सेन वंश - sen dynasty
सेन वंश - sen dynasty
वंशावली
(1) सामंतसेन, (3) विजयसेन,
(5) लक्ष्मणसेन (लगभग 1179-1205 ई.),
(2) हेमन्तसेन
(4) वल्लालसेन (लगभग 1159-1179
(6) विश्वरूपसेन,
(7) केशवसेना
प्रमुख शासक: विजयसेन और लक्ष्मणसेन ।
विजयसेन
रामपाल की मृत्यु के पश्चात् पाल वंश की अवनति प्रारम्भ हो गई जिसका लाभ उठाकर विजयसेन ने पूर्वी बंगाल और उत्तरीबंगाल के बहुत बड़े भाग पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया। सेन वंशी अभिलेखों के आधार पर विद्वानों का मत है कि प्रारम्भ में विजयसेन ने कलिंग के राजा अनंत वर्मा चोड़गंग से मित्रता स्थापित की,
जो उस समय शक्तिशाली शासक था। विजयसेन के देवपाड़ा- अभिलेख से विदित है कि उसे नान्य, वीर, राघव और वर्धन नामक राजाओं के अतिरिक्त गौड़, कामरूप और कलिंग के शासकों से युद्ध करना पड़ा, जिसमें उसे विजय प्राप्त हुई।
विद्वानों के अनुसार देवपाड़ा-अभिलेख से विदित होता है कि संभवतः पाल शासक मदनपाल को पराजित कर उसने उत्तरी बंगाल में सेन राज्य की स्थापना की थी। देवपाड़ा-अभिलेख से विदित है कि विजयसेन ने पदुमसरनामक तालाब के किनारे प्रद्युम्नेश्वर
शिव का मंदिर बनवाया। साथ ही, उसने गौरवसूचक विरुद्ध 'परमेश्वर,' 'परमभट्टारक', 'महाराजाधिराज' एवं अरिराजवृषभशंकर आदि धारण किये। विजयसेन शिव का उपासक था और श्रोत्रिय ब्राह्मण और निर्धनों को दान देता था। उसने जनहित के लिए अनेक कल्याणकारी कार्य किये। विजयसेन एक वीर और पराक्रमी राजा था, जिसने अपना संपूर्ण जीवन संघर्षों और युद्धों में व्यस्त रखा।
लक्ष्मणसेन
लक्ष्मणसेन बचपन से एक वीर और पराक्रमी योद्धा था और संभवतः 1179 ई. में वह सिंहासनारूढ़ हुआ। वह सेने वंश का सर्वाधिक प्रतापी राजा सिद्ध हुआ।
उसके शासनकाल के लगभग आठ अभिलेख बंगाल के विभिन्न भागों से उपलब्ध हुए हैं, जिनमें उनकी विजयों और सांस्कृतिक क्रिया-कलापों का उल्लेख दृष्टिगोचर होता है। इन अभिलेखों से विदित होता है कि उसने 'अरिराजमदनशंकर और 'गौड़ेश्वर' की उपाधियों के अतिरिक्त 'परमवैष्णव' की उपाधि भी धारण की थी, जिससे स्पष्ट होता है कि लक्ष्मणसेन ने अपने पिता और पितामह द्वारा मान्य शैव धर्म का परित्याग कर वैष्णव धर्म अपना लिया था। उसके अभिलेखों की प्रमुख विशेषता यह है कि वे नारायण की स्तुति के साथ प्रारम्भ होते हैं।
लक्ष्मणसेन के पुत्र विश्वरूपसेन के मदनपाड़ा-अभिलेख से विदित होता है कि उसने पुरी, काशी और प्रयाग में विजयस्तंभों की स्थापना की। उसके प्रारंभिक अभिलेखों से स्पष्ट होता है कि लक्ष्मणसेन ने संपूर्णगौड़, वंग और राढ़ा पर अधिकार कर लिया था। लक्ष्मणसेन के भोवल-अभिलेख और माधाइनगर- अभिलेखों के अनुसार उसने गौड़, कामरूप, काशी और कलिंग की विजयें कीं। अतः विजयसेन एक वीर और पराक्रमी राजा था, जिसने अपना जीवन संघर्षों और युद्धों में व्यस्त रखा। वह शिव का उपासक और दानशील सम्राट था जिसने जनहित के लिए अनेक कल्याणकारी कार्य किये।
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