भारत में अरबों की अस्थायी सफलता - Temporary success of Arabs in India
भारत में अरबों की अस्थायी सफलता - Temporary success of Arabs in India
भारतीय इतिहास के अधिकांश विद्वानों की धारणा है कि भारत में अरब राज्य कोई स्थाई प्रभाव डालने में समर्थ नहीं हुआ। यह सत्य है कि अरबवासियों का प्रभाव क्षेत्र पर्याप्त समय तक सिंध तथा मुल्तान तक ही सीमित रहा एवं वे उससे आगे नहीं बढ़ पाए। भारत के अन्य प्रदेशों को अम्बवासियों का आक्रमण तथा उनकी सिंध विजय बिल्कुल भी प्रभावित नहीं कर सके। सिंघ की विजय तत्कालीन इतिहास में एक कथा मात्र थी। इस विशाल देश के बहुत छोटे से भाग पर इसका प्रभाव पड़ा। सर स्टैनली लेनपून के अनुसार, "अरबवासियों ने सिंध प्रदेश पर अधिकार किया,
परंतु यह विजय भारत तथा इस्लाम के इतिहास में एक कथा मात्र थी। यह एक ऐसी विजय थी, जिसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा।" प्रसिद्ध इतिहासकार टाड का कथन है कि इस विजय का भारत पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ा। इसके द्वारा संपूर्ण भारतवर्ष में हलचल सी मच गई। किंतु टाड का कथन सत्य से परे है। अरबवासियों का विस्तार राजस्थान से आगे नहीं हो पाया और शेष भारत में पूर्ववत कार्य चलता रहा। इसके अतिरिक्त सिंध प्रदेश पर मुसलमानों का अधिकार हो जाने से भी भारतीयों के सामने विशेष भय एवं संकट उपस्थित नहीं हुआ। उन्होंने इस प्रदेश से अरबवासियों को निकालने के लिए बिल्कुल भी प्रयास नहीं किया। वे उसको केवल एक प्रादेशिक घटना के रूप में मानते थे। अरबों की असफलता के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं-
(1) भारतीय सभ्यता का उन्नत होना भारतवासियों की सभ्यता एवं संस्कृति अरबवासियों की सभ्यता एवं संस्कृति की अपेक्षा बहुत उन्नत थी। भारतीय सभ्यता पर अरबों का किसी भी प्रकार का प्रभाव नहीं पड़ा। ब्राह्मणों ने हिंदुओं की रक्षा की और उनको इस्लाम धर्म में विलीन नहीं होने दिया।
(2) मुहम्मद-बिन-कासिम की असामयिक मृत्यु
मुहम्मद बिन कासिम की असामयिक मृत्यु से अरबवासियों को गहरा आघात पहुँचा। उनकी शक्ति शिथिल हो गई और राजपूतों ने उनको आगे नहीं बढ़ने दिया।
योग्य सेनापति के अभाव में मुसलमानों का भारत विजय का कार्य रुक गया। अन्य प्रदेशों के राजपूत बड़े शक्तिशाली थे। वे सदा भीषण संग्राम के लिए उद्यत रहते थे।
(3) भारत का छोटे-छोटे राज्यों में विभाजन
भारत छोटे-छोटे राज्यों में विभाजित था। आक्रमणकारियों को उनके राज्यों पर अधिकार करने के लिए अलग-अलग राज्यों से युद्ध करना पड़ता था, जिससे उनकी शक्ति क्षीण होते चली गई। अरबवासी अपने मूल प्रदेश से दू हटते जाते थे। वह किसी भी युद्ध में पूर्ण विजयी नहीं बन सके, जिससे अधिकांश भारत उनके हाथ में नहीं आया अन्यथा उनकी शक्ति भारत में दृढ़ हो जाती।
(4) खलीफाओं की उदासीनता
