भारत में स्त्री - woman in india

भारत में स्त्री - woman in india


भारतीय समाज एक पुरुष प्रधान समाज रहा है या इसे हम पितृसत्तात्मक समाज भी कह सकते हैं। पितृसत्तात्मक अथवा पुरुष प्रधान समाज से तात्पर्य ऐसे समाज से है, जहाँ पर पुरुषों का स्त्रियों पर प्रभुत्व दिखाई देता है। इस प्रभुत्व की सबसे प्रखर अभिव्यक्ति परिवार में दिखाई पड़ती है। परिवार में निर्णय लेने की ताकत पुरुष के पास ही होती है, वही परिवार का मुखिया भी होता है। आम तौर पर पुरुष बाहर जाकर काम करता है और महिलाएँ घर के अंदर काम करती हैं। बच्चों की देखभाल, बुजुर्गों की सेवा, साफ-सफाई, खाना बनाना कुछ ऐसे काम हैं, जिन्हें महिलाएँ घर पर रहकर करती हैं। इन कामों के लिए उन्हें कोई मेहनताना भी नहीं दिया जाता है।

यदि कोई महिला बाहर जाकर भी काम करती है तो भी उसे घर के इन काम से कोई मुक्ति नहीं मिलती है। भारतीय समाज में पुरुषों का यह प्रभुत्व सिर्फ परिवार तक ही सीमित नहीं है, बल्कि समाज, अर्थव्यवस्था, राज्य, कानून, न्यायपालिका, मीडिया हर जगह दिखाई पड़ता है। देश की अर्थव्यवस्था में स्त्रियों के द्वारा घर में किए जाने वाले काम की कोई गिनती नहीं होती है। यानी सकल घरेलू उत्पाद में स्त्रियों के द्वारा किए जाने वाले घरेलू श्रम को शामिल नहीं किया जाता है। स्त्रियों का अधिकांश हिस्सा आज भी अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने के लिए विवश है, जहाँ पर किसी भी किस्म की सामाजिक सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं होती है।

काम के घंटे न्यूनतम वेतन, साप्ताहिक अवकाश जैसी बुनियादी चीजें भी यहाँ पर तय नहीं होती हैं। अधिकांश क्षेत्रों में स्त्रियों के द्वारा पुरुषों के बराबर काम करने के बावजूद वेतन में समानता नहीं दिखती है। इसी तरह से परिवार के अंदर कानूनन तो पिता की संपत्ति पर पुत्री को पुत्र के बराबर ही हक हासिल हो गया है, लेकिन किसी भी स्त्री के लिए अपने पिता की संपत्ति पर दावा करना आसान नहीं है। एक स्त्री बखूबी इस बात से परिचित है कि ससुराल में किसी भी स्थिति में रिश्ते असामान्य होने के चलते उसका अपना मायका ही एक मात्र ठिकाना है और संपत्ति पर हक माँगकर भाई से भी रिश्ते सामान्य नहीं रह जाएँगे। इसी वजह से अधिकांश महिलाएँ पिता की संपत्ति पर अपना हक नहीं जताती हैं।

इसी तरह अगर हम कानून के संदर्भ में बात करें तो हमें दो तरह की विसंगतियाँ नजर आती हैं। संवैधानिक रूप से तो स्त्री और पुरुष सभी बराबर हैं लेकिन ये बराबरी समाज में नहीं दिखाई पड़ती है। एक तरफ तो लिंग के आधार पर होने वाले भेदभाव को रोकने के लिए तमाम सारे कानून बने हैं, लेकिन इन कानूनों को अमल में लाने वाली संस्थाएँ भयानक रूप से पुरुषवादी सामंती मानसिकता से ग्रस्त हैं। राजस्थान की एक महिला, जिसके साथ सवर्ण तबके के लोगों ने बलात्कार किया था, उसे न्याय देने के बजाय न्यायधीश यह कहते हैं कि जिनके ऊपर बलात्कार का आरोप लगाया गया है, क्योंकि वे ऊँची जाति से ताल्लुक रखते हैं और आरोप लगाने वाली महिला निचली जाति से आती है। इसलिए यह संभव नहीं है कि ऊँची जाति के लोगों ने किसी निचली जाति की महिला से बलात्कार किया होगा।

ठीक इसी तरह हम दहेज का उदाहरण ले सकते हैं। भारत में महिला आंदोलन के दबाव के चलते सख्त कानून तो बना दिए गए हैं लेकिन नव उदारवादी नीतियों ने जिस तरह से उपभोक्तावाद व लिंग आधारित असमानता को बढ़ावा दिया है, उसने दहेज के खिलाफ बनें कानून को अप्रासंगिक बना दिया है। एक तरफ तो सख्त कानून हैं, लेकिन धड़ल्ले से कानून का मजाक बनाया जा रहा है। आज के समय में दहेज स्टेट्स सिंबल का भी पर्याय हो गया है। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ मीडिया ने भी स्त्रियों के वस्तुकरण को बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। हम लगातार ऐसे विज्ञापनों को देख सकते हैं, जहाँ पर उपभोक्ता वस्तुओं को बेचने के लिए खियों के शरीर का वस्तुकरण किया जाता है। ऐसा नहीं है कि खियों की दोयम दर्जे की नागरिक की स्थिति सिर्फ वर्तमान का मसला है।

इतिहास और मिथक में भी हमें ऐसे कई उदाहरण मिल जाएँगे, जिनसे इस बात की पुष्टि होती है कि प्राचीन भारत में भी भारतीय


समाज एक पुरुष प्रधान समाज ही था। यहाँ पर गार्गी व याज्ञवल्क्य के बीच हुए संवाद से इसे समझा जा सकता है। एक बार ऋषि याज्ञवल्क्य ने अपने समय के सर्वश्रेष्ठ बुद्धिमान लोगों को शास्त्रार्थ के लिए आमंत्रित किया। उनसे मुकाबला करने के लिए छह लोग आए उसमें से एक अकेली महिला गार्गी भी थी। सारे पुरुष ऋषि याज्ञवल्क्य से पराजित हो गए। अंत में गार्गी की बारी आई। गार्गी लगातार ऋषि याज्ञवल्क्य से प्रश्न कर रही थी और अंत में हार से बचने के लिए ऋषि याज्ञवल्क्य ने आक्रामक पौरुषत्व का सहारा लेते हुए,

उसे धमकी दी कि गार्गी बहस को इतना आगे मत ले जाओ कि तुम्हारा सर ही फट जाए। यहाँ पर यह बात गौर करने लायक है कि जहाँ सारे पुरुष हारकर चुप हुए, वहीं गार्गी को धमकी देकर चुप कराया गया। ऐसे बहुत सारे उदाहरण मिथकों और इतिहास में मिल जाएँगे जो यह बताते हैं कि प्राचीन और मध्यकालीन भारत में सत्ता-संबंध पुरुषों के हक में ही थे। औपनिवेशिक भारत में खास तौर पर 19वीं शताब्दी में आकर कई सारे समाज सुधारकों ने स्त्री प्रश्नों पर बोलना शुरू किया, लेकिन समाज की बुनियादी संरचना में कोई फर्क नहीं आया था। अगले अध्याय में हम विस्तार से स्वतंत्रता उपरांत भारत में स्त्री विषय पर विस्तार से बात करेंगे।