसी मध्यकालीन भारत में 11 वीं एवं 12वीं सदी में तथा उसके बाद विदेशी आक्रमणकारी 'तुर्क' विजेता हो गए और अपना राज्य स्थापित कर दीर्घकाल तक भारत में शासन करते रहे।

देश की राजनीतिक स्वतंत्रता लुप्त हो गई। यद्यपि तुर्की की इस विजय का कारण भारत की तत्कालीन राजनीतिक और सामाजिक दशा थी, परंतु राजपूत राजवंश भी इस विफलता के लिए मुख्य रूप से उत्तरदायी हैं। यह निर्विवाद है कि तुर्कों के आक्रमणों के समय भारत अनेक दृष्टि से पतनोन्मुख हो चुका था और विदेशियों ने इसका लाभ उठाकर यहाँ अपना राज्य स्थापित किया, परंतु इसके लिए तत्कालीन सत्तारूढ़ राजपूतों का महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व है। राजपूतों की पराजय एवं मुस्लिमों की सफलता के कारण निम्नलिखित हैं:- 


राजनीतिक कारण


राजपूतों की पराजय या मुसलमानों की विजय के राजनीतिक कारण निम्नलिखित हैं:-


  1. राजनीतिक विशृंखलन


मुसलमानों के आक्रमण के पूर्व समस्त उत्तरी भारत राजनीतिक विशृंखलन की पराकाष्ठा पर पहुँच गया था। हर्ष के देहावसान के पश्चात् उत्तरी भारत अनेकानेक छोटे-छोटे राजपूत राज्यों में विभक्त हो गया था। उनमें विघटन की प्रवृत्ति थी, संगठन की नहीं। अनेक बार राजपूत राजाओं ने अपने प्रतिद्वंद्वी का विनाश करने के लिए विदेशियों को आमंत्रित किया, उन्हें अपने प्रतिद्वंद्वी के विरुद्ध सहायता और सहयोग दिया एवं समय आने पर गुप्त भेद भी प्रकट कर दिया। मुसलमानों ने इस राजनैतिक स्थिति का लाभ उठाकर आक्रमण किए और एक-एक करके राजपूत नरेशों को परास्त कर दिया।


 (2) दृढ़ केंद्रीय सत्ता और राष्ट्रीयता का अभाव


राजपूतों में राष्ट्रीयता की भावना का सृजन नहीं हुआ था। राजपूत नरेश और सामंत अपने राज्य और वंश या कुल के लिए अधिक स्वामिभक्त थे। उसके लिए वे अपना सर्वस्व बलिदान कर देते थे। अपने राज्य या वंश के राज्य पर हुए आक्रमणों का सामना करने को वे कटिबद्ध थे, परंतु भारत के अन्य भागों पर होने वाले विदेशी आक्रमणों के प्रति वे उदासीन और तटस्थ रहते थे। उन्होंने कभी भी पूर्ण रूप से सम्मिलित और संगठित होकर आक्रमणकारियों का सामना नहीं किया। राष्ट्रीय भावना का अभाव राजपूत सैनिकों में ही नहीं था, अपितु जनता में भी था। साधारण लोग राजा के प्रति ही अपना कर्तव्य समझते थे और देश के अन्य प्रदेशों व राज्यों की घटनाओं के प्रति उदासीन और अनभिज्ञ रहते थे।

देश में राजनीतिक एकता और दृढ़ केंद्रीय सत्ता का भी अभाव था। देश में कोई ऐसी केंद्रीय शक्ति नहीं थी, जो समस्त राजपूतों को संगठित कर आक्रमणकारियों का सफलतापूर्वक सामना कर सकती। 