प्रारंभ में खलीफा ने मुहम्मद बिन कासिम की सेना को दृढ एवं सुसज्जित करने में बहुत अधिक सहायता प्रदान की, किंतु कुछ समय उपरांत जब खलीफा के पद में परिवर्तन हो गया तो उसने उसकी सहायता से हाथ खींच लिया। खलीफा के ही आदेश के द्वारा मुहम्मद बिन कासिम का वध कर दिया गया।
(5) सिंध की आर्थिक स्थिति
सिंध प्रदेश आर्थिक दृष्टि से उन्नत नहीं था। उसकी आर्थिक स्थिति बड़ी डावांडोल थी। अरबवासियों को सिंध विजय के उपरांत सामग्री व अन्य साधनों के अभाव का अनुभव करना पड़ा।
खलीफा व अन्य पदाधिकारियों को इस विजय से आर्थिक लाभ प्राप्त नहीं हुआ, जिसके कारण वे इस प्रदेश के प्रति उदासीन बन गए। इसके अतिरिक्त सिंध को आधार बनाकर शेष भारत पर विजय करना बहुत कठिन कार्य था, क्योंकि रास्ते में राजस्थान का मरूस्थल पड़ता था, जिसको पार करना असंभव था। यदि अरबवासी किसी अन्य मार्ग से भारत में प्रविष्ट हुए होते तो उनको भारत के अन्य शक्तिशाली राज्यों का सामना करना पड़ता और उनका सामना करने में वे सक्षम नहीं थे।
(6) प्रशासन के प्रति अनभिज्ञता
अरनवासी प्रशासनिक व्यवस्था से अनभिज्ञ थे। वे भारत में निवास करने लगे किंतु उन्होंने शासन व्यवस्था की ओर ध्यान नहीं दिया,
जिससे सुदृढ शासन की स्थापना करना कल्पना मात्र ही रहा। उत्तम प्रशासन की स्थापना तभी संभव है जब संगठन का कार्य विजय के साथसाथ चलता रहे।
(7) नियंत्रण का अभाव
सिंध के शासकों पर खलीफा तथा अन्य पदाधिकारियों का नियंत्रण नाम मात्र का था। इस पर बगदाद से उचित नियंत्रण रखना नितांत असंभव था। अतः ये लोग स्वतंत्र रूप से शासन करने लगे जिसका प्रभाव हितकर नहीं हुआ। यदि लोग खलीफा के अधीन रहकर शासन कार्य करते तो खलीफा उनकी ओर उदासीन नहीं होते और उनकी सहायता करते रहते।
(8) धार्मिक उत्साह का अभाव
खलीफाओं में धार्मिक उत्साह का अंत हो गया था। वे अन्य राजाओं की भाँति विलासी जीवन व्यतीत करने लगे थे जिससे उनका नैतिक पतन होने लगा और शासन में दुर्बलता के चिह्न उत्पन्न होने लगे। यह भी अरबों की असफलता का एक प्रमुख कारण है।
(9) खिलाफत का अंत
मध्य एशिया में तुर्की की शक्ति के उदय होने से शासक अवनति की ओर अग्रसर होने लगे और खिलाफत का अंत हो गया। शासन सत्ता पर तुर्कों का अधिकार हो गया।
इसका प्रभाव सिंध पर भी पड़ा। अरब के शासकों का ध्यान मुख्यतः अपनी स्थिति सुदृढ बनाने में लगा रहा। उनका सारा समय और पूरा प्रयास इसी समस्या पर केंद्रित रहा कि वे किसी प्रकार तुर्कों की बढ़ती शक्ति से अपने को सुरक्षित रख सकें। उन्होंने सिंध की ओर बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया।
अतः यह स्वीकार करना होगा कि सिंध विजय का भारत पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा और न ही उनका राज्य भारत में स्थाई रूप धारण कर सका। अरब देश व भारत की सभ्यता व संस्कृति स्थाई रूप से अधिक समय तक देश के अन्य भागों में एक दूसरे के संपर्क में नहीं रह सके। इस प्रकार अरबों की सिंध विजय अस्थायी एवं प्रभाव रहित रही।
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