यूरोप में पुनर्जागरण - renaissance in europe

यूरोप में पुनर्जागरण - renaissance in europe


यूरोप में पुनर्जागरण इटली से प्रारम्भ हुआ जो कि एक धनी देश था। तत्पश्चात् इसकी लहर यूरोप में तीव्र गति से फैली। इटली तथा इंग्लैण्ड में इसका विशेष रूप से प्रभाव पड़ा। 


इटली में पुनर्जागरण


क्रूर तुर्कों द्वारा कुस्तुन्तुनियाँ पर अधिकार करने तथा यूनानियों पर अमानुषिक अत्याचार के परिणामस्वरूप कुस्तुन्तुनियाँ से बहुत से व्यक्ति भागने पर विवश हुए। ये लोग भाग कर इटली में बसने लगे, जहाँ उनका सम्मान किया गया, क्योंकि कुस्तुन्तुनियाँ यूनानियों का शिक्षा का केन्द्र तथा वहाँ का साहित्य,

कला, ज्योतिष, विद्या एवं आध्यात्मिक ज्ञान यूरोप में सम्मान की दृष्टि से देखे जाते थे। इटली यूरोप का एक धनी देश था। अतः यूनानियों को वहाँ बसने तथा अपने विचारों का प्रचार करने में सहायता मिली। लैटिन तथा यूनानी भाषा के अनेक विद्यालय खोले गये तथा यूनानियों की अनेक पुस्तकों का अनुवाद लैटिन भाषा में किया गया।


दान्ते (1265-1321 ई.), इटली का एक प्रसिद्ध कवि था जिसकी यूनानी एवं लैटिन साहित्य में विशेष रुचि थी। अपनी विश्व-प्रसिद्ध कविता 'डिवाइन कामेडी' में उसने यूनानी साहित्य के प्रति श्रद्धा व्यक्त की है।


पेट्रार्क (1304-1374 ई.) इटली का एक प्रसिद्ध विद्वान था। उसने सम्पूर्ण इटली, फ्रांस तथा अनेक देशों की यात्राएँ कर यूनानी तथा लैटिन पुस्तकों की हस्तलिपियाँ एकत्रित की और उनकी अनेक प्रतियाँ तैयार करवायीं।


बोकैशियो (1313-1375 ई.), ये पेट्रार्क का शिष्य था। इसने यूनानी भाषा की प्रमुख पुस्तकें इलियड तथा औडेसी को खोजकर उनका अनुवाद किया। इसके अतिरिक्त उसने डीकैमेरन नामक पुस्तक की रचना की जिससे चॉसर भी अत्यधिक प्रभावित हुआ था और उसकी विचारधारा इसी पुस्तक पर आधारित थी।


इन विद्वानों के कार्यों ने इटली में जनता को आकर्षित किया था। इसी समय यूनानी विद्वानों के इटली में आकर बसने से भी यूनानी तथा लैटिन साहित्य की प्रगति में तीव्रता आ गयी। इस प्रकार इटली यूरोप में शिक्षा का केन्द्र बन गया।


इटली में दो राज्यों में विशेष रूप से उन्नति हुई थी। ये राज्य थे फ्लोरेंस तथा रोम। कुस्तुन्तुनियाँ से भागे हुए यूनानियों ने फ्लोरेंस में बड़ी संख्या में बसना प्रारम्भ किया था।

यूनानियों के प्रयत्न से वहाँ विद्यालयों की स्थापना की गयी। क्रिसोलोर्स ने फ्लोरेंस विश्वविद्यालय में यूनानी साहित्य पर व्याख्यान देने प्रारम्भ किये तथा अन्य विश्वविद्यालयों में भी यूनानी भाषा की शिक्षा दी। क्रिसोलोर्स ने यूनानी भाषा का व्याकरण तैयार किया जिससे यूनानी भाषा का अध्ययन सुगम हो गया। मेडिसी वंश के शासकों ने यूनानी भाषा की उन्नति के लिए प्रयत्न किए तथा फ्लोरेंस में एक पुस्तकालय की स्थापना करवायी । लोरेन्जो-डी-मेडिसी ने कई यूनानी विद्वानों को आश्रय दिया तथा दो सौ से अधिक पुस्तकें मेडिसी पुस्तकालय में एकत्रित कीं। लिओनार्दो अत्यन्त विद्या-प्रेमी था। वह प्रतिवर्ष साठ हजार पौंड पुस्तकों पर व्यय करता था। इस प्रकार उसके प्रयत्नों से फ्लोरेंस शिक्षा का एक महान् केन्द्र बन गया।


फ्लोरेंस के अतिरिक्त रोम भी इस समय शिक्षा का एक प्रमुख केन्द्र बन गया था। फ्लोरेंस के समान रोम में भी अनेक यूनानी विद्वानों ने आकर शरण ली थी। रोम में इन विद्वानों को पोप निकोलस पंचम ने संरक्षण प्रदान किया। फ्लोरेंस के समान रोम में भी एक पुस्तकालय की स्थापना की गयी जिसका श्रेय तत्कालीन पोप को है। इस पुस्तकालय का नाम वेटिकन रखा गया। लिओ दसवाँ भी विद्या- प्रेमी था। उसने रोम के विश्वविद्यालय में सौ अध्यापकों की नियुक्ति की। वह रोम को विश्व की राजधानी मानता था, क्योंकि उसका विचार था कि साहित्यिक क्षेत्र में विश्व का कोई भी नगर रोम की बराबरी नहीं कर सकता है। इटली तथा यूनानी विद्वानों की विद्वत्ता उनको राजकीय एवं पोप से संरक्षण एवं उनके प्रयत्नों के परिणामस्वरूप पुनर्जागरण की लहर तीव्र गति से फैली। इसी कारण इटली में प्रचलित था कि 'यूनान का पतन नहीं हुआ वरन् उसका इटली में देशान्तरण हो गया है।'