भारतीय समुद्रपारीय प्रवासन के चरण और स्वरूप - Stages and Patterns of Indian Overseas Migration
भारतीय समुद्रपारीय प्रवासन के चरण और स्वरूप - Stages and Patterns of Indian Overseas Migration
उपलब्ध ऐतिहासिक तथ्यों, पुरातात्विक साक्ष्यों और देशी-विदेशी साहित्य, विदेशी यात्रा वृतांत के आधार पर भारतीयों के समुद्रपारीय प्रवासन के चरणों एवं स्वरूप को समझा जा सकता है।
सिंधु एवं वैदिक काल
सिंधुघाटी की सभ्यता और वैदिक ऋचाओं से विदेशी प्रवासन संपर्क के साक्ष्य मिले हैं। उत्तरी अफगानिस्तान की लाजवर्ण मणि मोहनजोदड़ो में मिली है। विदेशों से प्राप्त कुछ अभिलेखों से भी भारतीय इतिहास पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है। उत्तरी अफगानिस्तान सिंधु सभ्यता के वितरण क्षेत्र में नहीं आता,
परंतु शोर्तुपई नामक स्थान पर ठेठ सिंधु सभ्यता के मृदुभांड मिले हैं। यह संभव है कि उत्तरी अफगानिस्तान में कुछ सिंधु सभ्यता बस्तियाँ रहीं हों, क्योंकि उत्तरी अफगानिस्तान से लाजवर्द मणि (लापिस लाजूली) तथा मध्य एशिया से टिन का आयात होता था। सिंधु घाटी के नगरों से फारस की बेलनाकार मोहर, फिरोजा, टिन मिले हैं। सिंधु घाटी के संपर्क इसके समकालीन सभ्यता सुमेरियाई मिस्र, अफ़गानिस्तान, तुर्कमेनिया से भी रहे होंगे। मिस्र, सुमेरिया, असिरेरीया से भारतीय वस्तुओं के प्रारूप, नौका, नौकायन के यंत्र, भंडार गृह तथा हस्तशिल्प मिले हैं,
जो भारत से निर्यात होते थे। उपरोक्त भौतिक व अभौतिक सांस्कृतिक तत्वों का आदान-प्रदान भारतीय प्रवासन के बिना संभव नहीं हुआ होगा। इनकी चर्चा यूनानी और रोम के लेखक भी करते हैं।
एशिया माइनर में बोगाज नामक स्थान पर लगभग ईसा पूर्व 1400 का संधिपत्र अभिलेख मिला है, जिसमें मित्र वरुण, इंद्र और नासत्य आदि वैदिक देवताओं के नाम हैं। अफगानिस्तान में बहने वाली कुभा (काबुल), सुवास्तु (स्वात), क्रमु (कुर्रभ) तथा गोमल (गोमती) नदियों से आर्य जन परिचित थे। इससे ज्ञात होता है कि वैदिक आर्यों के वंशज एशिया माइनर में भी रहते थे। इसी प्रकार मिस्र में तेलू अल-अमनों में मिट्टी की कुछ तख्तियाँ मिली है,
जिनपर बेबिलोनिया के कुछ शासकों के नाम खुदे हैं जो (नाम) ईरान और भारत के आर्य शासकों के नामों, जैसे हैं। मिस्र में मिट्टी की तख्ती पर शासकों के नाम खुदे हैं। जो भारत के राजाओं के नाम से मिलते हैं।
बौद्ध काल एवं मौर्य काल
इस काल में बौद्ध भिक्षु शांति और प्रेम का संदेश लेकर दक्षिण-पूर्व एशिया (बर्मा, कंबोडिया, थाईलैंड, मलय, इंडोनेशिया... ) गए। सम्राट अशोक ने बौद्ध भिक्षुओं तथा अपने पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा को बुद्ध का संदेश फैलाने के लिए पड़ोसी देश श्रीलंका भेजा। इन बौद्ध लोगों का श्रीलंका के तत्कालीन राजा तिस्स तथा उसके उत्तराधिकारियों ने अपने देश में स्वागत किया और अशोक की तरह शिलालेख लगाए गए।
