सती प्रथा - tradition of Sati
सती प्रथा - tradition of Sati
सुलेमान सौदागर के वृत्तान्त से प्रतीत होता है कि सम्भवतः उस युग में सती प्रथा का विशेष प्रचार न था। उसका कथन है कि कभी-कभी राजा की चिता में उसकी रानियाँ कूदकर अपने प्राण विसर्जित करती थीं, किन्तु ऐसा करना अथवा न करना उनकी इच्छा पर निर्भर था। अलबरूनी इस कथन का खंडन करता है। उसका लेख है कि रानियाँ चाहे अथवा न चाहें, उन्हें राजा के साथ सती होना ही पड़ता था।
डॉ. अल्तेकर का कथन है कि 700 ई. से 1200 ई. तक के युग में कश्मीर के अतिरिक्त उत्तरी भारत में सती प्रथा के लिखित उदाहरण बहुत कम हैं। यद्यपि उस युग के शिलालेखों का बाहुल्य है, किन्तु उनमें सती प्रथा के प्रचार का निर्देश नहीं मिलता है। प्रतिहार, परमार, चेदि तथा चन्देल शिलालेख इस संबंध में मौन हैं यद्यपि उनमें पराजित शत्रुओं की पत्नियों के दुर्भाग्य का विविध रूप से वर्णन है। धंगदेव के खजुराहो शिलालेख में कांजी, अंग, आन्ध्र तथा राधा देश की रानियों का उल्लेख है कि यशोवर्मन ने उनके राजाओं को पराजित करके उन्हें कारागार में डाल दिया था।
उसी नरेश के ननयोरा ताम्रलेख में भी पराजित शत्रुओं की पत्नियों का उल्लेख है कि उनके विहर की अग्नि निरन्तर अश्रुवर्षा से शांत न होती थी। केवल गांगेयदेव का ही एक उदारहण है कि मोक्ष की अभिलाषा से उसने अपनी सौ रानियों के साथ प्रयाग में अक्षयवट के नीचे प्राण विसर्जित किये थे। किन्तु जिस विवरण के साथ इस घटना का उल्लेख है, उससे स्पष्ट है कि गांगेयदेव की रानियों ने सती संस्कार नहीं किया, यद्यपि उन्होंने राजा के साथ धार्मिक भावना से प्रेरित होकर प्राण विसर्जित किये। इससे स्पष्ट है कि सतीप्रथा का प्रचार उस युग में न था।
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