चिश्ती सिलसिले की लोकप्रियता के कारण - Reasons for the popularity of the Chishti order
चिश्ती सिलसिले की लोकप्रियता के कारण - Reasons for the popularity of the Chishti order
सल्तनत काल के सभी सूफी संप्रदायों के उद्देश्य लगभग एक थे- आध्यात्मिक गुरु के निर्देशन में सूफी मार्ग अपनाते हुए ईश्वर से सीधा संवाद स्थापित करना। हाँ, प्रत्येक सूफी संप्रदाय ने अलग-अलग अनुष्ठान और रीति-रिवाज अपनाए और राज्य तथा समाज के प्रति उनके दृष्टिकोण में भी अंतर था। इस काल के सभी संप्रदायों में चिश्ती संप्रदाय को सर्वाधिक लोकप्रियता प्राप्त हुई और इसका प्रसार भी व्यापक क्षेत्र में हुआ। चिश्ती संप्रदाय के अनुष्ठान दृष्टिकोण और प्रथाएँ भारतीय थी और यह मूलतः एक भारतीय सिलसिला था। इसकी लोकप्रियता के कारणों का उल्लेख नीचे किया जा रहा है :-
1) चिश्ती संप्रदाय की कई प्रथाएँ भारत में स्थापित नाथपंथी योगियों जैसे- गैर-परंपरावादी संप्रदायों से काफी मिलती-जुलती थी।
ब्रह्मचारी और संन्यासी का जीवन व्यतीत करना, गुरु के समक्ष दंडवत करना
संप्रदाय में शामिल होने वाले नए शिष्य का मुंडन करना और भक्ति संगीत का आयोजन आदि कुछ ऐसी ही प्रथाएँ थी। इस दृष्टि से, चिश्तियों को भारतीय परंपरा के एक हिस्से के रूप में देखा जाने लगा।
2) चिश्तियों ने भारत में गैर-मुसलमान जनसंख्या के प्रति धार्मिक सहिष्णुता का दृष्टिकोण अपनाया और अपने को भारतीय परिवेश में ढाल लिया। भारतीय अनुयायियों तक अपनी बात पहुंचाने के लिए चिश्तियों ने भारतीय प्रतीकों,
मुहावरों, रीति-रिवाजों और अनुष्ठानों को अपना लिया। बहुत से चिश्ती संतों ने अपने मत के प्रचार-प्रसार के लिए हिंदवी भाषा का प्रयोग किया।
(3) चिश्ती खानकाह के समतावादी परिवेश ने भारतीय समाज के निचले सदस्यों को काफी संख्या में आकृष्ट किया। चिश्ती संत समाज के पिछड़े वर्ग के प्रति सहानुभूति रखते थे और इसने उनके धार्मिक दृष्टिकोण को भी प्रभावित किया। चिश्ती खानकाह ब्राह्मण सामाजिक व्यवस्था से काफी टू थे। व्यापारी,
शिल्पी, किसान और यहाँ तक कि सफाई करने वाला भी चिश्ती संप्रदाय का अनुयायी हो सकता था। उन्होंने तुर्की शासक वर्ग के प्रजातिगत विभाजन (कुलीन और अकुलीन) को भी स्वीकार नहीं किया।
(4) चिश्ती गुरुओं ने उच्च भावना से युक्त प्रेरणादायक नेतृत्व प्रदान किया। दरबार से वे छू रहे और राज्य संरक्षण को उन्होंने अस्वीकार कर दिया, उलेमा के कट्टरपंथी और बाहरी कर्मकांड संबंधी दृष्टिकोण को उन्होंने पूर्ण रूप से नकार दिया और इस्लाम की सरल मान्यताओं को सूफी शिक्षा में घोल दिया। इन्हीं सब कारणों से चिश्ती संप्रदाय लोकप्रिय हुआ।
5) आरंभिक चिश्तियों को मरणोपरांत अधिक लोकप्रियता प्राप्त हुई। बाद की शताब्दियों में उनकी दरगाहों के आस-पास संतों के संप्रदाय बनने लगे। कालांतर में, दंतकथाओं और जीवन लेखन के माध्यम से इन चिश्तियों की जादुई शक्ति की बात फैलने लगी। यह भी कहा जाने लगा कि उनकी जादुई शक्ति के कारण ही काफी लोग उनकी ओर आकर्षित हुए और उन्होंने गैर-मुसलमानों का धर्म-परिवर्तन किया। आरंभिक चिश्ती संत चमत्कारी शक्ति में विश्वास रखते थे, पर उसके उपयोग को वे अस्वीकार करते थे। सूफी मत और मान्यता में वे चमत्कार को प्रमुख तत्व नहीं मानते थे। पर आरंभिक चिश्तियों की 'लोकप्रियता बढ़ाने में चमत्कार संबंधी कहानियों ने काफी सहयोग दिया और इससे उनके दरगाहों को भी ख्याति मिली।
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