इस कारण भारत प्राचीन काल में भारतीय समुदाय के साथ-साथ ज्ञान-विज्ञान जैसे- चिकित्सा, रसायन, गणित इत्यादि की पहुँच विश्व के देशों तक पहुँचा सका। इसकी जानकारी चीनी यात्री फाहियान हुआन सांग के यात्रा वृत्तांतों से मिलती है। बोधिरुची, बुद्धभद्र, बुद्धजीव, बुद्धशांत आदि ऐसे बौद्धधर्म प्रचारक थे, जो पाँचवी छठी शताब्दियों में चीन गए थे। कॉसमॉस के वृत्तांत से पता चलता है कि भारत-चीन व्यापार में सिंहलद्वीप (श्रीलंका) एक महत्वपूर्ण बिचौलिए का काम करता था। स्वयं फा- हियान एक व्यापारी जहाज पर चीन गया था।
मौर्योत्तर काल
इस काल में भारतीय प्रवासन का गहरा संबंध भारत के व्यापारिक रिश्ते से जुड़ा है जो ग्रीक-रोमन साम्राज्य के साथ था। ग्रीक-रोमन साम्राज्य के लोगों को 'यवन' कहा जाता था।
इनके साक्ष्य साहित्य, भाषा, लिपि, विश्वास पद्धति, आर्किटेक्चर, स्वशासन की प्रणाली ( क्षत्रप व्यवस्था) आदि से मिलते हैं। रोमन साम्राज्य का जब मिस्र पर कब्जा हो गया तब एलेक्जेंड्रिया तथा क्लिपेट्रा जैसे शहर महत्वपूर्ण व्यापारिक स्थल के रूप में उभरे जहाँ से भारत और रोम के बीच की व्यापारिक गतिविधियाँ चलती थी। रोमन, मिस्र तथा भू-मध्यसागर और भारत के बीच व्यापारिक गतिविधियों से संबंधित प्रमुख स्थान तथा बंदरगाह निम्लिखित हैं- मुजरिस (कोच्ची), बेरिगाजा (सूरत), पूकर (कावेरीपट्टनम्), पुडुके (अरिकमेड्), कलिंगा तालुक (तामलिप्ति) इत्यादि थे। पाँचवी सदी का नौवहन मार्गदर्शिका पुस्तक पेरिप्लस ऑफ द इरिथ्रियन सी उपरोक्त व्यापारों की चर्चा करता है।
ग्रीक मिस्र के साथ प्राचीन भारतीय व्यापार, भारतीय प्रवासन की चर्चा ग्रीक-रोमन के भुगोलवेत्ता, इतिहासकार, वैज्ञानिक, जैसे-स्ट्रैबो, प्लिनी (नेचुरल हिस्ट्री), टोलेमी भी करते हैं। प्राचीन तमिल ग्रंथ सिल्पादिकारम तथा संगम कविता में भी इन व्यापारों की चर्चा की गई है।
मध्य एशिया से वह व्यापारिक मार्ग गुजरता था जो चीन को रोमन साम्राज्य के पश्चिमी प्रांतों से जोड़ता था, जिसे 'सिल्क मार्ग' कहा जाता था, क्योंकि चीन से होने वाला रेशम का समस्त व्यापार अधिकतर इसी मार्ग से होता था। इस चीनी रेशम व्यापार में भारतीय व्यापारियों ने मध्यस्थ के रूप में भाग लेना प्रारंभ किया।
