भारत में सल्तनत काल के सूफी सिलसिले - Sufi orders of the Sultanate period in India

भारत में सल्तनत काल के सूफी सिलसिले - Sufi orders of the Sultanate period in India


भारत में सल्तनत काल के दौरान कई सिलसिले लोकप्रिय हुए। यहाँ हम उनमें से कुछ प्रमुख सिलसिले की चर्चा करेंगे।


सुहरावर्दी सिलसिला


सूफी संप्रदाय में सुहरावर्दी सिलसिला सल्तनत काल का प्रधान संप्रदाय था। भारत में इसके संस्थापक शेख बहाउद्दीन जकरिया (1182-1262 ई.) थे। वह एक खुरासनी थे और शेख शहाबुद्दीन सुहरावर्दी के शिष्य थे, जिन्होंने बगदाद में इस सिलसिला की शुरुआत की थी। शेख शहाबुद्दीन सुहरावर्दी के आदेश से शेख बहाउद्दीन जकरिया भारत आए। मुल्तान और सिंध को उन्होंने अपनी गतिविधि का केंद्र बनाया।

अतः उन्होंने मुल्तान में जिस खानकाह की स्थापना की, उसकी गिनती भारत में स्थापित आरंभिक खानकाहों में होती है। उस समय दिल्ली का सुल्तान इल्तुतमिश था, पर मुल्तान पर उसके दुश्मन कुबाचा का आधिपत्य था। शेख बहाउद्दीन जकरिया खुलेआम कुबाचा के प्रशासन की आलोचना किया करता था। इल्तुतमिश तथा मुल्तान के शासक कुबाचा के बीच हुए संघर्ष में शेख ने खुले आम इल्तुतमिश का पक्ष लिया। कुबाचा के पतन के बाद इल्तुतमिश ने बहाउद्दीन जकरिया को शेख - उल इस्लाम (इस्लाम का प्रमुख) विद्वान का खिताब प्रदान किया और अनुदान की व्यवस्था की। समकालीन चिश्ती संतों के विपरीत उन्होंने व्यावहारिक नीति अपनाई और काफी संपति इकट्ठी की।

उन्होंने राज्य का संरक्षण स्वीकार किया और शासक वर्ग से अपना संबंध बनाए रखा। बाद में इस संप्रदाय से कई स्वतंत्र शाखाओं का जन्म हुआ। इनमें से कुछ को 'बेशर' (अवैध संप्रदाय) भी कहा जाता था।


शेख शहाबुदीन सुहरावर्दी ने शेख बहाउद्दीन जकरिया के अलावा कई अन्य खलीफाओं (प्रमुख) शिष्य) को सुहरावर्दी के सिलसिला में प्रचार-प्रसार के लिए भारत भेजा। शेख जलालुदीन तबरीजी उन्हीं में से एक थे। दिल्ली में अपना प्रभुत्व जमाने में वह असफल रहे और बंगाल चले गए। वहाँ उन्होंने अपनी खानकाह स्थापित की और कई शिष्य बनाए। उन्होंने अपने खानकाह में लंगर (मुफ्त भोजन) की भी


व्यवस्था की। यह कहा जाता है कि बंगाल में इस्लामीकरण की प्रक्रिया में उन्होंने भूमिका निभाई। सल्तनत काल में पंजाब, सिंध और बंगाल सुहरावर्दी गतिविधि के तीन प्रमुख केंद्र थे। विद्वानों की आम राय है कि सुहरावर्दी सूफियों ने हिंदुओं को इस्लाम धर्म अपनाने को प्रेरित किया और इसमें उन्हें शासक वर्ग की सहायता मिली। इस दृष्टि से सुहरावर्दी और चिश्ती सूफियों में जमीन-आसमान का फर्क था, चिश्ती सूफियों ने अपनी शिक्षा के माध्यम से धर्म परिवर्तन करना अपना लक्ष्य नहीं बनाया। 


चिश्ती सिलसिला


सल्तनत काल में चिश्ती संप्रदाय का विकास दो चरणों में संपन्न हुआ। 1356 ई. में शेख नसीरुद्दीन (चिराग-ए दिल्ली) की मृत्यु के बाद प्रथम चरण समाप्त हुआ।

14वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में इसकी अवनति हुई। दूसरे चरण की शुरुआत 15वीं-16वीं शताब्दी में पूरे देश में इसके पुनरुत्थान और प्रसार से हुई।


पहला दौर


भारत में स्थित सूफी संप्रदायों में चिश्ती संप्रदाय सबसे लोकप्रिय था। इसका प्रारंभ हिरात में हुआ था। सीजिस्तान में जन्मे (लगभग 1141 ई.) ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती ने भारत में इस संप्रदाय की स्थापना की (मृत्यु 1236 ई.)। वे गोरी के आक्रमण के समय भारत आए। 1206 ई. में अंतिम रूप से वे अजमेर में बस गए और उन्हें मुसलमानों और गैर-मुसलमानों सभी का आदर प्राप्त हुआ।

उनके कार्यकाल का कोई प्रामाणिक दस्तावेज उपलब्ध नहीं है। बाद में, कई दंतकथाओं में उन्हें इस्लाम धर्म के उत्साही प्रचारक के रूप में दर्शाया गया। पर असलियत यह है कि उन्होंने धर्म परिवर्तन में कभी सक्रिय हिस्सा नहीं लिया और गैर-मुस्लिमों के प्रति उनका दृष्टिकोण उदारवादी था।


