विभाजन की त्रासदी और स्त्री पर उसका प्रभाव - Tragedy of Partition and its impact on women

विभाजन की त्रासदी और स्त्री पर उसका प्रभाव - Tragedy of Partition and its impact on women


विभाजन की त्रासदी का सबसे सांघातिक प्रभाव स्त्रियों पर पड़ा। इतिहास की किसी भी घटना का प्रभाव जेंडर कारणों से स्त्रियों और पुरुषों पर अलग-अलग पड़ता है। पुरुषों पर की जाने वाली और स्त्रियों पर की जाने वाली हिंसा में अंतर होता है। पुरुषों पर जहाँ मारपीट, हत्या, अंग-भंग इत्यादि होती है तो स्त्रियों पर इनके साथ-साथ अपहरण, दासीत्व, एकल/ सामूहिक बलात्कार, गर्भवती महिलाओं के भ्रूण की हत्या, पति एवं बच्चों की हत्या कर उन्हें निराश्रित कर देना इत्यादि । किसी भी जातिवादी, सांप्रदायिक, कबीलाई दंगों-फसादों में खियाँ इसी तरह की कुछ अलग किस्म की जेंडर हिंसा की शिकार होती हैं। भारत विभाजन दुनिया की एक बड़ी त्रासदी मानी जाती है।

इसे एक भयंकर त्रासदी बनाने में स्त्रियों पर हुई हिंसा का एक बड़ा हाथ है। स्त्रियों पर हिंसा यौन हिंसा के जितने रूप यहाँ मिले, वे आज तक अन्यत्र कहीं नहीं देखे गए। भारत-विभाजन के समय स्त्रियों पर हुई व्यापक क्रूर हिंसा आज भी बहस और विचार का मुद्दा बना हुआ है।


विभाजन के दौरान स्त्रियों पर हुई हिंसा, अत्याचार, यौन हिंसा, जेंडर के आधार पर हुए अत्याचार अन्याय इत्यादि को निम्नलिखित बिंदुओं में निबद्ध किया जा सकता है-


1. विभाजन के दौरान ऑनर किलिंग के दृश्य भी दिखाई दिए थे। ये हिंदुस्तान में नए युग के ऑनर किलिंग के उदाहरण माने जा सकते हैं।

इसके अंतर्गत इस आशंका के डर से कि हमारे घर की औरतें कहीं किसी विधर्मी के हाथ न पड़ जाएँ, घर वालों ने खुद अपने घर की स्त्रियों को मौत की नींद सुला दिया। सलिल मिश्र ने अपने लेख 'The tregedy of Partition' में लिखा है, "पितृसत्तावादियों ने अपने घर की औरतों को, किसी और के द्वारा बेइज्ज्त हो जाने से बचाने के लिए स्वयं ही मौत के घाट उतार दिया। उन्हें अपने घर की औरतों को मार देना एक मात्र सम्मानजनक विकल्प लगा होगा!" उर्वशी बुटालिया ने मौखिक इतिहास-पद्धति पर लिखी गई 


अपनी किताब 'The Other Side of Silence: Voices from the Partition of India' में अपने घर की स्त्रियों को अपने ही घर के लोगों द्वारा मार दिए जाने का विस्तार से विवेचन किया है।

