इस्लाम तथा खिलाफत का उदय - Rise of Islam and the Khilafat
इस्लाम तथा खिलाफत का उदय - Rise of Islam and the Khilafat
इस्लाम का उदय
इस्लाम धर्म का प्रादुर्भाव अरब देश में हुआ। अरब देश के उत्थान में इस्लाम धर्म का विशेष हाथ रहा, जिसके प्रवर्तक हजरत मुहम्मद साहब थे। उनकी शिक्षाओं एवं उपदेशों से उनके अनुयायियों में एकीकरण का प्रादुर्भाव हुआ।
मुहम्मद साहब का प्रारंभिक जीवन
हजरत मुहम्मद साहब का जन्म अरब देश के पवित्र स्थान मक्का में 570 ई. में हुआ। इनके पिता का नाम अब्दुल्ला और माता का नाम जुहरा था। इनके जन्म लेने के पूर्व ही इनके पिता का देहांत हो गया था, जिससे इनके लालन-पालन का समस्त भार इनकी माता पर आ पड़ा,
किंतु मुहम्मद साहब के दुर्भाग्य से छह वर्ष की आयु में उनकी माता का भी देहांत हो गया। इसके बाद मुहम्मद ने अपने पितामह अब्दुल मुतालिक के संरक्षण में अपना जीवन व्यतीत करना आरंभ किया। दुर्भाग्य से वे इस सुख को भी केवल पाँच वर्ष तक ही भोग सके। जब उनकी आयु केवल 13 वर्ष की थी तो उनके पितामह भी इस संसार से चल बसे। बालक मुहम्मद के पालन-पोषण का भार उनके चाचा अबूतालिब को सम्भालना पड़ा। वह व्यापारी थे। उन्होंने मुहम्मद साहब को अपने व्यापार में लगा लिया। इससे मुहम्मद साहब को विभिन्न प्रदेशों का भ्रमण करना पड़ा। पर्याप्त समय तक मुहम्मद साहब इसी प्रकार अपना समय व्यतीत करते रहे।।
जिस समय उनकी आयु 25 वर्ष की हुई तो उन्होंने खदिचा नामक एक विधवा स्त्री के व्यापार को सम्भाला। इस समय खदिचा की आयु 40 वर्ष की थी। कुछ समय उपरांत दोनो में प्रेम हो गया और मुहम्मद साहब ने खदिचा से विवाह कर लिया। कुछ समय उपरांत उन्होंने घोषणा की कि उनको फरिश्ता बियल के दर्शन हुए हैं, जिसने उनको ईश्वर का आदेश सुनाया है।
मुहम्मद साहब का मदीना को प्रस्थान
ईश्वरीय ज्ञान प्राप्त करने के उपरांत मुहम्मद साहब ने अन्य व्यक्तियों को उपदेश देना आरंभ किया। सर्वप्रथम उन्होंने अपनी पत्नी खदिचा को उपदेश दिया और वह उनकी शिष्या बन गई।
कुछ दिन बाद कुरेश कबीले के एक दल ने मुहम्मद साहब का घोर विरोध किया। उन्होंने मुहम्मद साहब की हत्या करने का प्रयास किया। किंतु विरोधियों का षड़यंत्र पूरा होने के पूर्व ही मुहम्मद साहब 622 ई. में मक्का से मदीना चले गए। इसी समय से मुसलमानों में हिजरी संवत् का आरंभ माना जाता है।
मुहम्मद साहब का मक्का पर अधिकार
कालांतर में मदीना की जनता ने उनका हार्दिक स्वागत किया और उनके उपदेशों तथा शिक्षाओं को बड़े चाव से सुना । मदीना की अधिकांश जनता ने इस्लाम धर्म ग्रहण किया।
