धर्म सुधार आन्दोलन के कारण - Reasons for religious reform movement

धर्म सुधार आन्दोलन के कारण - Reasons for religious reform movement


धर्म सुधार आन्दोलन एक दोहरा आन्दोलन था जिसमें धार्मिक और राजनैतिक तत्व मिले हुए थे। इसके प्रमुख कारणों की व्याख्या निम्न प्रकार से की जा सकती है -


धार्मिक कारण


रोमन कैथोलिक धर्म में अनेक आंतरिक कमियाँ थीं जिनके कारण ईसाई जनता कैथोलिक धर्म के प्रति उदास बन गई थी। मध्य युग में कैथोलिक धर्म की सबसे प्रमुख विशेषता ईसाई जगत को संगठित करके उसमें एकता की स्थापना करना थी, परन्तु नवयुग का आरम्भ होते होते पोप के जीवन में भ्रष्टता और धन के प्रति मोह उत्पन्न हो गया था जिसके कारण वह सभी प्रकार के धार्मिक कृत्यों के सम्पादन के समय 'कर' के रूप में जनता से धन प्राप्त करके उस धन राशि को अपने भ्रष्ट जीवन के लिये व्यय करने लगा।

पोप के इस • प्रकार के कामों से कैथोलिक धर्म में विविध प्रकार की दुर्बलतायें उत्पन्न हो गई और ईसाई जनता कैथोलिक धर्म को अनादर की दृष्टि से देखने और पोप के कार्यों का विरोध करने लगी। उस समय के बड़े यूरोपीय सम्राट पोप के अनुचित आदेशों से बड़े परेशान हो गये थे। अतः उन्होंने भी जनता के विरोध को सफल बनाने का प्रयास किया। धार्मिक कारणों में एक उल्लेखनीय कारण पोपशाही का विभाजन और आपसी मतभेद भी था। 14वीं शताब्दी से पूर्व पोप की गद्दी एविगनॉन (फ्रान्स) में थी और पोप पर फ्रांस का पूरा प्रभाव रहता था, परन्तु 1378 ई. में पोप की एक दूसरी गद्दी की स्थापना रोम में की गई।

इस प्रकार कैथोलिक जनता के लिये अब एक के स्थान पर दो पोपों की आज्ञा मानना आवश्यक हो गया, परन्तु दोनों पोप आपस में मिलकर रहने के बजाय एक दूसरे के आदेशों की आलोचना करने लगे जिसके कारण ईसाई जनता की दृष्टि में पोप का आदर और मान कम होने लगा। फलतः पोप जनता की श्रद्धा के भाजन नहीं रहे। 


आर्थिक कारण


इस काल में चर्च के पास करों के रूप में एकत्रित अपार धन राशि थी। इस धन को ईसाई जनता की भलाई के लिये व्यय न करके पोप अपने विलासी जीवन के लिये सुख साधन एकत्रित करने में खर्च कर डालता था।

अतः जनता की श्रद्धा और विश्वास उस पर से उठ गये। वह 'धर्म कर (दशमांश) के में जनता की आय का दशम् भाग तथा विभिन्न संस्कारों के सम्पन्न कराने में भी धन वसूल करता था। इसके अतिरिक्त पादरियों और अन्य धर्माधिकारियों की नियुक्ति भी वह उन्हीं व्यक्तियों में से करता था, जो उसे सबसे अधिक धन दे सकते थे। दोषी व्यक्तियों के अपराधों को धन के बदले क्षमा कर दिया जाता था। अतः धर्म का आधार उस काल में धन बन गया था जिसके कारण उसके विरोधियों की संख्या में वृद्धि होने लगी । पुनर्जागरण के परिणामस्वरूप नवीन उद्योग धन्धों और व्यापार व व्यवसाय के लिये भारी धनराशि की आवश्यकता पड़ने लगी। मध्य युग में इनकी अनुपस्थिति के कारण जनता का धन के प्रति मोह नहीं था, परन्तु अब उसे धन संचय की आवश्यकता पड़ने लगी थी जिसके कारण यह स्वाभाविक ही था कि जनता पोप की धन-लोलुपता का विरोध करती। 


सांस्कृतिक कारण


नवीन आविष्कारों के प्रभाव से शासकों की शक्ति में अत्यधिक वृद्धि हुई जिससे वे पोप का विरोध करने में स्वयं को शक्तिशाली अनुभव करने लगे। छापेखाने के आविष्कार से चर्च और पोप की कटु आलोचना से पूर्ण पुस्तकें भारी संख्या में प्रकाशित की जाने लगीं। इन पुस्तकों ने जनता के अन्ध-विश्वास का अन्त कर दिया। यूनानी विद्वानों ने चर्च, पोप और धर्माधिकारियों का विरोध करना आरम्भ किया। इस प्रकार नवीन संस्कृति और सभ्यता के विकास ने धर्म सुधार आन्दोलन को प्रभावपूर्ण बनाने में प्रमुख भाग लिया। मार्डन कैब्रिज हिस्ट्री ने इसका अनुमोदन निम्न शब्दों में किया है- विद्वानों के लेखों ने धर्माधिकारियों और पादरियों की मूर्खता और अज्ञानता का भण्डाफोड़ किया तथा उनकी सांसारिक भोगविलास में लिप्त रहने की प्रवृत्ति का जनता को ज्ञान कराया।

इन सबके परिणामस्वरूप कैथोलिक चर्च का जनता की दृष्टि में पहले जैसा मान-सम्मान नहीं रहा । " 


