अरबों की शासन व्यवस्था - rule of the arabs
अरबों की शासन व्यवस्था - rule of the arabs
मुहम्मद बिन कासिम का अधिकांश समय युद्ध में व्यतीत हुआ जिससे वह सिंघ की शासन व्यवस्था की ओर अधिक ध्यान नहीं दे सका, किंतु राजा दाहिर के परास्त होने से शासन व्यवस्था में उथल-पुथल हो जाने के कारण उसका इस ओर ध्यान आकर्षित हुआ। अरबों ने स्थानीय संस्थाओं को शासन-भार सौंप दिया। यह कार्य उन्होंने आवश्यकता के अनुसार किया, क्योंकि वे स्थानीय विधियों, रीति-रिवाजों तथा परंपराओं से पूर्णतया अनभिज्ञ थे। अरबों के शासन की रूपरेखा निम्न प्रकार है-
(1) भूमि की व्यवस्था
भारत विजय के परिणामस्वरूप अरबवासियों के हाथ में समस्त भूमि आ गई थी, किंतु मुसलमान सैनिकों को कृषि करने का अधिकार प्राप्त नहीं था। यह भार हिंदुओं को ही सहन करना पड़ा। जिनकी स्थिति दासों से किसी प्रकार कम नहीं थी। कुछ सैनिकों को अनुदान के रूप में भूमि प्राप्त हुई। शेष को उनका निश्चित वेतन राजकोष से मिलता था। उस समय धार्मिक अनुदान की प्रथा थी। बहुत से फकीरों, महात्माओं, साधु-संतों तथा मठाधीशों को भूमि अनुदान के रूप में दी गई। (2) सैनिक व्यवस्था
अरब आक्रमण के बाद बहुत से अरब सैनिक भारत में स्थाई रूप से निवास करने लगे।
उन्होंने भारतीय स्त्रियों से विवाह कर गृहस्थ जीवन व्यतीत करना आरंभ कर दिया। स्थानीय सेना कुछ अंशों से भंग कर दी गई, किंतु कुछ स्थिर रही। भारतीय सैनिकों को अरब सेना में प्रवेश करने का अधिकार प्राप्त हुआ। धीरे-धीरे अरब सैनिकों में विलासिता का उदय हुआ, जिसका उनकी युद्ध-प्रिय भावनाओं पर दूषित प्रभाव पड़ा। उन्होंने व्यापारियों का रूप धारण करके स्वयं को सेना से पृथक कर लिया। आवश्यकता के समय किराए से सैनिक सेना में भर्ती करने की प्रथा को मुसलमानों ने अपना लिया। मुस्लिम शासन के अनुसार सैनिकों को लूट के माल का 4/5 भाग मिलता था और 1/5 भाग खलीफा के पास भेज दिया जाता था। (3) राजस्व व्यवस्था
राजस्व के प्रमुख साधन कर थे। नहरों द्वारा सींचे जाने वाले खेतों के उपज का 2/5 भाग और अन्य प्रकार से सींचे जाने वाले खेतों का 1/4 भाग कर के रूप में लिया जाता था। इसके अतिरिक्त उन व्यक्तियों से जजिया लिया जाता था, जो इस्लाम धर्म अंगीकार नहीं करते थे, परंतु स्त्रियों बच्चों तथा ऐसे व्यक्तियों से जो काम करने के योग्य नहीं थे यह कर नहीं लिया जाता था।
(4) न्याय व्यवस्था
न्याय व्यवस्था मुस्लिम विधि के अनुसार की जाती थी चाहे वादी अथवा प्रतिवादी, मुसलमान अथवा हिंदू हो। न्याय करने का अधिकार केवल काजी को प्राप्त था।
दंड विधि कठोर थी। चोरी की गणना भयानक अपराधों में की जाती थी। चोर की पत्नी तथा बच्चों को जीवित आग में जला दिया जाता था। इस प्रकार अरब, मौर्य शासकों से भी कठोर थे। हिंदुओं को मुसलमान यात्रियों के लिए तीन दिन के भोजन की व्यवस्था करनी आवश्यक थी। अमीरों तथा सरदारों को अपने क्षेत्र में अपराधियों को प्राण-दंड देने के अधिकार प्राप्त थे। काजी हिंदुओं की अपेक्षा मुसलमानों के साथ अधिक पक्षपात का व्यवहार करता था, किंतु राजनैतिक व सार्वजनिक अपराधों के संबंधों में किसी प्रकार का पक्षपात नहीं किया जाता था। हिंदुओं के पारस्परिक तथा व्यक्तिगत मुकदमों का निर्णय पंचायत करती थी। (5) धार्मिक व्यवस्था
प्रारंभ में मुसलमानों की धार्मिक नीति हिंदुओं के प्रति बड़ी कठोर तथा असहिष्णुतापूर्ण थी। उन्होंने हिंदुओं के साथ बहुत ही कठोर व्यवहार किया। बालकों तथा स्त्रियों के अतिरिक्त समस्त सैनिकों का वध कर दिया जाता था। बालकों तथा स्त्रियों को दास बनाया जाता था। बाद में अरब शासकों ने अनुभव किया कि इस प्रकार के व्यवहार से वे भारत में स्थाई राज्य की स्थापना करने में सफल नहीं हो सकते थे। अतः उन्होंने हिंदुओं के प्रति अपने व्यवहार में परिवर्तन आरंभ कर दिया। उन्होंने उनकी सेवाओं की प्राप्ति का प्रयत्न करना आरंभ किया। अब हिंदुओं के लिए धर्म परिवर्तन कर इस्लाम धर्म की दीक्षा प्राप्त करना आवश्यक नहीं था। वे जजिया कर देकर प्राणों की रक्षा कर सकते थे। बाद में उन्हें सेना तथा शासन में स्थान प्राप्त होने लगा और वे शासन के विभिन्न अंग बन गए।
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