पेरिस शांति सम्मेलन में संपन्न संधियाँ - treaties concluded at the Paris Peace Conference
पेरिस शांति सम्मेलन में संपन्न संधियाँ - treaties concluded at the Paris Peace Conference
पेरिस शांति सम्मेलन में काफी मशक्कत के पश्चात पाँच पराजित राष्ट्रों के साथ पाँच पृथक-पृथक संधियाँ संपन्न की गई-
(i) 28 जून, 1919 ई. जर्मनी के साथ वर्साय की संधि (ii) 10 सितंबर, 1919 ई. आस्ट्रिया के साथ सेंट जर्मन की संधि (iii) 27 नवंबर, 1919 ई. बल्गारिया के साथ न्यूली की संधि (iv) 4 जून, 1920 ई. हंगरी के साथ ट्रियानो की संधि (v) 10 अगस्त, 1920 ई. टर्की के साथ सेब्रे की संधि
23 जुलाई, 1923 ई. टर्की के साथ लूसान की संधि (एक बार पुनः) इस प्रकार हम देखते हैं कि प्रथम विश्वयुद्ध 28 जुलाई, 1914 से 11 नवंबर, 1918 तक लगभग 4 वर्ष चला।
परंतु शांति संधियों को संपन्न करने में पूरे 5 वर्ष लग गए।
उक्त सभी संधियाँ पेरिस संधियाँ कही जाती हैं। इन सभी संधियों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण जर्मनी के साथ की गई वर्साय की संधि थी।
अब हम उक्त सभी संधियों की विस्तृत विवेचना प्रस्तुत करेंगे।
वर्साय की संधि, 28 जून, 1919 ई.
मित्र राष्ट्रों द्वारा पेरिस शांति सम्मेलन में 28 जून, 1919 ई. को वर्साय की संधि संपन्नकी गई।
संपूर्ण विश्व के इतिहास में वर्साय की संधि सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। इस संधि की पृष्ठभूमि में एक लंबा इतिहास था और इस संधि ने आगामी एक लंबे इतिहास का आधार तैयार किया। इस संधि का प्रारूप इस प्रकार बना।
• 4 माह तक गहन विचार विमर्श के उपरांत 6 मई, 1919 ई. को इसका अंतिम प्रारूप तैयार किया गया।
इस संधि मसौदा में कुल 230 पृष्ठ थे। यह 15 भागों में विभक्त थी। इसमें 439 अनुच्छेद (धाराएँ) थे एवं कुल 80,000 शब्द थे।
• 20 अप्रैल, 1919 ई. को विदेश मंत्री ब्रोकडर्फि रान्टाजू के नेतृत्व में एक जर्मन प्रतिनिधिमंडल वर्साय
पहुँच गया था। इन्हें ट्रायनन पैलेस होटल में ठहराया गया था ।
• 7 मई, 1919 ई. को संधि का मसौदा जर्मन प्रतिनिधियों को सौंप दिया एवं इस पर विचार विमर्श हेतु 2
सप्ताह का समय उन्हें दिया।
संपूर्ण जर्मनी में संधि की शर्तों का घोर विरोध हुआ।
• ब्रोकडर्फि ने कहा युद्ध की सारी ज़िम्मेदारी जर्मनी पर लादना न्यायसंगत नहीं है।
• जब इन्होंने संधि पर हस्ताक्षर करने में ना-नुकर की तो सिंह गर्जना करते हुए लायड जार्ज ने कहा- जर्मन लोग कहते हैं कि वे संधि पर हस्ताक्षर नहीं करेंगे। जर्मनी के समाचार पत्र एवं राजनीतिज्ञ भी यही बात कहते हैं।
लेकिन हम लोग कहते हैं- “महानुभावो! आपको इस पर हस्ताक्षर करना है। अगर आप वर्साय में ऐसा नहीं करते हैं तो आपको बर्लिन में करना ही पड़ेगा।"
• जर्मन राजनीतिज्ञों ने 26 दिन बाद 60 हजार शब्दों का एक विरोध पत्र सौंपा।
• मित्र राज्यों ने जर्मन प्रस्तावों पर विचार-विमर्श कर संधि प्रस्ताव पर छोटे-मोटे संशोधन किए।