विद्वानों की कृतियाँ


रस्मस ने एक पुस्तक "मूर्खता की प्रशंसा" नाम से प्रकाशित कराई और उसने चर्च में उत्पन्न कुरीतियों की काट की। उसने यूनानी भाषा में 'न्यू टेस्टामेंट' का प्रकाशन कराया। इसी प्रकार मार्टिन लूथर ने जर्मनी में कैथोलिक धर्म का बहुत अधिक विरोध किया जो जर्मनी की रियासतों में पोप के अधिकारों के लिये बड़ा घातक सिद्ध हुआ। उसका यह विरोध पोप द्वारा जमा की गई धनराशि को अपनी सुख वृद्धि के लिये व्यय करने और धर्माधिकारियों की मनमानी पर बड़ा अनिष्टकारी प्रहार था। इसी प्रकार यूरोप के विभिन्न देशों में अनेक विद्वानों ने पोप के विरोध में अपने पत्र, लेख, और ग्रन्थ प्रकाशित कराये। फ्रांस में कोर्नील, रेबेलेस,

इंग्लैंड में बर्क, स्पेन्सर, चॉसर, जॉन विक्लिफ, स्पेन में सर्वेन्टीज, इटली में पेटार्क और बोहेमिया में जॉन हस आदि लेखकों ने अपनी भाषा में अनेक लेख और पुस्तकें लिखीं जिन्होंने जनता को धार्मिक त्रुटियों एवं दोषों, धर्माधिकारियों की मूर्खताओं व पोपशाही के अनाचारों की जानकारी कराई। 


राजनीतिक कारण


यद्यपि यह निर्विवाद रूप से सत्य है कि धर्म सुधार आन्दोलन का आरम्भ पूर्णतः एक धार्मिक आन्दोलन के रूप में हुआ था, परन्तु इस आन्दोलन का क्रमशः विस्तार होता गया और विविध दिशाओं और क्षेत्रों से इसमें सहयोग की प्राप्ति होने लगी।

राष्ट्रीयता की भावना के उत्पन्न होने से यूरोप निवासी पोप के राजनीतिक प्रभाव के भी विरोधी बन गए। पोप का राजनीतिक क्षेत्र में प्रभाव समस्त महाद्वीप पर बड़े-बड़े सम्राटों से भी अधिक था जिसका सर्वोत्तम उदाहरण हेनरी चतुर्थ है। पोप ने किसी बात पर रुष्ट होकर सम्राट हेनरी चतुर्थ की देश से निर्वासित किये जाने का दण्ड दिया। हेनरी चतुर्थ भी भीषण सर्दी के दिनों में बराबर तीन दिन और तीन रात नंगे पाँव पोप के महल के द्वार पर खड़ा रहा तब पोप ग्रेगरी सप्तम का क्रोध शांत हुआ और हेनरी चतुर्थ को क्षमा प्राप्त हुई। अतः राजा महाराजाओं ने भी पोप के विरोधियों को सहयोग और समर्थन देना आरम्भ कर दिया।


इसके अतिरिक्त पोप ने अपनी आय की वृद्धि के लिये टाइथ (दशमांश ), धर्म कर तथा इसी प्रकार के अन्य धार्मिक कर, जो पहले से ही पर्याप्त मात्रा में बढ़े हुए ईसाई जनता पर भार डाल रहे थे और बढ़ा दिये। अतः जनता में पोप के प्रति असन्तोष बढ़ने लगा और वह धर्म सुधार आन्दोलन में रुचि लेने लगी। 


तत्कालिक कारण


धर्म सुधार आन्दोलन का तत्कालीन कारण क्षमापत्रों का पोप द्वारा बेचने की व्यवस्था करना था । पोप लियो दशम की नवीन भवनों तथा थियेटर कक्ष निर्माण में विशेष रुचि थी।

अतः इन कार्यों को पूरा करने के लिये उसने क्षमापत्र बेचकर धन एकत्रित करने की विधि अपनाई। उसने अनेक व्यक्तियों को क्षमा- पत्र बेचने के लिए नियुक्त करके यूरोप के विभिन्न देशों में भेजा। इस व्यवस्था ने दूर देशों की धार्मिक जनता को उन्हीं के स्थान पर वे सुविधायें प्रदान कीं जिनके लिए भाँति-भाँति के कष्ट सहन करके पोप के दरबार में पहुँचती थी। जो व्यक्ति इस प्रकार क्षमापत्र निर्धारित व्यक्ति से खरीद लेता था उसके सभी प्रकार के अपराधों को क्षमा करके ईश्वर उसके लिए स्वर्ग का द्वार खोल देता था।

अनेक विद्वानों के विचार में पोप के इस अनुचित कार्य से यूरोप में अपराधियों की अपराध वृत्ति को प्रोत्साहन प्रदान किया जाने लगा। जर्मनी में मार्टिन लूथर ने पोप के इस कार्य का डटकर विरोध किया। उसी का अनुकरण करके अन्य देशों में भी अनेक विद्वान् और धर्म-सुधारक पोप का विरोध करने लगे। इतिहासकार शेविल के शब्दों में "क्षमा पत्रों की बिक्री ही चर्च के विरोध का तत्कालीन कारण थी। मार्टिन लूथर ने अपने प्रसिद्ध 95 धार्मिक सिद्धान्तों की सूची तैयार की जिसमें क्षमा पत्रों की बिक्री का विरोध भी सम्मिलित था। इस प्रकार पोपशाही के विरुद्ध धर्म सुधार आन्दोलन आरम्भ हुआ।”