Scroll.In पर प्रकाशित अपने एक लंबे साक्षात्कार 'Men killed their own women and children during Partition, but freedom overshadowed that horror' में उन्होंने लिखा, “पुरुषों को इस बात का डर था कि जब वे बचकर भाग रहे होंगे, घोड़ों पर चढ़ रहे होंगे, हथियार चला रहे होंगे, तेजी से निकल जा रहे होंगे; तब स्त्रियाँ और बच्चे ऐसा नहीं कर सकेंगे।" उर्वशी बुटालिया ने अपनी इसी किताब में इस तथ्य को भी रेखांकित किया कि अपने घर की सियों को अपने ही घर के लोगों द्वारा मार दिए जाने का एक कारण यह भी रहा कि स्त्रियों को अपनी कौम / समाज/ समुदाय की प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता रहा है. यह प्रतिष्ठा बची रहे, इसलिए दूसरी कौम / समुदाय/समाज के लोगों के हाथ वे न पड़े, इसलिए उन्हें खुद मार देना ही सबसे उचित है। उन्होंने कहा, "स्त्रियाँ अपने समुदाय की प्रतिष्ठा की प्रतीक मानी जाती रही हैं। आज भी मानी जाती हैं। मुसलमानों की अपेक्षा हिंदुओं और सिखों में यह अधिक देखा जाता है। उन लोगों को डर था कि उनकी औरतें अपहृत की जा सकती हैं, उनका बलात्कार हो सकता है, जिसके परिणामस्वरूप वे दूसरे समुदाय के रक्त से संक्रमित हो सकती हैं।” (वही)


2. स्त्रियों को अपनी जाति की अस्मिता या इज्जत का प्रतीक माना जाता है। ऐसी वैचारिक मान्यता परंपरागत रूप से प्रायः हर समाज में पाई जाती है कि किसी समाज से बदला लेना है या उसे कोई सबक सिखाना है या उसे उसके किए की सजा देनी है, तो उस समाज की स्त्रियों को कुचलना, उन पर अत्याचार, हिंसा, उन्हें ठिकाने लगाना शुरू कर दो; वह समाज खुद-ब-खुद तुम्हारे अंकुशतले आ जाएगा! इस आधार पर हिंदू और मुसलमान दोनों समुदायों के धार्मिक और सांप्रदायिक रूप से वहशी हुए पुरुषों ने विधर्मी समुदाय की स्त्रियों पर भरपूर और भयंकर यौन हिंसा की। इसमें बलात्कार सबसे जघन्य हिंसा थी। यह क्रम दरअसल इस प्रकार हुआ- पहले धर-पकड़ फिर अपहरण, फिर बलात्कार और फिर अंत में हिंसा की इतेहा के रूप में कहीं- कहीं उसकी हत्या !

इस प्रक्रिया से विधर्मी समुदाय के साथ बदला पूरा हुआ लगभग 70,000 स्त्रियों के साथ यह सब हुआ। सलिल मिश्र ने अपने उक्त लेख 'The tregedy of Partition' में एक स्थान पर लिखा है, "लगभग 70,000 त्रियाँ पकड़ी गई, उनका अपहरण हुआ और फिर बलात्कार हुआ। दूसरे धर्म की स्त्री का अपहरण, उस धार्मिक समुदाय से बदला, बदला लेने का एक मान्य रास्ता बन गया था।" उर्वशी बुटालिया ने भी अपनी किताब 'The Other Side of Silence: Voices from the Partition of India' में इस तथ्य को रेखांकित किया है। उन्होंने लिखा है कि स्त्रियाँ अपने समुदाय की प्रतिष्ठा की प्रतीक मानी जाती रही हैं. आज भी मानी जाती हैं। कुछ लेखक / इतिहासकार ऐसी स्त्रियों की संख्या 1,00,000 तक मानते / मानती हैं ।


3. भारत विभाजन में जनसंख्याओं के विस्थापन की परिघटना में स्त्रियों के साथ कई अमानवीय और क्रूर मज़ाक हुए। ऊपर जिन अपहृत स्त्रियों की चर्चा हुई, उनके साथ एक के बाद एक कई ज्यादतियाँ हुई। जिन स्त्रियों का अपहरण किया गया था, उनका उनके अपहर्ताओं के साथ शादी करा दिया गया। धीरे-धीरे जब इन स्त्रियों ने अपने नए घरों और माहौल में स्वयं को किसी भी तरह व्यवस्थित कर लिया; तो इन दोनों देशों की सरकारों ने अपनी-अपनी स्त्रियों को अदला- बदली करते हुए वापस लेने का निर्णय लिया। सोचा जा सकता है कि यह निर्णय कितना अमानवीय और अपमानजनक रहा होगा। सलिल मिश्र ने स्त्रियों की इस अदला-बदली की तुलना दो देशों के युद्धबंदियों की अदला-बदली से की है। इस सारी कार्रवाई का असर इन स्त्रियों की मानसिकता पर बहुत घातक रूप में पड़ा।

