राजपूतों की पराजय के कारण - Reasons for the defeat of the Rajputs
राजपूतों की पराजय के कारण - Reasons for the defeat of the Rajputs
सामाजिक कारण
राजपूतों की पराजय या मुसलमानों की विजय के सामाजिक कारण निम्नलिखित हैं:-
(1) संकीर्ण सामाजिक भावना पूर्वमध्य युग में समाज में संकीर्ण मनोवृत्ति थी। सामाजिक व्यवस्था और घृणित वर्ण व्यवस्था की विभिन्नता ने सैन्य संगठन को जर्जर और दुर्बल बना दिया था, सामाजिक और राजनीतिक एकता नष्ट हो गई थी। सामाजिक एकता का अभाव था। राजपूत और उनकी अनेक उपजातियों को विशेष महत्व दिया जाता था। अन्य वर्गों में भी जातियों और कुलों का महत्व था। जातियों और वर्गों में परस्पर कोई सहानुभुति और सहयोग नहीं था। कुछ विभिन्न जातियों और वर्गों के लोग अपने को अन्य जातियों और वर्गों के व्यक्तियों से ऊँचा व श्रेष्ठ समझते थे तथा अन्य कुलों व जातियों को हेय मानते थे।
इस जातीय तथा कुलीनता के दभ ने समाज को दुर्बल कर दिया था। इससे समाज की सुरक्षा और संगठन की ओर लोगों ने ध्यान नहीं दिया। अधिकांश प्रजा में देशभक्ति की भावना प्रोत्साहित करने के लिए कुछ नहीं था। आक्रमणकारियों को रोकने में प्रजा ने शासकों को सहयोग नहीं दिया।
जाति, कुल या वंश की शान से प्रेरित सामाजिक संकीर्णता के कारण राजपूत किसी अन्य राज्य के अधिनायक या सेनापति के अधीन संगठित होकर बाहरी शत्रु का सामना करने में अपना अपमान समझते थे।
इसे वे अपने गौरव और प्रतिष्ठा के विरुद्ध मानते थे। वर्ग एवं जाति विभाजन से उत्पन्न संकीर्ण मनोवृत्ति से राजपूतों का वीरत्व, साहस, रण कौशल और सद्गुणों का उपयोग नहीं हो सका।
(2) विलासिता
शांति के समय राजपूतों का अधिकांश समय रनिवास की विलासिता और भोग-विलास में, सौंदर्य की गोद में द्यूत-क्रीड़ा और आखेट में तथा अन्य आमोद-प्रमोद में व्यतीत होता था। उनका यह सामाजिक पतन था। इसके अतिरिक्त निरंतर अफीम के सेवन और सुराम्पान से तथा बहुविवाह से उनकी बुद्धि कुंठित हो गई थी,
शक्ति क्षीण हो गई थी तथा स्वभाव अस्थिर हो गया था और वे शीघ्र ही आवेश में आ जाते थे। इससे शत्रु का सामना होने पर उनका पक्ष दुर्बल पड़ जाता था।
(3) अंधविश्वास और भाग्यवादिता
राजपूतों में अंधविश्वास और भाग्य वादिता का विशेष महत्व था। वे भविष्यवाणी और ज्योतिषियों में अधिक विश्वास करते थे। वे भाग्य पर विश्वास करके उसके सहारे बैठे रहते थे। उनकी यह धारणा व अंधविश्वास गया था कि कलयुग में म्लेच्छों का शासन होगा"। वे तुर्की और अरबों के आक्रमणों और राज्य को नियति का निर्णय जानकर बैठे रहे। इससे समाज की कर्मण्यता और उत्साह पर निराशा का गहरा आवरण हो गया।
देवी-देवताओं और भाग्य की आड़ में तथा ज्योंतिषियों के कथन में सामाजिक जीवन नष्ट हो गया, लोगों में जागरुकता और कार्यक्षमता लुप्त हो गई। उनमें आत्मविश्वास नष्ट हो गया, और वे उत्साही आक्रमणकारियों के सम्मुख धाराशायी हो गए।
सैनिक कारण
राजपूतों की पराजय या मुसलमानों की विजय के सैनिक कारण निम्नलिखित हैं:- (1) पदातियों का बाहुल्य
राजपूत सेनाओं में पैदल सैनिकों की संख्या सबसे अधिक होती थी। इससे वे तीव्रगति से संचालित नहीं हो सकते थे। इसके अतिरिक्त पदाति न तो अधिक गतिशील और पैंतरेबाज होते थे और न पूर्ण रूप से प्रशिक्षिता उन्हें पराजित करना अत्यंत सरल था।