(3) सामंतशाही


राजपूतों में सामंत प्रथा प्रचलित होने से प्रशासन और सैन्य संगठन में सामंतों का ही बाहुल्य होता था। वे प्रशासन और सेना में उच्च पदों पर नियुक्त होते थे। राज्य की शक्ति और उसकी रक्षा इन सामंतों की स्वामिभक्ति पर आश्रित थी। राज्य की आंतरिक शांति, बाह्य भय और आतंक पर निर्भर रहती थी। जब राज्य पर किसी बाहरी शत्रु के आक्रमण का भय नहीं रहता था, तो ये सामंत अस्थिर हो जाते थे।

और उनके तथा राजवंशों और राजपूतों के विभिन्न झगड़े प्रबल हो जाते थे। इसके अतिरिक्त राजा के दुर्बल होने पर या उसके देहावसान होने पर बड़े-बड़े सामंत स्वतंत्र राजा बन जाने का प्रयास करते थे। इस प्रवृत्ति से राज्य में सदा पारस्परिक कलह, गृहयुद्ध और विद्रोह की संभावना बनी रहती थी। 


(4) दृढ़ सीमांत नीति का अभाव


आधुनिककाल के पूर्व भारत के समस्त आक्रमण उत्तर-प र-पश्चिमी सीमा की ओर से ही हुए। भारत के अधिकांश नरेशों ने विदेशी नीति की ओर विशेष ध्यान नहीं दिया।

उन्होंने उत्तर-प (-पश्चिमी सीमांत क्षेत्र की सुरक्षा की अवहेलना भी की। न तो उन्होंने वहाँ कोई किलेबंदी की और न दृढ़ सुसज्जित और प्रशिक्षित सेना ही रखी। फलतः देश में प्रवेश करने में बाहरी आक्रमणकारी और शत्रु को कोई कठिनाई नहीं होती थी। आक्रमणकारियों को सीमा पर रोकने और खदेड़ने के प्रयत्न नहीं किए जाते थे। सीमांत क्षेत्र के छोटे-छोटे राज्यों में एकता व संगठन का अभाव तो था ही, पर वे अपने पारस्परिक संघर्ष और युद्ध में इतने संलग्न रहते थे कि वे विदेशी आक्रमणकारी को रोकने में असमर्थ हो गए। इससे आक्रमणकारी सीमांत क्षेत्र से पंजाब में सरलता से आ सके और विजय प्राप्त कर सके। पंजाब से दिल्ली बढ़कर और वहाँ अपना सैनिक आधार बनाकर वे अन्य राज्यों को सरलता से परास्त कर सके। 


(5) कूटनीति का अभाव


राजपूत सफल कूटनीतिज्ञ नहीं थे। उनमें छल-कपट और कूटनीति नहीं थी। वे सदैव धर्मयुद्ध करते थे। उनके युद्ध के अपने उच्च आदर्श और सिद्धांत थे। वे भागते या पीठ दिखाते हुए शत्रु को परास्त कर उसका वध नहीं करते थे। वे छल-कपट द्वारा युद्ध में विजयी होना नहीं चाहते थे। वे बड़े सीधे-सादे ईमानदार और वचन बद्ध होते थे। अपनी वचन पूर्ति के लिए वे राष्ट्र हितों का बलिदान तक कर देते थे। और शत्रु के सम्मुख वे बड़े से बड़े भेद प्रकट कर देते थे जिसका लाभ उठाकर शत्रुओं ने उन्हें परास्त किया। इसके विपरीत राजपूतों के तुर्क शत्रु कूटनीति और छलकपट में प्रवीण थे और वे राजनीति तथा युद्धों में इनका खुल कर सदुपयोग करते थे और राजपूतों को अपने जाल में फँसा लेते थे। इससे राजपूतों का पराभव हुआ और उन्हें खूब क्षति उठानी पड़ी। 

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(6) मुस्लिम उपनिवेशों का अस्तित्व