ये स्त्रियाँ दो-दो बार अपने स्थानों से विस्थापित हुईं। पहले तो अपने मूल घरों से और फिर उस परिवेश से जिसे उन्होंने (अपहरण और अपहरणकर्ता के साथ विवाह के बाद) अपना लिया था। अपने माथे पर अपहरण और बलात्कार का कलंक ओढ़े इन औरतों को अपने मूल घरों में पुनः खपने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। अनेक लोगों ने उन्हें स्वीकार ही नहीं किया। अनेक कहाँ बिला गई, पता ही नहीं चला। विभाजन की त्रासदी का यह वह कहर है, जो केवल औरत पर टूटा |


4. स्त्रियों के इस दुतरफ़ा विस्थापन और अपनी जड़ों से उखड़ने की त्रासदी भारत विभाजन की एक शर्मनाक परिघटना के रूप में सामने आती है।

दोनों देशों की सरकारों द्वारा स्त्रियों की अदला- बदली एक हास्यास्पद कदम तो था ही, यह स्त्रियों के लिए एक नई लाइलाज़ समस्या लेकर उपस्थित हुआ। ऊपर कहा गया कि जब ये स्त्रियाँ अपने स्वदेश मूल घरों पर पहुँचीं तो इनके घरवालों ने इन्हें स्वीकार नहीं किया। सोचने की बात है कि ये खियाँ फिर कहाँ गई होंगी! हो सकता है, कुछ ने कुएँ में छलाँग लगा ली हो, किसी ने रेल के नीचे कटकर जान दे दी हो, कोई अपना मानसिक संतुलन खो बैठी हो और पागलखाने पहुँच गई हो, या किसी ने कुछ लिया हो ! यानी कि यह एक बड़ी भयावह स्थिति थी। उस समय के साहित्य में यह यथार्थ सशक्त रूप से चित्रित हुआ है। इस संबंध में सआदत हसन मंटो की कहानियाँ देखी जा सकती और कर


विस्थापित और लौटी हुई स्त्रियों के साथ घरवालों का यह व्यवहार कितना अमानवीय और बर्बर था,

इसकी भनक इस बात से भी मिलती है कि उस समय महात्मा गांधी और प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू दोनों ने अपने-अपने स्तर पर इस प्रवृत्ति की आलोचना की थी। गांधीजी ने 7 दिसंबर, 1947 ई. की प्रार्थना सभा में हिंदू और सिख परिवारों और समुदायों द्वारा विभाजन के दंगों में अपहरण/ बलात्कार की शिकार हुई स्त्रियों के पाकिस्तान से प्रत्यावर्तन के उपरांत अंगीकार न किए जाने के मुद्दे पर बोलते हुए कहा था- "वह पति बर्बर है और वे माँ-बाप बर्बर हैं, जो अपनी पत्नी पुत्री को वापस अपना नहीं रहे हैं। इसमें मेरे विचार से उस स्त्री का कोई क़सूर नहीं है। वे तो हिंसा की शिकार हुई हैं। इन स्त्रियों पर कलंक लगाना और इन्हें समाज में स्वीकार- योग्य न मानना अन्यायपूर्ण है ।" इसी तरह जवाहरलाल नेहरू ने जनवरी, 1948 को लगभग ऐसी ही एक अपील की, "यह एक बहुत ही आपत्तिजनक और ग़लत रवैया है, जो सामाजिक रीति-रिवाज़ इसका समर्थन करते हैं, वह भर्त्सनीय है। इन स्त्रियों को हमारे कोमल और प्यार भरे संरक्षण की जरूरत है।" (वही)