इसके विपरत तुर्कों की संख्या में दृढ़ अश्वारोहियों की संख्या अधिक होती थी। वे बड़े गतिशील और प्रशिक्षित होते थे। राजपूतों के पदाति इन अश्वारोहियों से सफलतापूर्वक युद्ध करने में असमर्थ थे। इसके अतिरिक्त आक्रमणकारियों की सेना में अरबों, पठानों और तुर्कों जैसे कुदरती लड़ाकू सैनिकों ने आश्चर्यजनिक गतिशीलता प्रदान की।
(2) स्थायी सेना का अभाव
राजपूत में विशाल संगठित स्थायी सेना की संख्या नगण्य थी। राजा और प्रशासक सामंतों द्वारा प्रदत्त सेना पर निर्भर रहते थे। अधिक सैनिकों की आवश्यकता होने पर नौसिखियों को भी सेना में भर्ती कर रणक्षेत्र में भेज दिया जाता था।
युद्ध काल में भर्ती किए सैनिक युद्धकला से अपूर्ण तथा अपरिचित रहते थे। इस प्रकार सामंतों की सेना और नौसिखियों की सेना में उचित सैनिक प्रशिक्षण, अनुशासन और योग्यता का नितांत अभाव था। उनमें अपने-अपने व्यक्ति भी रहते थे। फलतः पराजय स्वाभाविक था। (3) सुरक्षा सेना का अभाव
राजपूत युद्धों के समय अपने साथ और पीछे सामरिक स्थानों में सुरक्षा सेना नहीं रखते थे। वे अपनी संपूर्ण सेना के साथ युद्ध प्रारंभ कर देते थे। जब वेयुद्ध करते-करते थक जाते तब शत्रु अपनी रक्षित सेना का उपयोग करते।
इस रक्षित और नई ताजी सेना से युद्ध में संलग्न सेना को विशेष सहायता प्राप्त होती थी, उसमें साहस व उत्साह का संचार होता था और थके हुए राजपूतों को परास्त करना सरल होता था। एक ही बार में युद्ध निर्णायक हो जाते थे।
(4) सैनिकों की दोषपूर्ण नियुक्ति
राजपूत सेनाओं में सैनिक और अधिकारी के लिए पिता के पुत्र को नियुक्त किया जाता था, चाहे उसमें सैनिक योग्यता और प्रतिभा हो या न हो, चाहे उसमें युद्ध-प्रियता हो या न हो।
इसके अतिरिक्त सैनिक अशक्त और वृद्ध होने पर भी अपने पद पर बना रहता था। सैनिकों की भर्ती के क्षेत्र भी सीमित होते थे। इससे युवक सैनिकों का निरंतर प्रवाह अवरुद्ध हो जाता था। मुसलमानों की सेनाओं में ये तत्व नहीं थे। उन्हें मध्य एशिया के ठंडे देशों से सदैव कुशल, वीर और युवा सैनिक निरंतर प्राप्त होते रहते थे।
(5) हस्ति सेना की दुर्बलता व अश्वारोही सेना की उपेक्षा
राजपूत अपनी सेना में हाथियों को आगे रखते थे, जिससे कि वे आक्रमणकारियों को रौंद कर नष्ट कर दें, पर हस्तिसेना युद्ध में आघातों से और भीषण मार-काट से व्याकुल होकर बिगड़ जाती थी और हाथी पीछे मुड़कर शत्रुपक्ष की अपेक्षा अपनी ही सेना को रौंद डालते और उसे नष्ट-भ्रष्ट कर डालते थे।
इसके विपरीत तुर्क या अरब सेना में हाथियों का उपयोग शत्रु के दुर्ग-क्षरों को तोड़ने के लिए या शत्रु की प्रगति को अवरुद्ध करने के लिए किया जाता था।
हस्तिसेना के विपरीत मुसलमान अश्वारोही सेना का अधिक उपयोग करते थे। राजपूत पदाति सेना, शत्रुओं की अश्वारोही सेना का सामना करने में असमर्थ होती थी और राजपूतों की हस्तिसेना विपक्षी अश्वारोही सेना का दौड़ में मुकाबला नहीं कर सकती थी। इस प्रकार हस्तिसेना राजपूतों के लिए घातक ही होती थी। इस युग में सैनिक संगठन का मूल सिद्धांत था गतिशीलता। वह युग अश्वारोही सेना का युग था। आश्चर्यजनक गतिशीलता वाली सुसज्जित अश्वारोही सेना विजय के लिए समय की सबसे बड़ी माँग थी। राजपूतों ने इसकी घोर उपेक्षा की।
(6) राजपूतों की प्राचीन युद्धप्रणाली