सीमांत क्षेत्र तथा पंजाब व दिल्ली में प्रारंभिक विजय प्राप्त कर लेने के बाद मुस्लिम आक्रमणकारियों ने वहाँ अपने उपनिवेश और राज्य स्थापित कर लिए थे। हिंदुओं में और विशेषकर राजपूत नरेशों ने इन उपनिवेशों को नष्ट करने का कोई प्रयास नहीं किया। फलतः सिंध, सीमांत क्षेत्र, पेशावर, मुलतान, लाहौर और दिल्ली पर विदेशियों का अधिकार सरलता से हो गया और वहाँ उनके स्थायी राज्य बन गए।


(7) राजनीतिक उदासीनता


भारत में अनेक अरब और तुर्क व्यापारी आते-जाते रहते थे और उनमें से अनेक भारत में स्थायी रूप से बस गए।

भारत के पश्चिमी तट पर उन्हें बसाने तथा देश के अन्य भागों में उन्हें स्थायित्व प्राप्त करने में राष्ट्रकूट नरेशों तथा अन्य राजाओं का हाथ था। इन अरब व्यापारियों ने विदेशों में भारत की राजनीतिक दुर्बलताएँ प्रदर्शित की और भारत में हिंदू धर्म के विरुद्ध इस्लाम का प्रचार किया तथा अरब और तुर्क आक्रमणकारियों को सहयोग दिया। इतना होने पर भी राजा प्रजा दोनों में ही राजनीतिक उदासीनता रही। उन्होंने अरब-तुर्क व्यापारियों के प्रवाह को अवरुद्ध नहीं किया। 


(8) राजपूतों पर रक्षा और युद्ध का भार


इसके अतिरिक्त उस युग में देश की रक्षा और युद्ध का भार केवल राजपूतों पर ही था।

बाहरी आक्रमणों के समय राजपूतों को ही शत्रुओं से लोहा लेना पड़ा। देश के अन्य लोग और जातियाँ देश के प्रति उदासीन रहीं राजपूतों को छोड़कर हिंदूसमाज की सभी जातियाँ असामरिक हो गई। फलतः सीमित संख्या वाले राजपूत दीर्घकाल तक बाहरी शत्रुओं से निरंतर युद्ध नहीं कर सके। उनकी क्षति होने लगी और उनकी संख्या में उत्तरोत्तर कमी आने लगी। इससे वे परास्त हो गए। 


(9) पारस्परिक वैमनस्य और ईर्ष्याद्वेष


राजपूतों में पारस्परिक गृह कलह, वैमनस्य और ईर्ष्या-द्वेष अत्यधिक था। राजपूत राज्यों में सद्भावना और सहयोग का सदा अभाव था।

वे एक-दूसरे से निरंतर संघर्ष करने और उन्हें नीचा दिखाने में सदा तत्पर रहते थे। इसके अतिरिक्त राजपूत राजवंशों में वैमनस्य परंपरागत हो गए थे। इससे उनकी सैनिक शक्ति आंतरिक झगड़ों में ही लग जाती थी। अतः उनकी शक्ति क्षीण हो गई और वे संगठित होकर विदेशियों के विरुद्ध संयुक्त मोर्चा स्थापित कर उनका दृढ़ता से सामना नहीं कर सके। 


(10) राजनीतिक और प्रशासकीय भेदभाव


शासन के महत्वपूर्ण पदों पर किसी भी वर्ग या जाति के, योग्य प्रतिभावान कार्यकुशल व्यक्ति की नियुक्ति होती थी, परंतु ब्राह्मणों व क्षत्रियों के वर्ग में से ही जिनकी मान प्रतिष्ठा अन्य वर्गों के व्यक्तियों की अपेक्षा अधिक थी, ऐसे पदों पर नियुक्त होते थे। इस प्रशासकीय भेद और राजनीतिक पक्षपात के कारण अन्य वर्गो व जातियों के लोग राज्य के कार्यों व कर्तव्यों में नहीं होने से लोग असंतुष्टथे। फलतः विदेशी आक्रमणों के संकटकाल में राजाओं को विशेष रूप से सहायता नहीं दी गई।