संशोधित संधि प्रस्ताव युद्ध की चुनौती के साथ दिन में हस्ताक्षर करने हेतु जर्मनी को सौंपा गया।
• शिंडेमान सरकार ने संधिको अस्वीकार कर त्यागपत्र दे दिया।
● जर्मनी में नई सरकार बनी, गुस्टावजौर प्रधानमंत्री एवं मूलर विदेश मंत्री बना।
सेराजेवो हत्याकांड के दिन 28 जून, 1919 (5 वर्ष बाद) जर्मन प्रतिनिधियों ने संधि मसौदा पर हस्ताक्षर कर दिए।
वर्साय की संधि की प्रमुख धाराएँ
वर्साय की संधि की प्रमुख धाराएँ निम्न थीं- (i) प्रादेशिक व्यवस्थाएँ-
1. अल्सास लौरेन फ्रांस को दे दिए गए।
2. जर्मन सीमा पर स्थित मेलमिडे और यूपेन बेल्जियम को दिए।
3. खनिज संपदा से भरपूर सार घाटी दोहन हेतु 15 वर्ष के लिए फ्रांस को दी गई, नियंत्रण राष्ट्रसंघ का रहेगा एवं एक आयोग शासन चलाएगा। 15 वर्ष बाद जनमत संग्रह द्वारा सार बासी निर्णय करेंगे कि जर्मनी, फ्रांस राष्ट्र संघ किसके साथ रहें।
4. जर्मनी अधिकृत श्लेसविग में जनमत संग्रह किया गया उसके आधार पर उत्तरी श्लेसविग डेनमार्क को, दक्षिणी श्लेषविग जर्मनी को दिया गया।
5. जर्मनी को पूर्वी सीमा पर सर्वाधिक नुकसान हुआ। जर्मनी, आस्ट्रिया, रूस के पोल क्षेत्रों को लेकर स्वतंत्र पोलैंड का निर्माण, समुद्र तट स्थापित करने के लिए जर्मनी का डेनजिंग बंदरगाह पोलैंड को दिया।
6. जर्मनी का वाल्टिक सागर तट पर स्थित मेमल बंदरगाह राष्ट्रसंघ को दिया, ताकि वह लिथुआनिया को स्थानांतरित किया जाए।
7. नवनिर्मित राष्ट्र बेल्जियम, पोलैंड, चेकोस्लोवाकिया की स्वतंत्रता और प्रभुसत्ता को जर्मनी ने मान्यता दी।
8. चेकोस्लोवाकिया को उपरी साइलेशिया का छोटा क्षेत्र दिया।
9. जर्मन उपनिवेश ब्रिटेन, फ्रांस, जापान, आस्ट्रिया, न्यूजीलैंड, बेल्जियम ने बाँटे।
10. ब्रेस्ट लिटोवस्क संधि द्वारा जर्मनी ने एक बड़ा भाग रूस से छीन कर अपने राज्य में मिला लिया वर्साय संधि द्वारा इस भाग पर लैटविया, एस्टोनिया, लिथुआनिया की स्थापना की गई।
(ii) सैनिक व्यवस्थाएँ-
1. अनिवार्य सैनिक सेवा समाप्त की गई।
2. स्थल सेना । लाख निर्धारित, अधिकारियों को कम से कम 25 वर्ष तथा सैनिकों को 12 वर्ष सेना में रहना पड़ेगा।
3. गोला बारूद, अस्त्र-शस्त्र सीमित किए एवं निर्यात प्रतिबंधित किया।
4. जर्मनी अब वायुसेना नहीं रखेगा।
5. नौसेना सीमित 6 युद्धपोत, 6 लड़ाकू विमान, 12 तोपची जहाज, पनडुब्बी नहीं एवं 15,000 सैनिक अधिकारियों सहित।
(iii) अन्य व्यवस्थाएँ -
1. नदियाँ एल्व, ओडर, नीमन, डेन्यूब अंतरराष्ट्रीय घोषित ।
2. कील नहर और इसके मार्गों को सब राष्ट्रों के लिए खोला गया।
3. विलियम II पर घोर अपराध का अभियोग। नीदरलैंड ने उसे सौंपने से इनकार किया अतः मुकदमा न चल सका।
4. जर्मनी को प्रथम विश्वयुद्ध का उत्तरदायित्व स्वीकार करना पड़ा।
5. क्षतिपूर्ति आयोग का गठन
6. युद्ध में नष्ट हुए प्रदेशों के पुनर्निर्माण के लिए जर्मनी फ्रांस, इटली, बेल्जियम, लक्झमवर्ग को कोयला देगा, फ्रांस को अमोनियम सल्फेट कोलतार आदि देगा।
