सोलंकी अथवा चैलुक्य वंश - Solanki or Chailukya dynasty
सोलंकी अथवा चैलुक्य वंश - Solanki or Chailukya dynasty
वंशावली
(1) मूलराज प्रथम (लगभग 941-996 ई.),
(3) बल्लभराज (लगभग 1009 ई.),
(2) चामुण्डराज (लगभग 997-1009 ई.),
(4) दुर्लभराज ( लगभग 1009-1024 ई.),
(5) भीम प्रथम (लगभग 1024-1064 ई.),
(6) कर्ण (लगभग 1065-1093 ई.),
(8) कुमारपाल (लगभग 1143-1172 ई.),
(10) मूलराज द्वितीय (ल. 1176-1178 ई.),
(7) जयसिंह सिद्धराज (लगभग 1094-1142 ई.),
(9) अजयपाल (लगभग 1173-1176 ई.),
(11) भीम द्वितीय (लगभग 1178-1241 ई.)।
प्रमुख शासक: मूलराज प्रथम, भीम प्रथम, जयसिंह सिद्धराज और कुमारपाल मूलराज
गुजरात में चालुक्य वंश का संस्थापक मूलराज था। उसने अपनी सैनिक शक्ति से गुजरात में अपने मामा के राज्य को अपने अधिकार में कर लिया। उसने कच्छ के नरेश लाखा या लक्षराज को पराजित कर उसे मार डाला और उसके राज्य को अपने राज्य में सम्मिलित कर लिया। उसने साँभर के चैहान नरेश से भी युद्ध किया। उसने कई मंदिरों का निर्माण किया ब्राह्मणों को मुक्त - हस्त से दान दिया।
भीम प्रथम
यह बड़ा शक्तिशाली और प्रतापी नरेश था। इसके शासनकाल में महमूद गजनवी ने अन्हिलवाड़ा व गुजरात में सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण किया।
भीम भयभीत होकर कायरता से भाग गया और महमूद ने मंदिर और नगर को खूब लूटा। महमूद के लौट जाने पर भीम ने पुनः गुजरात पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया और शक्ति में वृद्धि की। उसने आबू के परमार नरेश को परास्त किया। इसी बीच धार के भोज परमार की सेना ने अन्हिलवाड़ा को लूटा। इससे भीम ने कलचुरि नरेश लक्ष्मीकर्ण की सैनिक सहायता से भोज पर आक्रमण किया और उसे परास्त कर दिया। जयसिंह सिद्धराज
यह बड़ा वीर, युद्ध-प्रिय, साहसी एवं उत्साही शासक था। उसने चैहान राजा को युद्ध में परास्त किया। मालवा के नरवर्मन और यज्ञोवर्मन नामक शक्तिहीन परमार नरेशों से युद्ध कर उन्हें अपने अधीन कर उसने 'अवन्तिनाथ' की उपाधि धारण की।
उसने नांदोल के चैहान तथा सौराष्ट्र के चुणासम को भी पराजित किया। उसने बुंदेलखंडके चंदेल राजा पर भी आक्रमण किया, लेकिन उसे सफलता नहीं मिली, परंतु कलचुरि और गहड़वाल नरेशों से उसने अपने मैत्री संबंध स्थापित किये। संभव है उसने अरबों को भी परास्त किया हो। वह शैव मतावलम्बी होने पर भी सभी धर्मों के प्रति उदार था और उनका आदर करता था। वह विद्वानों का आश्रयदाता था। प्रसिद्ध जैन आचार्य हेमचंद्र सूरि उसकी राजसभा को अलंकृत करता था। उसने अनेक भवनों और मंदिरों का भी निर्माण किया। वह सोलंकी वंश का सर्वाधिक लोकप्रिय, पराक्रमी, शक्तिशाली, धर्मपरायण और प्रजावत्सल नरेश था। कुमारपाल
जयसिंह के बाद कुमारपाल नरेश हुआ। उसने शीघ्र ही पड़ौसी राज्यों को परास्त करना प्रारम्भ कर दिया। उसने साँभर के चैहान राजा को परास्त किया, आबू के परमार नरेश के विद्रोह को कुचल दिया, मालवा में गुजरात के चालुक्यों की सत्ता दृढ़ कर ली। उसने दक्षिण के कोंकण के प्रबल नरेश मल्लिकार्जुन को बुरी तरह हरा दिया। उसने चेदि के नरेश को भी हराया। इन विजयों से उसने सोलंकी राजवंश की प्रतिष्ठा और शक्ति में श्रीवृद्धि की। कुमारपाल एक विजेता ही नहीं था, अपितु वह एक सफल शासक, विद्या और कला का संरक्षक भी था। उसके शासनकाल में हेमचंद्र सूरि विद्यमान था और उसने व्याकरण, जैन दर्शन और धर्म पर प्रसिद्ध ग्रंथ लिखे। कुमारपाल शैव था। उसने विभिन्न मंदिरों और भवनों का निर्माण किया और सोमनाथ के मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया।
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