स्त्री शिक्षा के विविध आयाम और अंतर्सम्बद्धताएँ - Various Dimensions and Interrelationships of Women's Education

स्त्री शिक्षा के विविध आयाम और अंतर्सम्बद्धताएँ - Various Dimensions and Interrelationships of Women's Education


स्त्रीशिक्षा की पाठ्यवस्तु का संबंध बहुव्यापकता एवं बहुआयामिता लिए हुए है. यह एक सामान्य स्थिति है कि जैसी हमारी शिक्षा होगी, वैसी हमारी मानसिकता, विचारावधारणाएँ, व्यक्तित्व एवं आचरण होगा. यानी व्यक्ति के व्यक्तित्व के निर्माण एवं विकास में शिक्षा का सर्वाधिक योगदान होता है. एक समय ऐसा भी रहा है, जब स्त्रियों को शिक्षा के दरवाजे एकदम बंद थे, अंग्रेजों का यह आरोप असंगत नहीं था कि हम अपनी स्त्रियों के साथ अच्छा व्यवहार नहीं करते हैं. उन्नीसवीं सदी में पहली बार स्त्रीशिक्षा की शुरुआत की बात उठी. इसका विवरण पूर्व में दिया गया.


स्त्रीशिक्षा का संबंध केवल स्त्रियों और उनकी शिक्षा से नहीं है, बल्कि स्त्री को शिक्षित करने का अर्थ है, पूरे परिवार को शिक्षित करना. एक शिक्षित स्त्री अपने साथ-साथ अपने से जुड़े सभी सम्बन्धियों का पुनर्संस्कार करती है, विशेषतः बच्चों को ज्योतिबा फुले का अभिमत इस संबंध में उद्धरणीय है. डॉ. राधा कुमार ने लिखा है- “उस समय कम प्रभावशाली परंतु कालान्तर में जबर्दस्त महत्वपूर्ण बनकर उभरा एक विचार था बच्चों के चरित्र निर्माण में माँ के में स्त्रियों की भूमिका क्योंकि ज्योतिबा फुले जैसे अनेक सुधारकों का मत था कि यदि स्त्री को शिक्षित किया जाए तो वह अपने बच्चों को भी शिक्षित बना सकेगी.” (कुमार, राधा;

स्त्री संघर्ष का इतिहास; अनुवाद एवं सम्पादन रमा शंकर सिंह 'दिव्यदृष्टि'; वाणी प्रकाशन, दरियागंज, नई दिल्ली-2, पृष्ठ- 56).


नवजागरण की महान नेत्री सरोजिनी नायडू स्त्रीशिक्षा को राष्ट्रनिर्माण की भूमिका के बतौर देखती थीं. स्त्रियों के लिए शिक्षा का वही महत्व है, जैसे किसी प्राणी को शुद्ध वायु का यह उसका जन्मसिद्ध अधिकार है. हमने सदियों स्त्री को उसके इस अधिकार से वंचित रखा है- “शिक्षा एक ऐसा असीम सुन्दर अपरिहार्य वातावरण है जिसमें हम जीते, रहते तथा अन्य कार्य करते हैं. आपके पिताओं ने आपकी माताओं के इस अविस्मरणीय जन्मसिद्ध अधिकार से वंचित करके आपको लूटा है. xxx आप अपनी स्त्रियों को शिक्षित करें और देखें कि राष्ट्र अपनी स्वयं की रक्षा कर लेगा क्योकि यह बात कल भी सत्य थी, आज भी है और रहती दुनिया तक सत्य रहेगी कि पालना झुलाने वाले हाथ ही विश्व पर शासन करते हैं." (वही, पृष्ठ 112) स्त्रीशिक्षा की एक बड़ी पैरोकार मैडम कामा का भी लगभग यही विचार था.

(द्रष्टव्य; वही; पृष्ठ - वही). मैडम कामा का मत था कि स्त्रीशिक्षा से राष्ट्रीय आंदलनों को मज़बूती मिलेगी.. कालान्तर में यह सत्य सिद्ध हुआ. (द्रष्टव्य; वही; पृष्ठ 111 ).


एक शिक्षित स्त्री परिवार से लेकर राष्ट्र के निर्माण तक में सर्वाधिक भूमिका निभाती है. एक शिक्षित स्त्री सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, धार्मिक आदि समस्त क्षेत्रों की सच्चाइयों से सुपरिचित होती है. शिक्षा से उसमें तार्किकता का विकास होता है व समस्या की सही पहचान और समझ भी बढ़ती है. इस प्रकार स्त्रीशिक्षा केवल शिक्षा नहीं है, वह एक बहुआयामी और बहुस्तरीय उपक्रम है.