सूफी और धर्म परिवर्तन - Sufi and conversion
सूफी और धर्म परिवर्तन - Sufi and conversion
सल्तनत काल में आए सूफियों को आमतौर पर भारत में इस्लाम के प्रणेता के रूप में देखा जाता है। उत्तर मध्यकाल के कई लेखों और हवालों में सूफियों को सक्रिय धर्म-संस्था (मिनरी) के रूप में वर्णित किया गया है। शेख मुइनुद्दीन चिश्ती पर लिखी एक जीवनी में बताया गया है कि गैर-मुसलमानों को इस्लाम धर्म में परिवर्तन कराने में उन्होंने सक्रिय हिस्सा लिया था। इसी प्रकार 13वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध और 14वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में दक्कन की ओर जाने वाले सूफियों के बारे में भी यही कहा गया कि वे इस्लाम के कट्टर प्रचारक थे और उन्होंने जिहाद (गैर-मुसलमानो के खिलाफ युद्ध छेड़ रखा था।
सुहरावर्दी सूफियों में से कई सक्रिय धर्म प्रचारक थे। 14वीं शताब्दी में मीर सैय्यद अली हमादानी धर्म प्रचार और धर्म परिवर्तन के उद्देश्य से कश्मीर आया था, पर उसे वहाँ सफलता नहीं मिली। पर इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि सभी सूफी इस धर्म परिवर्तन में सक्रीयता से हिस्सा लेते रहे। उसने और उसके उतराधिकारियों ने गैर-मुसलमानों के प्रति सहिष्णुता का दृष्टिकोण अपनाया। शेख निजामुद्दीन औलिया ने एक अवसर पर गौर किया कि कई हिंदू इस्लाम को सच्चा धर्म मानते थे पर उसे ग्रहण नहीं करते थे।
उसका यह भी मानना था कि प्रत्येक धर्म की अपनी पूजा-पद्धति, विधि और विश्वास है। आरंभिक सूफियों के संबंध में इस बात के काफी कम प्रमाण मिलते हैं कि उन्होंने दक्कन में धर्म-युद्ध छेड़ रखा था। हाँ, यह सही है कि गैर-मुसलमान धर्म की छोटी जातियों के लोग सूफियों और उनकी दरगाहों की ओर आकृष्ट हुए और उनके भक्तों में शामिल हो गए। धीरे-धीरे वे इस्लाम के प्रभाव में आए और उन्होंने इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया। इस्लाम धर्म ग्रहण करने वालों के उत्तराधिकारियों ने बाद में यह दावा किया कि उनके पूर्वजों को किसी खास मध्यकालीन सूफी ने इस्लाम धर्म में परिवर्तित किया था। इसका एक ही मकसद था वे नए धर्मानुयायी सूफियों उनकी दरगाह से तथा इस्लाम से अपने लंबे संबंध को सिद्ध करना चाहते थे।
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