रोमा या जिप्सी डायस्पोरा - Roma or Gypsy Diaspora
रोमा या जिप्सी डायस्पोरा - Roma or Gypsy Diaspora
वर्तमान में रोमा या जिप्सी डायस्पोरा (करीब 10 मिलियन) एशिया, यूरोप तथा अमेरिका में हैं। इनके उत्पन्न होने से संबंधित सिद्धांत विवादित है। विद्वानों के बहुमत का कहना है कि ये भारत के उत्त पश्चिम के मार्ग से अफ़गानिस्तान, पर्सिया और तुर्की होते हुए लगभग एक हजार वर्ष पहले व्यापारियों के एक समूह के रूप में यूरोप प्रवासित हुए। ये रोमानी समुदाय जहाँ भी गए वहाँ आज भी अपनी प्राचीन बोली, कला, संस्कृति तथा जिस जगह गए वहाँ की भाषा-बोली के मिश्रित रूप को बोलते हैं। जिप्सी समुदाय में भारतीय समाज के समान ही जाति प्रथा, रीति-रिवाज, संस्कृति, भाषा के स्वरूप पाए जाते हैं। ये प्राचीन भारत की प्रथाओं का अनुकरण करते हैं।
इस्लाम के आगमन के बाद
मध्य एवं पश्चिम एशिया के मुस्लिम भारत पर आक्रमण कर धन तथा जन (कलाकार, इंजीनियर, गणितज्ञ, वैज्ञानिक, साहित्यकार) को ले गए। अपने देश राज्य के नव निर्माण के लिए। तुर्क शासकों के आगमन ने अंतर्देशीय एवं विदेश व्यापार दोनों की उन्नति में योगदान दिया। सल्तनत कालीन शासकों में मुहम्मद बिन तुगलक ने व्यापार की उन्नति में विशेष अभिरुचि ली और विभिन्न शासकों के साथ राजदूतों का आदान-प्रदान किया, ताकि विदेश व्यापार की प्रोन्नति में सुविधा हो। तुगलक काल तक दक्षिण में लाहौर से काबुल,
मुल्तान से कंधार और खुरासान एवं मध्य एशिया के अतिरिक्त, पश्चिम एशिया के नगरों के साथ स्थल मार्ग से व्यापार होता था। मंगोल आक्रमण के कारण इसमें अवरोध प्रस्तुत हुआ, परंतु इसी बीच गुजरात की विजय ने समुद्र मार्ग द्वारा विदेश व्यापार की संभावनाओं को और विकसित कर दिया। सिंध पर अरब आक्रमण के दिनों से ही देवल (आधुनिक कराची, पाकिस्तान के समीप बम्भोर) एक महत्त्वपूर्ण बंदरगाह के रूप में रहा था।
इसके अतिरिक्त भारतीय व्यापारियों का संपर्क दक्षिण सिंध में लहरी बंदर तथा गुजरात में कैम्बे और सूरत प्रमुख बंदरगाह से था। यहाँ से जहाज़ लाल सागर के क्षेत्र,
होरमुज, पूर्वी अफ्रीका और दक्षिण में मालाबार तट तक जाते थे। मालाबार के तट पर स्थित कालीकट और कुइलों की बंदरगाह सल्तनत के साथ व्यापार के अतिरिक्त मसालों के द्वीप और चीन एवं ईरान और अरब क्षेत्रों के व्यापार के दृष्टिकोण से भी महत्त्वपूर्ण थी। समुद्र मार्ग से होने वाले व्यापार के संबंध में इब्न बतूता और पुर्तगाली यात्री बर्बोसा ने वर्णन किया है। आमतौर पर भारत से निर्यात होने वाली सामग्री में खाद्यान, कपड़े, बहुमूल्य रत्न, नील, मसाले, जड़ी-बूटियाँ, संदल की लकड़ी और लोहा उल्लेखनीय थे। व्यापारियों के अनेक वर्ग सक्रिय थे। मारवाड़ी, गुजरती और मुल्तानी व्यापारियों में हिंदू एवं जैन थे। मुस्लिम व्यापारियों में बोहरे और खुरासानी थे।
विदेशी व्यापारियों में ईरानी और खुरासानी प्रमुख थे। इस प्रकार सल्तनत काल में ही एक विकसित नगरीय अर्थव्यवस्था की उत्पत्ति भारत में हो चुकी थी। मुग़ल काल में इसकी प्रगति और व्यापक रूप में संभव हुई।