कुछ समय उपरांत उन्होंने मदीना के समस्त कबीलों को संगठित किया और एक विशाल सेना तैयार करके 630 ई. में मक्का पर आक्रमण किया। युद्ध में मुहम्मद साहब विजयी हुए, किंतु कुछ समय उपरांत मुहम्मद साहब को उहूर नामक स्थान पर पराजित होना पड़ा। अंत में मक्का पर उनका अधिकार हो गया। वहाँ के निवासियों ने उनको ईश्वर का पैगंबर स्वीकार किया। इससे मुहम्मद साहब के मान तथा प्रतिष्ठा में बड़ी वृद्धि हुई। अब उनका अरब के तीर्थ स्थानों पर अधिकार हो गया था। इसके बाद मुहम्मद साहब ने अपने शिष्यों को विदेशो में धर्म प्रचार के लिए भेजना आरंभ किया। विदेशों में भी दिन-प्रतिदिन उनके शिष्यों की संख्या में वृद्धि होने लगी। उन्होंने विभिन्न स्थानों पर इस्लाम धर्म का प्रचार किया।
खिलाफत का उत्थान
हजरत मुहम्मद की मृत्यु के पश्चात् मुसलमानों में उनके उत्तराधिकार के प्रश्न पर मदभेद हो गया। मुहम्मद साहब किसी को भी अपना उत्तराधिकारी घोषित नहीं कर गए थे। मुसलमानों का एक दल मुहम्मद साहब के ससुर अबूबकर को तथा दूसरा दल उनके दामाद अली को उत्तराधिकारी बनाने का पक्षपाती था। अंत में अबूबकर ही उनके उत्तराधिकारी घोषित किए गए। उन्होंने अन्य देशों में इस्लाम धर्म का प्रचार करना आरंभ किया। उनका जीवन सादा तथा साहित्यिक था। उनके प्रयत्नों से इस्लाम धर्म का प्रचार-प्रसार दूर-दूर तक हुआ। 634 ई. में उनकी मृत्यु हो गई। उनके मृत्यु के उपरांत मुसलमानों ने उमर को अपना खलीफा नियुक्त किया।
अबूबकर के समान ही उमर ने भी विदेशों में इस्लाम धर्म का प्रचार आरंभ किया। वे दस वर्ष तक इसी महत्वपूर्ण पद पर कार्य करते रहे। 644 ई. में जब वे मस्जिद में नमाज पढ़ रहे थे तो किसी व्यक्ति ने उन पर आक्रमण किया। वे घायल हो गए और कुछ समय बाद उनकी मृत्यु हो गई। वे बड़े धर्मपरायण तथा योग्य व्यक्ति थे। उन्होंने इस्लाम की उत्तम व्यवस्था की और ऐसी संस्थाओं का निर्माण किया, जो इस्लामी जगत में स्वीकृत हुई। उमर की मृत्यु के उपरांत उस्मान खलीफा पद के लिए निर्वाचित हुए।
उस्मान में अपने पूर्वजों के समान योग्यता नहीं थी ।
वह सांसारिक बंधनों में जकड़ा हुआ था। उसमें स्वार्थपरता की भावना विशेष रूप से विद्यमान थी। अतः मुसलमानों में उनके प्रति घृणा की भावना जाग्रत होने लगी| उस्मान का वध कर दिया गया। अली खलीफा घोषित किए गए. किंतु परिस्थिति में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। मुसलमानों में पुनः गृहयुद्ध की अग्नि प्रज्वलित हो गई। अली का वध कर दिया गया। उसके बाद अली के पुत्र हसन को मुसलमानों ने खलीफा पद पर आसीन किया। किंतु उसमें भी इतने उच्च तथा उत्तरदायी पद का भार संभालने की योग्यता नहीं थी। उसने अपने पद से त्याग पत्र दे दिया। हसन के त्याग पत्र देने पर मुसलमानों ने मुआविया को खलीफा पद के लिए निर्वाचित किया।
