भक्ति आंदोलन के उदय के कारण - Reasons for the rise of the Bhakti movement
भक्ति आंदोलन के उदय के कारण - Reasons for the rise of the Bhakti movement
1. भक्ति आंदोलन के उदय का कारण ब्राह्मणवाद का जटिल होना
भक्ति आंदोलन के उदय के कारणों पर प्रकाश डालते हुए विद्वान डॉ. यूसुफ हुसैन लिखते हैं, "ब्राह्मणवाद मूलरूप से एक बौद्धिक सिद्धांत बनकर रह गया था। यह हृदय में अधिकारों की अपेक्षा करता था। मौलिक सिद्धांत, जिनकी वह 'वाद' शिक्षा देता था, अवैयक्तिक और काल्पनिक थे। ये उन लोगों की समझ में नहीं आते थे, जो सदैव एक नैतिक और भावयुक्त सिद्धांत एवं धर्म की खोज में थे जिसके द्वारा हृदय की संतुष्टि और नैतिक शिक्षण संभव हो। इन्हीं परिस्थितियों में भक्तिप्रेम मिश्रित ईश्वर भजन के आंदोलन ने एक अनुकूल वातावरण पाया।"
2. मंदिर और मूर्तियों का विनाश
मध्यकाल में मुसलमान आक्रमणकारियों ने हिंदुओं के मंदिरों और मूर्तियों का विनाश कर दिया था। ऐसी दशा में वे स्वतंत्रतापूर्वक मंदिरों में जाकर मूर्ति पूजा नहीं कर सकते थे। अतः वे भक्ति और उपासना के माध्यम से ही मोक्ष प्राप्त करने का प्रयास करने लगे।
3. जाति-व्यवस्था का जटिल होना
मध्यकाल में जाति व्यवस्था का स्वरूप जटिल हो चुका था। उच्च जातियाँ अपने को श्रेष्ठ समझकर निम्न जातियों पर अत्याचार करती थीं।
अतः निम्न जातियों में असंतोष था। भक्ति मार्ग ने सबके लिए मार्ग खोल दिया। इस आंदोलन के संचालक ऊँच-नीच की भावना के विरुद्ध थे। इस प्रकार भक्ति मार्ग ने अछूतों और निम्न वर्ग के व्यक्तियों के लिए भी मार्ग खोला।
4. मुसलमानों के अत्याचार
डॉ. ईश्वरीप्रसाद के शब्दों में, “भक्ति काल के उदय होने का दूसरा कारण यह बताया जाता है कि जब मुसलमान हिंदुओं पर अत्याचार करने लगे तो हिंदू निराश होकर उस दीनरक्षक भगवान से प्रार्थना करने लगे।”
मध्यकाल में छोटे से लेकर बड़े तक सभी मुस्लिम अधिकारी हिंदुओं पर अत्याचार करते थे। इस अत्याचार से पीड़ित हिंदू भगवान की भक्ति में लीन हो गए।
5. ईसाई धर्म का प्रभाव
कुछ विदेशी विद्वानों के अनुसार भक्ति आंदोलन के उदय का कारण ईसाई धर्म का प्रभाव है। वेबर के अनुसार “भक्ति आध्यात्मिक चरम मोक्ष के साधन और उसके लिए एक शर्त के रूप में एक विदेशी विचार था, जो भारत में ईसाई धर्म के साथ आया और जिसने पुराणों और महाकाव्ययुगीन हिंदू धर्म पर एक गहरा प्रभाव डाला।"
परंतु डॉ यूसुफ हुसैन वेबर के इस कथन का खंडन करते हैं उनके अनुसार, दक्षिण में कुछ ईसाई अवश्य वास करते थे, परंतु वे इतने प्रभावशाली नहीं थे कि उनका प्रभाव हिंदू धर्म पर पड़ता। बर्थ और सीनर्ट भी वेबर के मत का खंडन करते हैं।
6. पलायनवाद की भावना
हिंदुओं की प्रगति के मार्ग मुस्लिम शासन में अवरूद्ध हो गए थे अतः वे ईश्वर में लीन होने का प्रयास करने लगे जैसा कि डॉ. विद्याधर महाजन लिखते हैं, “भक्ति आंदोलन ने उस भावना का प्रतिनिधित्व किया, जिसे पलायनवाद का नाम दिया जा सकता है,
इस समय में बहुत से हिंदुओं ने सांसारिक जीवन में उन्नति करने के लिए कोई मार्ग न पाया और इसमें कोई आश्चर्य नहीं, कि उन्होंने स्वयं भक्ति में अपना विश्वास रखकर अपने को भूल जाना चाहा।"
7. इस्लाम का प्रभाव
कुछ विद्वान ऐसे भी हैं जिनके अनुसार भक्ति मार्ग का उदय इस्लाम के संपर्क में आने के कारण हुआ। डॉ. ताराचंद्र डॉ. कुरैशी तथा खलीक अहमद निजामी इस मत के प्रमुख समर्थकों में से हैं। इनके अनुसार, इस्लाम जाति-पाँति का विरोध करता है, जो भक्ति आंदोलन का प्रमुख सिद्धांत था। इस्लाम के नेता भी एकेश्वरवाद में विश्वास करते थे तथा मूर्ति पूजा को महत्व नहीं देते थे। भक्ति आंदोलन की सादगी भी इस्लाम से प्रभावित है; परंतु यह मत भ्रमपूर्ण है, क्योंकि भक्ति भावना के बीज हमारे देश की संस्कृति में बहुत पहले ही पड़ चुके थे।
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