राजपूत पुरातन युद्ध-प्रणालियों का ही उपयोग करते थे। राजपूत सेनापति सैन्य-संचालन के साथ- साथ स्वयं भी सैनिकों के समान रणक्षेत्र में युद्ध करते और अपने वीरत्व का प्रदर्शन करते थे। इसका दुष्परिणाम यह होता था कि उन्हें युद्ध में संलग्न अपनी सेना की तनिक भी खबर नहीं हो पाती थी और न वे स्वयं अपनी सुरक्षा की ही चिंता कर पाते थे। इससे कभीकभी सेनापति के घायल हो जाने पर या युद्ध में वीरगति प्राप्त होने पर, विजय करती हुई सारी राजपूत सेना ही रणक्षेत्र से भाग खड़ी होती थी।
के अभाव में पराजय की आशंका से सारी सेना हतोत्साहित हो जाती थी और युद्ध से पलायन करने लगती थी। शत्रु इसका लाभ उठाकर सरलता से विजय प्राप्त कर लेते थे।
राजपूतों के अस्त्र-शस्त्र भी प्राचीन ढंग के होते थे। वे प्रायः तलवार और भालों का ही उपयोग करते थे। इससे वे विदेशी मुस्लिम तीरंदाजों के सम्मुख ठहर नहीं पाते थे।राजपूत तीरंदाजी की युद्ध-कला से और तोपों से लड़ने की प्रथा से लगभग अनभिज्ञ थे। तलवार, ढाल और भाले का सदुपयोग तभी हो सकता था जब सैनिक आमने-सामने व्यक्तिगत युद्ध कर रहे हों, पर विदेशी मुसलमान आक्रमणकारी सैनिक टू से ही तीरों द्वारा अपने शत्रुओं को घायल कर परास्त कर देते थे।
राजपूत विदेशी तीरंदाजी के सामने ठहर न सके। विदेशी सैनिक चलते-चलते घोड़ों की काठी पर बैठकर धनुष-बाण का प्रयोग करते थे। इससे उनको राजपूतों की भारी-भरकम और मंद गति से चलने वाली सेना की तुलना में अधिक लाभ होता था।
(7) दोषपूर्ण युद्धयोजना और सैन्य-संचालन
राजपूत नरेशों में निर्दिष्ट युद्ध योजना नहीं होती थी। वे कल, कैसे और कहाँ युद्ध करेंगे, इसका कोई निर्णय नहीं होता था। इससे वे अपनी संपूर्ण सैनिक शक्ति का सदुपयोग नहीं कर सकते थे। उन युद्धों में जिनमें अनेक छोटे-छोटे राजपूत नरेश अपनी सेना सहित सम्मिलित होते थे,
निर्दिष्ट युद्ध-योजना का अभाव अत्यंत ही घातक होता था। विभिन्न राजा या सेना नायक अपनी-अपनी सेना को अलग-अलग मनमाने ढंग से व विभिन्न स्थानों से युद्ध के आदेश देते और युद्ध करते थे। सैनिकों में भी स्वामि-भक्ति विभाजित होती थी, एक सुयोग्य वीर अधिनायक के नेतृत्व में युद्ध करना वे उनके सम्मान व प्रतिष्ठा के विरुद्ध मानते थे। इससे रणक्षेत्र में अव्यवस्था उत्पन्न होती थी और विजय की अपेक्षा पराजय ही अधिक होती थी। इसके विपरीत मुसलमान योजनापूर्वक संगठित होकर युद्ध करते थे। उनकी व्यूह रचना भी श्रेष्ठ थी। यद्यपि राजपूत अपने बलवान, साहसी विरोधियों की अपेक्षा कम वीर और साहसी नहीं थे,
पर वे युद्ध - विन्यास और सैन्य संचालन में अपने विरोधियों से पीछे थे। उनके पराक्रम और शौर्य में किसी प्रकार की कमी नहीं थी, कमी थी तो उस पराक्रम और वीरत्व को लाभप्रद ढंग से उपयोग करने की। अतः राजपूत पराजित हुए।
(8) योग्य और अनुभवी सेनापतियों और अधिकारियों का अभाव
राजपूतों में उत्साह और वीरता की कमी नहीं थी, परंतु कमी थी दूदर्शी, सफल योग्य नेताओं की, जो उन्हें संकटकाल में एकता के सूत्र में बाँधकर विदेशी आक्रमणकारियों को सफलता से परास्त करवा दे। इसके विपरीत मुसलमानों में श्रेष्ठ नेतृत्व की कमी नहीं थी,
उनके सेनापति बड़े रण- कुशल और अनुभवी होते थे और अपनी सेना का संचालन बड़ी सफलता और दूदर्शिता से करते थे।
(9) राजपूतों का रक्षात्मक युद्ध