7. क्षतिपूर्ति राशि का अंतिम निर्णय होने तक जर्मनी 1921 तक 5 अरब डालर देगा।
8. संधि शर्तों को पूरा करने के लिए कुछ गांरटियों की भी व्यवस्था की गई। राइन के पश्चिम क्षेत्र पर संधि लागू होने के बाद आगामी 15 वर्षों तक मित्र राष्ट्रों की सेनाओं का अधिकार रहेगा। यदि जर्मनी शर्तों का निष्ठापूर्वक पालन करता है तो 5 वर्ष बाद कोलोन क्षेत्र, 10 वर्षों बाद कोबलेंज क्षेत्र, 15 वर्ष बाद मेंज तथा अन्य अधिकृत जर्मन क्षेत्रों से सेना हटा ली जाएगी।
वर्साय की संधि का आलोचनात्मक मूल्यांकन
वर्साय की संधि की प्रायः अधिकांश विद्वानों ने आलोचना की है। भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, जिन्हें इतिहास में विशेष रुचि थी ने वर्साय की संधि पर इन शब्दों में आलोचनात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त की है- "मित्र राष्ट्र घृणा और प्रतिशोध की भावना से भरे हुए थे वे माँस का पिण्ड ही नहीं चाहते थे, बल्कि जर्मनी के अर्द्धमृत शरीर से रक्त की आखिरी बूंद तक खींच लेना चाहते थे।” वर्साय की संधि का आलोचनात्मक अध्ययन निम्नलिखित बिंदुओं के आधार पर किया जा सकता है।
• इटली को आस्ट्रिया से दक्षिण टायरल, ट्रेंटिनो, ट्रीस्ट, इरिट्रिया, एवं डालमेशिया के तटवर्ती कुछ द्वीप प्राप्त हुए।
• चेकोस्लोवाकिया को वोहीमिया, मोराविया, आस्ट्रियन, साइलेशिया का अधिकांश भाग और आस्ट्रिया के दक्षिणी क्षेत्र का कुछ भाग प्राप्त हुआ।
पोलैंड को मलेशिया का क्षेत्र प्राप्त हुआ।
रूमानिया को वोकोविनया का प्रदेश प्राप्त हुआ।
• यूगोस्लाविया को डालमेशिया, बोस्निया हर्जेगोविना आदि क्षेत्र प्राप्त हुए। इस प्रकार अब आस्ट्रिया का क्षेत्रफल सिमटकर छोटा सा बचा और आबादी मात्र सत्तर लाख रह गई।
इस संधि के अनुसार आस्ट्रिया को बाध्य किया गया कि वह युद्ध की जिम्मेदारी स्वीकार करे और इसके लिए जर्मनी की तरह एक बहुत बड़ी रकम मित्र राष्ट्रों को हर्जाने के रूप में दे।
आस्ट्रिया को युद्ध के अपराधियों को सौंपने के लिए कहा गया। अंततः सेंट जर्मन की संधि की धारा 88 द्वारा आस्ट्रिया पर यह प्रतिबंध लगा दिया गया कि वह भविष्य में ऐसा कोई प्रयत्न न करे, जिसमें स्वतंत्र राज्य के रूप में उसका नामोनिशान मिट जाए।
बल्गारिया के साथ न्यूली की संधि, 27 नवंबर 1919
27 नवंबर, 1919 के पेरिस के पास न्यूली नामक स्थान पर मित्र राष्ट्रों तथा बल्गारिया के साथ संधि
हुई। संधि के अनुसार-
• पश्चिमी थ्रेस (Thrace) का भाग यूनान को देना पड़ा। इससे उसकी बड़ी हानि हुई, क्योंकि थ्रेस के निकल जाने से एजियन सागर से उसका संबंध टूट गया।
• बल्गारिया की सेना की संख्या घटाकर 20,000 कर दी गई और उसकी नौ सेना को भंग कर दिया गया।
• हर्जाने के रूप में एक भारी बड़ी रकम भी लाद दी गई।
हंगरी के साथ त्रियानों की संधि 4 जून, 1920