मुआविया सीरिया का गवर्नर था। उमर का वंशज होने के कारण अली के बाद के खलीफा उम्मैद के नाम से विख्यात हुए। उसने दमिश्क को अपनी राजधानी घोषित की। अब वहाँ से समस्त इस्लामी जगत पर शासन किया जाने लगा। उसके समय में खलीफा का पद पैतृक हो गया और निर्वाचन की प्रथा का अंत हो गया। उसके शासनकाल में साम्राज्यवादी नीति का अनुसरण किया गया। अब विदेशों की विजय साम्राज्य विस्तार के अभिप्राय से की जाने लगी, जिसमें मुसलमानी साम्राज्य का विस्तार होने लगा। यूरोप में स्पेन से लेकर भारत में सिंधु नदी तक के समस्त प्रदेशों पर उनका अधिकार हो गया। उम्मैद ने यद्यपि एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की,
किंतु उनको स्थाई बनाने में उसकी रुचि नहीं थी। इसका परिणाम राज्य के लिए बहुत हानिकारक सिद्ध हुआ। अन्य देशों के निवासियों में खलीफा के प्रति घृणा के भाव उत्पन्न होने लगे, अब्दुल अब्बास नामक व्यक्ति के नेतृत्व में उम्मैद वंश के अंतिम खलीफा के शासनकाल में क्रांति हुई, जिससे खलीफा के पद पर अब्दुल अब्बास का अधिकार हो गया। इससे एक नए वंश का उदय हुआ, जो अब्बासीद वंश के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इस वंश के खलिफाओं ने 749 ई. से 1256 ई. तक शासन किया। इन्होंने अपनी राजधानी बगदाद घोषित की और वहीं से शासन कार्य आरंभ किया। ये लोग शिया धर्म के अनुयायी थे। इनकी अरब निवासियों तथा उनके देश के प्रति कोई विशेष श्रद्धा नहीं थी।
इस कारण इन्होंने अरब वासियों तथा अन्य देशों के निवासियों में किसी भी प्रकार का भेदभाव न रखते हुए उनके विशेष अधिकारों का अंत कर दिया। अतः शासन पर से अरब वासियों का अधिकार उठने लगा और ईरानियों का अधिकार होने लगा। इसका परिणाम यह हुआ कि कट्टरता के स्थान पर उनमें धार्मिक सहिष्णुता की भावना उत्पन्न हुई और जनता के साथ सद्व्यवहार होने लगा। इस वंश में कई प्रतिभाशाली खलीफाओं ने जन्म लिया, जिनका नाम आज भी बड़े आदर की दृष्टि से लिया जाता है। इनमें खलीफा हारुन अल रशीद (Harun Al Rasheed) बड़े न्यायप्रिय एवं कर्तव्यपरायण थे। उनको साहित्य एवं कला से विशेष प्रेम था।
तुर्कों के इस्लाम धर्म स्वीकार करने पर उनका शासन पर भी अधिकार होने लगा। वे कुछ ही समय में इतने शक्तिशाली हो गए कि उसके हाथ में शासन की बागडोर आ गई। खलीफाओं का शासन क्षेत्र सीमित होने लगा। उन्होंने विभिन्न राज्यों की स्थापना की। खलिफाओं के हाथ में अभी तक धार्मिक शक्ति थी। उनको परिस्थितियों के कारण इसी शक्ति पर भरोसा करना पड़ा। इसी समय मध्य एशिया में भीषण रूप से उथल-पुथल मचने लगी। मंगोल जाति की साम्राज्यवादी नीति ने खलीफाओं की शक्ति का अंत कर दिया। 1256 ई. में प्रसिद्ध वीर चंगेज खाँ के पौत्र हलाकु ने अब्बासीद वंश के अंतिम खलीफा को परास्त कर बगदाद पर अधिकार कर लिया। इस प्रकार खलीफा के पद का अंत हो गया। अंतिम खलीफा मुस्तसीम के उत्तराधिकारी मंगोलों से अपनी जान बचाकर मिस्र चले गए,