राजपूतों ने सीमांत सुरक्षा की अवहेलना की। इससे विदेशी आक्रमणकारी सरलता से पंजाब और दिल्ली तक आ गए और उन्होंने अपनी सत्ता दृढ़ता से स्थापित कर ली। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि राजपूतों को रक्षात्मक युद्ध करना पड़ा। वे कभी भी आक्रांत न हो सके। उनके समस्त युद्ध भारत में ही हुए। विजय चाहे जिस पक्ष की हो, क्षति भारतीयों की ही होती थी। उनके कृषि, व्यापार और उद्योग-धंधे अस्त-व्यस्त होते थे,
जिसका सीधा प्रभाव राजपूत अर्थव्यवस्था पर पड़ता था अतः आर्थिक हानि का विपरीत प्रभाव भी सेना व युद्ध पर पड़ता था, जिससे राजपूतों की पराजय हो जाती थी।
(10) मुसलमानों की सैन्य विशेषताएँ और सफलताएँ मुसलमान आक्रमणकारियों ने मध्य एशिया के अनेक प्रदेशों में विजय प्राप्त की थी। इससे उनका सामरिक अनुभव, उत्साह और साहस अधिक बढ़ गया था। भारत में भी निरंतर मिलने वाली विजयों से भी उनके उत्साह और शौर्य में अत्यधिक वृद्धि हुई। इसके विपरीत राजपूतों की निरंतर पराजयों से वे हतोत्साहित हो गए थे। फलतः उन पर विजय प्राप्त करना सरल था। मुसलमानों में अश्वारोही सेना की बाहुल्यता, रण-कुशलता तथा तीव्रगति से उनकी विजय सुगम हो गई। राजपूतों के सैनिकों की संख्या सीमित थी।
राजपूत सैनिकों के विनाश की पूर्ति अन्य जाति के युवकों और सैनिकों ने नहीं की। इसके विपरीत मुसलमानों को मध्य एशिया के विभिन्न प्रदेशों से निरंतर सैनिक प्राप्त होते रहते थे। इनकी सेना में भी विशेष स्फूर्ति और तीव्र गतिशीलता रहती थी। सेना भी सुसंगठित आधुनिकतम, अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित और प्रशिक्षित तथा अनुशासन बद्ध होती थी। मुसलमानों के सेनानायक भी रण-कुशल और सैन्य संचालन में अनुभवी और प्रवीण थे।
आर्थिक कारण
राजकीय वैभव और विलासिता ने तथा सतत युद्धों ने राजपूत नरेशों के कोष को रिक्त कर दिया था। मंदिरों, धार्मिक स्थानों, तीर्थों आदि में जनता ने अतुल संपत्ति संचित कर रखी थी।
विदेशी आक्रमणकारियों ने इन स्थानों पर आक्रमण कर वहाँ की अतुल संपत्ति को लूटा, नगरों को और धन- संपन्न व्यक्तियों को भी लूटा, उनकी संपत्ति भी प्राप्त कर ली और अनेक स्थानों को नष्ट कर दिया। इससे कृषि एवं उद्योग व्यवसाय अस्त-व्यस्त होते गए और देश की आर्थिक क्षीणता में वृद्धि होती गई। इससे राज्य की सैन्य शक्ति भी क्षीण होती गई एवं राजपूतों को परास्त करना सरल और सुगम हो गया।
धार्मिक कारण हो
भारत पर आक्रमण करने के हेतु मुसलमान सैनिकों और नेताओं का प्रमुख निश्चित उद्देश्य था कि भारत में जेहाद कर इस्लाम धर्म का प्रसार करना, मंदिरों और मूर्तियों को तोड़ना फोड़ना और लूटना।
उनकी दृढ धारणा थी कि जेहाद और इस्लाम धर्म के प्रसार में पुण्य प्राप्त होता है और इसमें प्राण त्यागने से जन्नत या स्वर्ग प्राप्त होता है। यदि वे भारत में जेहाद और इस्लाम के लिए युद्ध करके विजयी तो हुए उन्हें अतुल संपत्ति और राज्य प्राप्त होगा और यदि पराजित हुए या वीरगति को प्राप्त हुए तो भी उन्हें पुण्य मिलेगा और खुदा जन्नत देगा। फलतः आक्रमण करने और युद्ध में लड़ने के लिए तुर्कों का उत्साह अत्यधिक था। राजपूत सैनिकों और राजाओं में निर्दिष्ट राष्ट्रीय भावना और धार्मिक उद्देश्य के अभाव से राजपूतों में उत्साह, आत्मविश्वास, दृढ़ता और साहस का संचार नहीं हो पाया था।
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