असल में अपहृत स्त्रियों के लौटने के मामले में जेंडर के आधार पर दोहरा मापदंड अपनाया गया। तहमीना खान ने The Express Tribune (Blogs ) में 13 अगस्त, 2015 ई. को प्रकाशित अपने लेख 'End of silence: A woman's narrative of the 1947 Partition Abducted Person's (Recovery and Restoration) Act 1949 का संदर्भ लेते हुए यह लिखा था, “16 वर्ष से ऊपर के पुरुषों को यह विकल्प दिया गया था कि वे अभी जहाँ हैं, वहाँ चाहें तो रह सकते हैं, लेकिन स्त्रियों पर राज्य द्वारा इसे थोप दिया गया था, उन्हें यदि उनके कोई बच्चे हैं तो उन्हें वहीं छोड़कर आने को कहा गया। यदि वे गर्भवती थीं तो बावजूद इसके कि गर्भपात गैर-कानूनी था, उनका गर्भपात कराया गया।"


5. विभाजन के समय अपनी स्त्रियाँ विधर्मियों के हाथ न पड़ जाएँ, इसके लिए स्त्रियों द्वारा सामूहिक आत्महत्या की घटनाओं के उदाहरण भी इतिहास में मिलते हैं।

इन स्त्रियों के सामूहिक आत्महत्या के इस निर्णय के पीछे कौन थे, इस बारे में मतैक्य नहीं है। विधर्मियों के हाथ में पड़ने के क्या दुष्परिणाम होते हैं, इस पर ऊपर चर्चा की गई। यौन हिंसा, बलात्कार, जबरन विवाह के अतिरिक्त धर्म-परिवर्तन एक बड़ी परिघटना के रूप में सामने आया। विवाह के लिए स्त्री का धर्म बदलवाना जरूरी था। धर्म-परिवर्तन विधर्मी पर वर्चस्व के प्रतीक की तरह प्रचलित हुआ। विधर्मियों की स्त्रियों का अपहरण करना. फिर उनसे विवाह करने के लिए उनका धर्म-परिवर्तन कराना; यह एक निरंतर चलने वाला सिलसिला था। यह नौबत न आए, इसलिए स्त्रियों द्वारा सामूहिक आत्महत्या के क़दम उठाने के उदाहारण पाए जाते हैं। अन्वेषा सेनगुप्ता ने अपने एक लेख “Looking Back at Partirion and Women: A Factsheet" में इस तथ्य का विश्लेषण किया है।

उन्होंने लिखा है कि स्त्रियाँ अपने व्यवहार द्वारा पितृसत्तात्मकता का अंतर्निर्वहन करती देखी जाती हैं। अपने धर्म की पवित्रता और विशुद्धता को बचाए रखने के सिलसिले में स्त्रियों ने सामूहिक आत्महत्याएँ कीं । अन्वेषा सेनगुप्ता ने इसका एक उदहारण देते हुए लिखा है कि रावलपिंडी के पास के थोया खालसा नामक गाँव में कोई 96 स्त्रियों ने इस डर से कि कहीं उनका धर्म परिवर्तन न हो जाए, कुएं में कूदकर अपनी जान दे दी।


6. विभाजन के परिणामस्वरूप शरणार्थी समस्या उत्पन्न हुई। इसमें पुरुष शरणार्थी भी थे तथा महिला शरणार्थी भी, लेकिन जेंडर के आधार पर दोनों की समस्याएँ, पीड़ाएँ एक-दूसरे से भिन्न थीं । अन्वेषा सेनगुप्ता ने अपने उक्त लेख में भारत राज्य द्वारा पंजाब और बंगाल के शरणार्थियों के लिए अलग-अलग मानदण्ड अपनाए जाने का हवाला दिया है। उन्होंने लिखा है कि बंगाल की बजाय पंजाब के शरणार्थियों को सरकार ने ज्यादा महत्व दिया था। इन दोनों क्षेत्रों की महिला शरणार्थियों के बीच भी विभेद किया जाता था। जैसे कि पंजाब की महिला शरणार्थियों को भत्ते के बतौर 20 रुपए मिलते थे, जबकि बंगाल की महिला शरणार्थियों को मात्र 12 रुपए मिलते थे।