जहाँ के सुल्तान ने उनको आश्रय दिया। यहीं से खलीफा अपने धार्मिक अधिकारों का उपभोग करते रहे, किंतु राजनीतिक सत्ता उनके पास नहीं रही। मुसलमान उनकी धार्मिक सत्ता को स्वीकार करते रहे, जो बाद में केवल नाम मात्र की ही रह गई और उसका महत्व समाप्त हो गया।
भारत में इस्लाम
प्राचीन काल से भारत और अरब के व्यापारिक संबंध अच्छे थे। अरबों ने पश्चिमी समुद्रतट पर अपनी बस्तियों का निर्माण किया। जब सातवीं शताब्दी में इस्लाम धर्म का प्रचार एशिया के अन्य देशों में किया जा रहा था तो उनका ध्यान भारत में भी इस्लाम के प्रचार की ओर गया। भारत में इस्लाम का प्रचार नानुसार प्रारंभ हुआ।
(1) व्यापारियों द्वारा प्रारंभ में अरब व्यापारियों ने समुद्र तट पर इस्लाम धर्म का प्रचार किया। उनको कुछ सफलता भी प्राप्त हुई। इस कार्य में उनको हिंदू राजाओं से भी सहायता प्राप्त हुई। (2) धर्म प्रचारकों द्वारा कुछ मुस्लिम धर्म प्रचारक भी भारत आए और उन्होंने धर्म प्रचार का कार्य बड़ी लगन एवं तत्परता से किया।
(3) नए मुसलमानों द्वारा नए मुसलमानों ने धर्म का प्रचार बड़े उग्र रूप से किया। जहाँ-जहाँ उनकी - बस्तियाँ थी वहाँ उन्होंने मस्जिदों का निर्माण किया तथा हज करने मक्का और मदीना जाने लगे तथा खलीफा को प्रतिवर्ष जकात भेजने लगे।
अरबों का भारत पर आक्रमण : मुहम्मद बिन कासिम
भारत की स्थिति
मुहम्मद बिन कासिम के आक्रमण के समय भारत में विकेंद्रीकरण की भावना बलवती थी। सिंध एक स्वतंत्र प्रदेश था, जिसकी स्थापना चंच ने की थी। उस समय सिंध प्रदेश का राजा दाहिर शासन कर रहा था। सिंध प्रदेश चार प्रांतों में विभक्त था। प्रांतीय शासकों को पर्याप्त अधिकार प्राप्त थे। राजा दाहिर में इतनी शक्ति तथा सामर्थ्य नहीं थी कि वह शक्तिशाली मुसलमानी सेना का सामना करने में सफल होता। उस समय सिंध की जनसंख्या केवल कुछ लाख ही थी। राजा दाहिर को जनता का भी सहयोग तथा समर्थन प्राप्त नहीं था। समस्त जनता विभिन्न भागों में विभक्त थी और उसमें एकता का अभाव था।
अरबवासियों ने भारत में पश्चिमी समुद्र तट पर आक्रमण करने तथा उसको लूटने के लिए एक सेना 626-637 ई. में भेजी।
किंतु इसको अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। अतः खलीफा उमर के शासन काल में भारत पर आक्रमण करने का विचार स्थगित कर दिया गया। 642-644 में उम्मैद खलीफाओं ने भारत पर आक्रमण किया। किंतु उन्हें सफलता प्राप्त नहीं हुई।
मुहम्मद बिन कासिम का आक्रमण आक्रमण के कारण
अरबवासी भारत में इस्लाम धर्म का प्रचार करने तथा भारत विजय के लिए बड़े लालायित थे। वे भारत पर आक्रमण करने के अवसर की खोज में थे। उनके सौभाग्य से उन्हें शीघ्र ही एक स्वर्ण अवसर प्राप्त हो गया, जो इस आक्रमण का कारण बना। इस आक्रमण का कारण यह था कि सिंध के समुद्री डाकुओं ने देवल के किनारे भट्टा नामक स्थान के पास अरबी जहाजों को लूट लिया था।