इन प्रदेशों से होकर जाने वाले व्यापार में अधिकतर उत्तर-पश्चिम के व्यापारी भाग लेते थे। पश्चिमी एवं दक्षिण भारत के व्यापारी दक्षिण अरब, लाल सागर तथा ऐलेक्जेंड्रीया के क्षेत्रों से जुड़े हुए थे। रोमन साम्राज्य से होने वाले व्यापार का काफी बड़ा भाग इन क्षेत्रों से होकर भी गुजरता था। रोमन साम्राज्य के एक सर्वशक्तिमान साम्राज्य के रूप में उदय होने से ई.पू. प्रथम शती से भारतीय व्यापार को काफी प्रोत्साहन मिला, क्योंकि इस साम्राज्य का पूर्वी भाग भारत में निर्मित विलासिता के समान का एक बड़ा ग्राहक बन गया। ईसवीं सन् की पहली शती में एक अनाम ग्रीक नाविक ने अपनी 'पेरिप्लस ऑफ़ 'दि एरिथ्रियन सी' नामक रचना में भारत द्वारा रोमन साम्राज्य को निर्यात किए जाने वाले समान का विवरण दिया है,
जिसमें प्रमुख हैं मोती, हाथीदाँत, इत्यादि । भारतीय व्यापारी चीन से रेशम खरीदकर रोमन व्यापारियों तक पहुँचाते थे और यह बहुत ही महत्वपूर्ण वस्तु थी। रोमन साम्राज्य की मसालों की आवश्यकता केवल भारतीय सामग्री देने से ही पूर्ण नहीं होती थी, इसलिए भारतीय व्यापारी दक्षिण-पूर्व एशिया से संपर्क बढ़ाने लगे। अपने निर्यात के प्रतिदान में रोम से भारत में अन्य समान के अतिरिक्त बहुत बड़ी संख्या में सोने-चाँदी के सिक्के आते थे। प्लिनी ने प्रतिवर्ष रोम से भारत में चली जाने वाली सोने की भारी मात्रा के लिए दुःख प्रकट किया है। इससे पता चलता है की भारत तथा रोमन साम्राज्य के बीच व्यापारिक संबंध काफी विकसित था।
पेरिप्लस ऑफ़ दि एरिथ्रियन सी में नौरा (कैन्ननौर), तोंडी (आधुनिक पोन्नानी), मुशिरी और नेल्सिंडा (कोट्टयम के निकट) पश्चिमी तट के प्रमुख बंदरगाह बताए गए. हैं। इस ग्रंथ के अनुसार इन व्यापारिक नगरों में बड़ी संख्या में जहाज़ विद्यमान रहते थे, जिन पर काली मिर्च, अनेक प्रकार के मसाले लादे जाते थे। मसालों के अतिरिक्त उत्तम कोटि के हाथीदांत, मोती, मसलन, रेशमी कपड़े पश्चिमी देशों को निर्यात किए जाते थे। भारत के बारीक़ सूती कपड़े, विश्व में प्रसिद्ध थे। कवियों ने रेशमी कपड़ों पर जटिल बेलबूटों के बुनने की भी चर्चा की है। इनके अतिरिक्त अनेक प्रकार के बहुमूल्य रत्न, हीरे, पारदर्शी पत्थर (रत्न), नीलम, कर्पर (tortoise shell) भी निर्यात किए जाते थे।
रोमन साम्राज्य तथा दक्षिण भारत के बीच व्यापार का प्रमाण पुरातत्व संबंधी स्रोतों से भी पुष्ट होता है। ऑगस्टस तथा रिवेरियस के मुहर और सोने और चाँदी के सिक्के तमिल प्रदेश के अनेक स्थलों पर प्राप्त हुए हैं। बहुमूल्य रत्न, विभिन्न प्रकार के केसर एवं सुगंधित पदार्थ, सुंदर वस्त्र आदि भारत से निर्यात किए जाते थे। हाल के भू-पुरातात्विक साक्ष्य जो नील नदी की डेल्टा / बेसिन में पाई गई है, से भारतीय प्रवासन की और व्यापारिक गतिविधियों की चर्चा मिलती है।
भारतीय व्यापारियों का प्रवासन प्राचीन सिल्कमार्ग का विस्तार चीन से लेकर मध्य एशिया तक था जो भारत से होकर गुजरता था। भारतीय शासक कनिष्क ने मध्य एशिया के कारगर,
