सूफी और शक्ति आंदोलन और सांस्कृतिक समन्वय - Sufi and Shakti movements and cultural syncretism

सूफी और शक्ति आंदोलन और सांस्कृतिक समन्वय - Sufi and Shakti movements and cultural syncretism


इकाई—3 में हमने एकेश्वरवादी भक्ति आंदोलन पर इस्लाम और सूफी मत की चर्चा की है। दोनों के बीच कुछ समानताएँ ऐसी है, जिससे स्पष्ट प्रतीत होता है कि उनके बीच विचारों का आदान-प्रदान हुआ था। इन समानताओं में उल्लेखनीय है, एकेश्वरवाद पर जोर, आध्यात्मिक गुरु (पीर या गुरु) की भूमिका, ईश्वर की रहस्यात्मक अनुभूति। इसके अलावा कई सूफियों और भक्ति संतों ने हिंदू और इस्लाम धर्म के कट्टर और रूढ़िवादी तत्वों पर प्रहार किया। कश्मीर में स्थापित ऋषि संप्रदाय सूफी मत पर भक्ति आंदोलन के प्रभाव का प्रामाणिक उदाहरण है। यहाँ इस संप्रदाय के संस्थापक शेख नूरूद्दीन वली पर 14वीं शताब्दी की महिला भक्तन लल दब्द का गहरा असर था।


• सल्तनत काल के दौरान सूफियों और नाथपथियों के बीच भी संबंध था। 13वीं 14वीं शताब्दी के दौरान उत्तर भारत में समाज के निचले तबके के बीच नाथपंथियों का आंदोलन बेहद लोकप्रिय हुआ। नाथपंथी योगी अक्सर चिश्ती शेखों के खानकाहों में पहुँच जाते थे और उनसे रहस्यवाद के स्वरूप पर बहस करते थे। सूफियों के भारत आने से बहुत पहले संस्कृत में योग पर लिखे ग्रंथ अमृतकुंड का अनुवाद हो चुका था।

इस योग का प्रभाव भी सूफियों पर पड़ा और उन्होंने कई प्रकार की योग पद्धतियाँ अपना लीं। आरंभिक चिश्तियों ने नाथपंथी योगियों के कुछ नैतिक मूल्यों और उनकी सामूहिक जीवन पद्धति को सराहा। चिश्तियों के समान नाथपंथी योगियों ने भी बिना किसी भेदभाव के समाज के सभी वर्गों के लिए दरवाजे खोल दिए। इन दोनों लोकप्रिय आंदोलन के कारण मुसलमानों और गैर-मुसलमानों के बीच आपसी समझ कायम करने में सहूलियत हुई।


चिश्ती संप्रदाय गैर-मुस्लिम परिवेश में भी लोकप्रिय हुआ, उसने अपने आपको उस परिवेश के अनुकूल ढाल लिया। इससे भारतीय परिवेश में एक समन्वयवादी धारा प्रवाहित होने लगी और सांस्कृतिक मेलजोल को बढ़ावा मिला। कई आरंभिक चिश्ती हिंदवी बोलते थे और इसमें अपने पद लिखा करते थे। खानकाहों ने क्षेत्रीय भाषा में रहस्यवादी कविताओं को प्रोत्साहित किया।

14वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में लिखी गई हिंदी की पुस्तक चंदायन में रहस्यवाद के साथ हिंदू मिथक और दर्शन भी घुला- • मिला हुआ है। कालांतर में सूफियों द्धारा रचित लोक साहित्य में इस्लाम के हल्के-फुल्के विचार, सूफी शब्दावली, लोकप्रिय प्रतीकों और मुहावरों का प्रयोग हुआ है। इस प्रकार खासकर ग्रामीण इलाकों में लोकप्रिय धर्म का विकास हुआ। चिश्ती संप्रदाय की प्रमुख प्रथा समा ने समन्वयवादी संगीत परंपरा की नींव रखी, जिससे कव्वाली जैसी विधा का विकास हुआ। अमीर खुसरो से कव्वाली की शुरुआत मानी जाती है।