वियना महासम्मेलन - Vienna Convention
वियना महासम्मेलन - Vienna Convention
नेपोलियन के पतन के पश्चात् यूरोप एक जटिल समस्या से घिर गया था। पिछले पच्चीस वर्षों के सतत युद्धों के परिणामस्वरूप यूरोपीय देशों की सीमाएँ बार-बार परिवर्तित होती रही थीं और कई देशों में पुराने राजवंशों को हटाया जा चुका था। नेपोलियन ने यूरोप के राजनैतिक नक्शे को बुरी तरह विकृत कर दिया था। इसलिए 1814 में उसके पदत्याग के बाद यूरोप का प्रादेशिक पुनर्गठन आवश्यक हो गया था।
इस दिशा में वियना सम्मेलन में संपन्न वियना समझौता (जून, 1815) के पहले ही विजयी देशों के बीच चाउमौंट की संधि (मार्च, 1814) एवं पेरिस की दो संधियाँ (मई, 1814 एवं नवंबर, 1814 ) हो चुकी थीं।
इन संधियों द्वारा विजयी देशों ने फ्रांस की राजनैतिक सीमाओं को पुनर्निर्धारित करने के साथ-साथ फ्रांस के पुराने राजवंश, बूब को पुनर्स्थापित करने का निर्णय लिया था। इन संधियों में विजयी देशों ने स्पष्ट किया कि उनका मुख्य उद्देश्य यूरोपीय महादेश में युद्ध के पूर्व की राजनैतिक सीमाओं को बहाल करना था । लुई XVIII को इसी निर्णय के अंतर्गत नीदरलैंड, इटली एवं जर्मनी में नेपोलियन द्वारा विजित प्रदेशों का परित्याग करना पड़ा। वियना का सम्मेलन मुख्य रूप से फ्रांस द्वारा परित्यक्त इन्हीं प्रदेशों को पुनर्वितरित करने के उद्देश्य से आयोजित किया गया था।
वियना सम्मेलन का आधुनिक यूरोप के इतिहास में विशेष महत्व है। ऑस्ट्रिया की राजधानी, वियना में आयोजित यह सम्मेलन सितंबर 1814 से जून 1815 के बीच संपन्न हुआ। तीस वर्षीय युद्ध की समाप्ति के बाद 1648 में आयोजित वेस्टफेलिया कांग्रेस के बाद यूरोप की समस्याओं पर विचार करने के लिए यूरोपीय देशों का इतना बड़ा सम्मेलन पहली बार वियना में ही आयोजित किया गया था। इसमें ऑस्ट्रिया एवं रूस के सम्राटों सहित प्रशा, बेवेरिया, बूटैम्बर्ग एवं डेनमार्क के राजा स्वयं सम्मिलित हुए। इनके अतिरिक्त यूरोप के लगभग सभी राजनयिक इस कांग्रेस में सम्मिलित हुए। वस्तुतः तुर्की को छोड़कर यूरोप के सभी देशों ने इस कांग्रेस में भाग लिया।
वियना में एकत्रित विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका मेटरनिख की रही । ऑस्ट्रिया का चांसलर, मेटरनिख अपनी कूटनीतिक योग्यता के लिए ख्यात था। उसने अपने प्रभाव का प्रयोग कर विभिन्न देशों को एक ऐसे समझौते के लिए राजी किया जिसने ऑस्ट्रिया को यूरोप में एक अत्यंत प्रधान देश के रूप में स्थापित कर दिया। रूस का जार अलेक्जेण्डर प्रथम भी अत्यंत प्रभावशाली था। वह एक उदार नेता के रूप में ख्यात था, किंतु वियना में उस पर मेटरनिख का प्रभाव हावी हो गया और वह उसकी प्रतिक्रियावादी नीति का समर्थक बन गया।
ब्रिटिश प्रतिनिधि लॉर्ड कैसलरे एक व्यावहारिक राजनीतिज्ञ था जिसकी दिलचस्पी यूरोप में शक्ति-संतुलन स्थापित करने में थी। उसने मित्रराष्ट्रों के परस्पर विरोधी हितों में सामंजस्य स्थापित करने का हर संभव प्रयास किया। प्रशा के राजा फ्रेडरिक विलियम III की अनुपस्थिति में प्रशा का प्रतिनिधित्व हार्डेनबर्ग ने किया। इन चार महाशक्तियों के अतिरिक्त कांग्रेस की कार्यवाही में टेलीरैण्ड की भी प्रमुख भूमिका रही। वह फ्रांस के राजा लुई XVIII का प्रतिनिधि था। उसकी नीति फ्रांस को पुनः एक महाशक्ति के रूप में स्थापित करने की थी। वस्तुतः वियना कांग्रेस के सभी महत्वपूर्ण निर्णय इन्हीं पाँच बड़े देशों के द्वारा लिए गए।
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