आने वाली शताब्दियों में अजमेर स्थित उनका मजार प्रमुख तीर्थस्थल बन गया। दिल्ली में ख्वाजा कुतबुद्दीन बख्तियार काकी (मृत्यु 1236) ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती के शिष्य थे। शेख मुइनुद्दीन चिश्ती के एक दूसरे खलीफा शेख हमीदुद्दीन नागौरी (मृत्यु 1274) ने राजस्थान में नागौर को अपनी गतिविधि का केंद्र बनाया।

शेख हमीदुद्दीन नागौरी ने नागौर में एक सिलसिला स्थापित किया और वहाँ एक साधारण राजस्थानी किसान की तरह रहने लगे। उन्होंने शासन से जुड़े लोगों के साथ संबंध नहीं रखा। वह शुद्ध रूप से शाकाहारी थे। उन्होंने और उनके उतराधिकारियों ने फारसी में लिखे पदों को स्थानीय भाषा हिंदवी में अनूदित किया, इस प्रकार का अनुवाद अभी तक हिंदुस्तान में नहीं हुआ था।


दिल्ली में ख्वाजा कुतबुद्दीन बख्तियार काकी का खलीफा ख्वाजा फरीदुद्दीन मसूद (1175- 1265) उनका उत्तराधिकारी बना। वह गंजशकर या बाबा फरीद के नाम से ज्यादा जाने जाते थे।

बाबा फरीद दिल्ली छोड़कर पंजाब में अजोधन चले गए और वहाँ खानकाह में रहने लगे। उन्होंने शासक और अमीर वर्ग से कोई संबंध नहीं रखा। नाथपंथी योगी उनकी खानकाह में आकर रहस्यवाद के स्वरूप पर बहस किया करते थे। पंजाब में उनकी लोकप्रियता का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि उनकी मृत्यु के 300 वर्ष बाद भी उनके पदों को 1604 ई. में गुरु अर्जुन सिंह ने आदि ग्रंथ में संकलित किया। पाकपाटन स्थित उनका मजार भी एक तीर्थस्थल बन गया।


बाबा फरीद के ख्यातिलब्ध और 14वीं शताब्दी के प्रमुख संत शेख निजामुद्दीन औलिया(1236-1325) को कौन नहीं जनता है। उन्होंने दिल्ली को चिश्ती संप्रदाय का केंद्र बनाया।

उनके समकालीन दो इतिहासकार जियाउद्दीन बर्नी और अमीर खुसरो ने 13वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध और 14वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में उत्तर भारत के सामाजिक और धार्मिक जीवन में उनके महत्व को रेखांकित किया। बाद में उनके उत्तराधिकारियों ने देश में विभिन्न भागों में चिश्ती संप्रदाय का प्रचार-प्रसार किया। अमीर हसन सिज्जी लिखित फवायद उल फुवाद में उनकी शिक्षा और वार्तालाप (मलफूजात) संकलित है। इसमें दार्शनिक और रहस्यात्मक बातों का समावेश नहीं है, बल्कि इसमें सूफी मत के व्यावहारिक पक्ष का उल्लेख किया गया है।


शेख निजामुद्दीन औलिया के जीवन काल में एक के बाद एक सात शासक दिल्ली सल्तनत की गद्दी पर बैठे।

पर उन्होंने हमेंशा शासकों और अमीरों से छू रहने की कोशिश की और कभी किसी शासक के दरबार में पैर नहीं रखा। उनकी खानकाह के लंगर (मुफ्त भोजन व्यवस्था) का द्वार हिंदुओं और मुसलमानों के लिए समान रूप से खुला रहता था। अपनी खानकाह में वे अनेक नाथपंथी योगियों से शास्त्रार्थ और वार्तालाप करते थे। योग के कई अभ्यासों पर उनकी पकड़ थी और योगी उन्हें सिद्ध (संपूर्ण) कहा करते थे। अमीर खुसरो (1253-1325) शेख निजामुद्दीन औलिया का परम शिष्य था।


शेख निजामुद्दीन औलिया के कई आध्यात्मिक शिष्य या खलीफा हुए।

शेख बुरहानुद्दीन गरीब (मृत्यु 1340 ई.) उनमें से एक था। मुहम्मद तुगलक ने उन्हें दक्कन जाने को मजबूर किया। उन्होंने दौलताबाद को अपना केंद्र बनाया और वहाँ चिश्ती संप्रदाय का प्रचार-प्रसार किया।


दिल्ली में शेख नसीरुद्दीन महमूद (मृत्यु 1356 ई.) शेख निजामुद्दीन औलिया के प्रमुख खलीफा और उत्तराधिकारी थे। उन्हें चिराग-ए दिल्ली (दिल्ली का दीप) के नाम से जाना जाता था। उन्होंने और उनके शिष्यों ने चिश्ती संप्रदाय की उन प्रथाओं को छोड़ दिया, जो कट्टरपंथी इस्लाम के साथ टकराती थी। दूसरी तरफ उन्होंने उलेमा से अनुरोध किया कि चिश्ती संप्रदाय की प्रमुख प्रथा समा के प्रति अपना कड़ा रुख नरम कर लें।