युद्ध समाप्ति के पश्चात हंगरी की आंतरिक स्थिति इतनी अव्यवस्थित हो गई कि वहाँ कोई सरकार ही नहीं बन सकी। नवंबर, 1920 में वहाँ एक नई सरकार गठित की गई,
जिसे मित्र राज्यों ने मान्यता दे दी। 4 जून, 1920 को हंगरी के प्रतिनिधि मंडल ने त्रियानो के राजमहल में संधि पर हस्ताक्षर कर दिए। इस संधि के अनुसार
• हंगरी राज्य का बहुत सा भाग यूगोस्लाविया, चेकोस्लोवाकिया और रूमानिया को दिया गया।
यूगोस्लाविया को हारी, कोटिया, स्लावोनिया और बनाट का कुछ भाग दे दिया गया।
• चेकोस्लोवाकिया को कार्पोशियन पर्वत के दक्षिण और पूर्व की ओर स्थित कुछ भाग प्राप्त हुआ।
• रूमानिया को ट्रांसिलवानिया का प्रदेश और उसके पश्चिम में स्थित कुछ मैदानी भाग एवं वनाट का दो तिहाई भाग प्राप्त हुआ।
इसके अतिरिक्त आस्ट्रिया को और भी राज्य प्राप्त हुआ। विजित राज्यों में आस्ट्रिया को अत्यधिक राज्य प्राप्त हुआ। इस प्रकार त्रियानों की संधि के अनुसार हंगरी का क्षेत्रफल एवं जनसंख्या बहुत कम रह गई। क्षेत्रफल 1,25,000 वर्ग मील की जगह 35,000 वर्ग मील तथा जनसंख्या 2 करोड़ की जगह 80 लाख रह गई। नौसेना भंग कर दी गई तथा सेना घटाकर 35,000 कर दी गई।
तुर्की के साथ सेबे की संधि 10 अगस्त, 1920
पेरिस की संधियों में से यह अंतिम संधि थी। युद्ध में मित्र राज्यों ने गुप्त संधियों के द्वारा तुर्की के साम्राज्य को विभाजित करने का निश्चय कर लिया था।
पेरिस के निर्णायकों का मुख्य उद्देश्य तुर्की साम्राज्य की समस्त अ-तुर्की जातियों को मुक्त करना था। इस संधि के अनुसार-
• तुर्की को मिश्र, सूडान, साइप्रस त्रिपोलीटानिया, मोरक्को, ट्यूनिस, अरब पेलेस्टाइन, मेसोपोटामिया तथा सीरिया पर अपने समस्त अधिकार छोड़ने पड़े।
• यूनान ( ग्रीस) को पूर्वी थ्रेस का कुछ भाग और एजियन सागर में स्थित कुछ द्वीप प्राप्त हुए।
• डार्डेनलीज के जलमडरूमध्य को अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र घोषित किया गया, परंतु कान्स्टेन्टीनोपल और उसके आसपास का भाग तुर्की के सुल्तान के अधीन बना रहा।
• तुर्की के आर्मीनिया को स्वतंत्र राज्य मान लिया और बुदिस्तान को आंतरिक स्वराज्य देने का वचन दिया।
• अरब में हिजाब के राज्यों को भी मान लिया गया। लेबनान, सीरिया, मेसोपोटामिया और पेलेस्टाईन का अधिदेशाधीन क्षेत्र बनाया गया। एशिया माइनर में केवल एनालेलिया का क्षेत्र तुर्की के अधीन बना रहा। इस संधि के तहत एक बड़ा भू-भाग तुर्की के हाथ से निकल गया। यह संधि कार्यान्वित न हो सकी। मुस्तफा कमाल पाशा के नेतृत्व में तुर्की में इस संधि के विरुद्ध एक जबरदस्त आंदोलन खड़ा हुआ। मुस्तफा कमाल पाशा ने खलीफा की शक्ति का अंत कर दिया।
लोसान की संधि
मित्र राष्ट्रों को मजबूर होकर 23 जुलाई, 1923 को तुर्की के साथ लोसान की संधि संपन्न करनी पड़ी। इस संधि के द्वारा रमर्ना, थ्रेस, कान्स्टेन्टीनोपल तुर्की को वापस कर दिए गए। तुर्की की सार्वभौम सत्ता स्वीकार कर ली गई।
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