विधवा नारी की स्थिति - status of widow woman
विधवा नारी की स्थिति - status of widow woman
निष्ठावान् आर्य महिला की समस्त आशाओं का केन्द्रबिन्दु पति ही माना जाता था। वह अपनी पत्नी के लिए सभी सुखों का उद्गम कहा जाता था। पत्नी सदैव उसके सुख-दुख की संगिनी होती थी। इस तथ्य की यथार्थता का बोध प्रबोध चन्द्रोदय के शांति नामक पात्र के कथन से होता है- “सम्माननीया का यह कर्तव्य है कि वह उस समय की प्रतीक्षा करे, जबकि संकटापन्न उसका पति अपने कष्टों से मुक्त न हो जाये।" विधवाओं का भाग्य बड़ा कठोर था, उन्हें जीवन के सभी साज शृंगार तथा सुखों से विरक्त होना पड़ता था और सदा ही सांसारिक सुखों की उपेक्षा करनी पड़ती थी, जैसा कि स्मृतियों में भी विधान है। मानदेव के चंगुनारायण शिलालेख में विधवा के अभिशाप का विशद वर्णन है।
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