धर्म सुधार आन्दोलन - religious reform movement
धर्म सुधार आन्दोलन - religious reform movement
अभिप्राय
यूरोपीय जनता के धार्मिक विचारों में उत्पन्न क्रान्ति का परिणाम धर्म सुधार आन्दोलन के नाम से प्रसिद्ध है। इसे धार्मिक विरोध के नाम से भी पुकारा जाता है। यह आन्दोलन कैथोलिक धर्म की कुरीतियों, चर्च के आडम्बरों, पोप के रूढ़िवादी धार्मिक नियमों और पादरियों तथा अन्य धर्माधिकारियों के भ्रष्ट और पतित जीवन के विरोध में चलाया गया था। इसीलिए इसे 'धर्म सुधार आन्दोलन' और इसके समर्थकों को प्रोटेस्टेंट कहते हैं। इस आन्दोलन का अन्तिम लक्ष्य पोप के प्रभाव का अन्त करना और राजनीतिक क्षेत्र में राष्ट्रीय चर्च की स्थापना करना था।
इतिहासकारों के मत
प्रसिद्ध इतिहासकार ग्राण्ट ने धर्म सुधार आन्दोलन की व्याख्या करते हुए लिखा है. "इस आन्दोलन के परिणामस्वरूप जनता के धार्मिक जीवन का पुनर्जन्म हुआ और पोप के अधिकारों का विरोध करने के कारण इसे राजनीतिक रूप की प्राप्ति भी हुई"
प्रसिद्ध इतिहासकार फिशर ने इस आन्दोलन के विषय में अपने विचार व्यक्त किये है- “धर्म सुधार आन्दोलन साधारण रूप से उस आन्दोलन को कहा जाता है जिसका प्रारम्भ 16वीं शताब्दी में हुआ था और जिसके कारण यूरोप के अनेक राष्ट्र रोम के चर्च से पृथक हो गये थे।"
इतिहासकार शेविल के शब्दों में "यह एक दोहरा आन्दोलन था जिसका उद्देश्य चर्च के जीवन को पवित्र और सरल बनाना तथा पोप के प्रभाव को चर्च के ऊपर से कम करना था।"
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