यारकंद, खोतान प्रांतों पर अपना आधिपत्य जमाया। चीन से मध्य एशिया तथा रोमन साम्राज्य को जाने वाले रेशम तथा अन्य विलासिता की वस्तु इसी रेशम मार्ग' से होकर जाती थी। इसी मार्ग पर भारत के इंडोग्रीक, कुषाण, शक शासक द्वारा विजय किया गया, जिससे भारतीय शासकों को मार्ग कर के रूप में सोना चाँदी मिलने लगा तथा व्यापारियों का भी आना-जाना प्रारंभ हुआ। बाद के दिनों में इन्हीं व्यापारिक मार्गों से यूरोप तक चीन तथा प्राचीन भारत का तकनीकी ज्ञान, छापाखाना, विस्फोटक (गन पाउडर), दिशा सूचक यंत्र (कंपास पहुँचा। इनकी जानकारी चीनी यात्री फाहियान हुआन सांग, मार्कोपोलो अपने यात्रा वृतांत में देते हैं। पूर्व मध्य काल में छोटे-छोटे भारतीय व्यापारिक समूह व्यापारिक उद्देश्यों से पूर्वी अफ्रीका, बर्मा, मलाया, इंडोनेशिया, थाईलैंड गए।
इनमें प्रमुख है- दक्षिण भारत का नट्टूकुट्टी चेट्टियार, राजस्थान का निया, गुजरात का व्यापारिक समुदाय बोहरा, इस्माईल आदि।
हिंदू शासकों के समय
इस समय दक्षिण पूर्व एशियाई देशों में भारतीय हिंदू शासकों की अभिरूची के कारण सैनिक अभियान तथा व्यापारिक गतिविधियाँ प्रारंभ हुई। परिणामस्वरूप, भारतीय प्रवासन प्रारंभ हुआ, जिसने इस क्षेत्र में भारतीय डायस्पोरा को जन्म दिया। इस संदर्भ में बंगाल के पाल राजाओं का संपर्क इंडोनेशिया के शैलेंद्र राजा से, चोलों का सैनिक अभियान श्रीलंका तथा इंडोनेशिया के श्रीविजय साम्राज्य तक हुआ। इसके कारण, भारतीय दक्षिण पूर्व एशियाई देशों (बर्मा, कम्बोडिया, थाईलैंड, मलय, इंडोनेशिया) में गए। भारत से बाहर वृहद हिंदू साम्राज्य इन दक्षिणपूर्व एशिया तक फैला।
इस कारण इन देशों में भारत से धर्म प्रचारकों, व्यापारियों, कलाकारों, विद्वानों का प्रवासन संभव हुआ। इस काल में भारतवासी सुदूरपूर्व के द्वीपों के साथ व्यापार करने के लिए गए। उनमें से कुछ हिंदू धर्म और बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए गए। कुछ अपनी पराक्रमी प्रवृत्ति के कारण गए। संभवतः ये उपनिवेश भारत की अतिरिक्त जनसंख्या के लिए नए स्थान भी थे। साहित्यिक प्रमाणों से प्रकट होता है कि व्यापार ने ही भारत और सुपूर्व के बीच संबंधों को बढ़ावा दिया था। समय के साथ-साथ वाणिज्य और व्यापारिक कार्यों के कारण राजनीतिक और सांस्कृतिक संबंध भी स्थापित हो गए भारतीय संस्कृति चंपाजावा,