(1) डॉ. ईश्वरी प्रसाद का कथन है कि लंका के राजा ने खलीफा को इन जहाजों में बहुत-सा धन भेजा था जिसे सिंध के समुद्री डाकुओं ने लूट लिया था।
(2) खलीफा ने दासियों तथा कुछ अन्य वस्तुओं के क्रय करने के उद्देश्य से अपने कुछ सेवकों को भारत भेजा था। जब ये जहाज जा रहे थे तो उनको डाकूओं ने लूट लिया। जब यह समाचार हज्जाज ने सुना तो उसने तुरंत काठियावाड़ के हिंदू राजा दाहिर से उन कन्याओं को माँगा तथा क्षतिपूर्ति करने को कहा। किंतु राजा दाहिर उसकी माँग पूरी नहीं कर सका। अतः उसने भारत पर आक्रमण करने की योजना बनाई।
भारत आक्रमण हेतु सेना का प्रस्थान एवं विजय
आरंभ में दो सेना अबेदुल्ला तथा बदल के नेतृत्व में भारत भेजी गई किंतु उनको सफलता प्राप्त नहीं हुई। अंत में खलीफा ने अपने भतीजे मुहम्मद बिन कासिम को एक विशाल सेना सौंप कर सिंध विजय का आदेश दिया। मुहम्मद बिन कासिम की अवस्था केवल 17 वर्ष की थी, किंतु वह बड़ा वीर तथा साहसी व्यक्ति था। एक ज्योतिषी ने मुहम्मद बिन कासिम को ही इस कार्य के लिए सबसे अधिक भाग्यशाली घोषित किया था।
(1) देवल पर अधिकार
हज्जाज की आज्ञानुसार एक विशाल सेना एकत्रित की गई, जिसमें लगभग 15000 सैनिक थे। इस सेना में बैक्टीरिया के ऊँट, कुशल ऊँट सवार तथा चुने गए ईराकी घुड़सवार थे।
इसमें 20 हजार ऊँटों पर युद्ध सामग्री थी। मुहम्मद बिन कासिम ने शिराज तथा मकरान के मार्ग से भारत की ओर प्रस्थान किया। खलीफा ने भी उसके लिए आवश्यक सामग्री का प्रबंध किया। मार्ग में भी उसे कुछ अरबी सेना मिली। 711 ई. में यह देवल बंदरगाह पर पहुँचा। देवल में एक बड़ा प्रसिद्ध मंदिर था जिस पर लाल ध्वजा लहरा रही थी। मुसलमानों ने ध्वजा काट डाली, जिससे वहाँ के निवासियों के हृदय में भय उत्पन्न हो गया। थोड़े से युद्ध के बाद देवल पर मुसलमानों का अधिकार हो गया। राजा दाहिर ने देवल की रक्षा का कोई प्रबंध नहीं किया,
किंतु फिर भी जो सैनिक देवल में थे उन्होंने बड़ी वीरता तथा साहस से मुसलमानी सेना का सामना किया। इसके उपरांत मुसलमानों ने नगरवासियों से इस्लाम धर्म की दीक्षा लेने को कहा, किंतु उन्होंने उनकी आज्ञा का पालन नहीं किया। अतः कासिम ने 17 वर्ष की आयु वाले सभी व्यक्तियों की हत्या करने का आदेश अपनी सेना को दिया। उसकी आज्ञा का तुरंत पालन किया गया। तीन दिन तक रक्तपात होता रहा। खियों और बच्चों को दास बनाया गया। कासिम ने वहाँ एक मस्जिद का निर्माण करवाया तथा एक सैनिक छावनी बनवाई और चार हजार मुसलमानों को वहाँ रहने की आज्ञा दी। कासिम ने लूट का 1/5 भाग तथा 75 हजार स्त्रियाँ इराक के गवर्नर हज्जाज के पास भेज दी और शेष धन सैनिको में बाँट दिया।
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