भारतीय व्यापारियों ने अदन में अपने पैर भली भाँति जमा रखे थे। वहाँ से वे लाल सागर बंदरगाहों और पूर्व अफ्रीका के मसावा, मोगादिशू आदि बंदरगाहों के साथ व्यापार करते थे। इस काल में व्यापार अदन से खिसक कर यमन तट पर मोचा या मोखा में जा पहुँचा। ईरान में सफवियों और अरब, मिस्र तथा इराक में उसमानली तुर्की ने सड़कों पर जो शांति स्थापित की थी वह उस क्षेत्र में भारतीय व्यापार को,
जिसका मुख्य माल कपड़ा था, बढ़ाने में बहुत सहायक सिद्ध हुई। मसुलीपतनम् के व्यापारी दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों और द्वीपों के साथ तो व्यापार कर ही रहे थे, अब गोलकुंडा राज्य के, जिसका सफ़वियों से अच्छा संबंध था इस प्रमुख बंदरगाह के व्यापारी पश्चिम एशियाई बंदरगाहों के साथ भी व्यापार करने लगे।
सत्रहवीं सदी को 'भारत के समुद्री व्यापार और साथ ही कपड़े के व्यापार का स्वर्णिम काल कहा गया है। इस काल में भारतीय व्यापारी दक्षिण-पूर्व एशिया, पश्चिम एशिया और अफ्रीका के पूर्वी तट पर सर्वत्र बसे हुए देखे जा सकते थे।
उदाहरण के लिए, गुजरात के व्यापारी, खास तौर से शायद काठियावाड़ के बनी, सभी यमनी शहरों में बसे हुए थे और उस क्षेत्र के व्यापार पर उनका नियंत्रण था । गुजराती व्यापारियों के एक छोटे-से समूह का अफ्रीकी तट के प्रमुख बंदरगाह मसोवा के व्यापार पर नियंत्रण था। इस्लामी दुनिया के बिलकुल मध्य में भारतीय आप्रवासियों की उपस्थिति इस बात का सूचक थी कि व्यापार पर धार्मिक पूर्वग्रहों का कोई अंकुश नहीं था। गुजराती बनिए ईरान के सभी तटवर्ती नगरों और साथ ही उसके अंदरूनी शहरों में भी बसे हुए थे। दक्षिण-पूर्व एशियाई बंदरगाहों में कलिंगों ( या क्लिंगों अर्थात् ओड़िया और दक्षिण भारतीय हिंदू व्यापारियों) की स्थिति बहुत मज़बूत थी।
एक कलिंग बेंट के बंदरगाह का शाहबंदर था और एक अन्य वहाँ के सुल्तान के जहाजी बेड़े का प्रभारी वे लोग अकसर, मलय और सियाम की खाड़ी में भी सक्रिय थे।
इस काल में एशिया के देशों के बीच चलने वाले व्यापार के रंग-रूप में भी कोई बदलाव नहीं आया। भारत का निर्यात का मुख्य माल बेशक कपड़ा ही था। भारतीय कपड़ा अभिजात वर्ग की भी जरूरतें पूरी करता था और जनसाधारण की भी, जिनके लिए मोटे किस्म का कपड़ा गुजरात में बनता था और वहीं से निर्यात किया जाता था।
भारत चावल, दालें, गेहूं, तेल, घी आदि खाद्य सामग्री का भी निर्यात करता था। दक्षिण-पूर्व एशियाई द्वीपों में इन वस्तुओं की बहुत मांग होती और साथ ही पश्चिम एशिया के लिए हर्मुज और अदन में भी बंगाल शक्कर और कच्चा रेशम निर्यात करता था और मलाबार हिंद महासागर के बाजारों के लिए काली मिर्च भेजता था। भारत के लिए भी इन वस्तुओं का तटीय व्यापार चलता था। कोरोमंडल के बंदरगाह नील और तंबाकू का निर्यात करते थे। नील का निर्यात गुजरात भी करता था।
पृष्ठभूमि की संक्षिप्त चर्चा की जाएगी। इसके साथ ही भारतीय लोग इस काल में सिद्ध दोषी, अनुबंधित श्रमिक, कंगनी-मैस्त्री, स्वतंत्र रूप और कुछ दक्षिण पूर्व एशिया में व्यापारिक तंत्र के अंतर्गत ब्रिटिश उपनिवेशों में कृषि, निर्माण, बाबूगिरी जैसे कार्यों के लिए ले जाए गए, इनके बारे में इस इकाई के तहत समझने की कोशिश की जाएगी। भारत के संदर्भ में भारत पर ब्रिटिशकाल काल (1764-1947 ई.) को औपनिवेशिक काल/ आधुनिक काल कहा जाता है।
वार्तालाप में शामिल हों