सुमात्रा, लंका, बर्मा, स्याम, मलाया प्रायद्वीप, शैलेंद्र साम्राज्य, चीन, तिब्बत आदि में विकसित हो गई। चंपा में ब्राह्मणवादी हिंदू और बौद्ध धर्म दोनों ही थे। चंपा के भारतीय उपनिवेशों ने परंपरागत हिंदू ढंग का समाज स्थापित करने की चेष्टा की । सातवीं शताब्दी ई. के अभिलेख से ज्ञात होता है कि जावा में भारतीय संस्कृति प्रभावी थी। वहाँ एक हिंदू राज्य स्थापित था। शैलेंद्र साम्राज्य ने जावा को विजय किया था। जावा में ब्राह्मण धर्म व बौद्ध धर्म साथ- साथ प्रचलित हुए। मंदिरों में शिव लिंग, विष्णु, दुर्गा की मूर्तियाँ प्रतिष्ठित की गई। मंजुश्री और बुद्ध के पूर्व जन्मों को बोरोबुदूर स्तूप की रेलिंग में अंकित किया गया है। बौद्ध अभिलेखों में नागरी लिपि प्रयुक्त की गई है।
जावा में सर्वाधिक प्रसिद्ध बोरोबुदूर का स्तूप है। यह लगभग 750 ई. में निर्मित हुआ था। सुमात्रा में चौथी शताब्दी ई. में हिंदू राज्य स्थापित किया गया था। इसी समय बोर्निया में भी हिंदू उपनिवेश स्थापित किया गया था, यहाँ ब्राह्मण समाज के प्रमुख अंग थे। बाली सुदूर पूर्व में एक मात्र हिंदूउपनिवेश है, जिसने अपनी संस्कृति को अब तक अक्षुण्ण रखा है। फूनान या कम्बूज में पाँचवी सदी ई. में हिंदू राज्य की स्थापना हुई थी, यहाँ संस्कृत भाषा, भारतीय जाति प्रथा, शैव मत, बौद्ध मत का प्रचार-प्रसार हुआ।
जय वर्मा तृतीय ने महान कम्बूज साम्राज्य की स्थापना की। इसे अंगकोर सभ्यता का संस्थापक भी कहा जाता है। रामायण, महाभारत की गाथाएँ जन-जन में प्रसारित हुई। कम्बूज की कला भारतीय थी, जिसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण 'अंगकोरवाट है। अंगकोरवाट का निर्माण राजा सूर्य वर्मा द्वितीय ( 1113-1145 ई.) ने कराया था। स्याम सातवीं शताब्दी ई. में भारतीय संस्कृति का मुख्य केंद्र बन गया था। यहाँ सभी भारतीय नाम प्रचलित थे। बुद्ध, विष्णु शिव की मूर्तियां प्रतिष्ठापित थीं। सामाजिक-धार्मिक परंपराएं भारतीयों के समान थीं। मलय प्रायद्वीप में भारतीय लोगों का आगमन चौथी पांचवीं सदी ई. में हुआ, जिससे यह एक हिंदू संस्कृति से प्रभावित क्षेत्र बना।
आठवीं सदी ई. में दक्षिण-पूर्वी एशिया के इतिहास की मुख्य घटना महान साम्राज्य का उत्थान है, जिसमें सुमात्रा, जावा, मलाया प्रायद्वीप आदि सम्मिलित थे। इस साम्राज्य के शासक शैलेंद्र वंश के थे। शैलेंद्र शासक महायान बौद्ध मत के अनुयायी थे। उन्होंने भारतीय बौद्धों की 'मदद से बौद्ध देवी 'तारा' का मंदिर बनवाया। 1025 ई. में राजेंद्र चोल ने शैलेंद्र साम्राज्य पर अपनी नौ- सेना से आक्रमण कर अधिकार कर लिया और वहाँ बड़ी संख्या में अपने लोगों को भेजकर लगभग एक शताब्दी तक शासन में रखा। लंका, बर्मा, चीन, तिब्बत, कोरिया, आदि बड़ी संख्या में भारतीय लोगों के प्रवासन के कारण ये देश भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार के केंद्र बने जहाँ बौद्ध मत का तीव्र गति से प्रसार हुआ।
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